Saturday, 18 July 2009

गडे मुर्दे क्यों उखाडे जायें ‘बालिका वधू’ में... ??

‘हमारा महानगर’ (17 जुलाई, 09) में ‘बालिका वधू’ पर संसद में उठे सवाल को लेकर अलका आश्लेषाजी का आलेख पढने को मिला। धारावाहिक को अलका जी ने ‘सामाजिक जागृति का सकारात्मक रूप’, ‘बाल-विवाह के विरोध में एक सार्थक कोशिश’ ‘इस कुप्रथा की समस्याओं को सुलझाने’ व ‘दर्शकों को शिक्षित करने के उद्देश्य वाला’...जैसे जितने विशेषण हो सकते हैं, से नवाज डाला है। और कार्यक्रम हम देख रहे हैं। खेद है कि हम ऐसा कुछ भी देख नहीं पा रहे हैं। काश, अलकाजी ने कहीं एकाध उदाहरण दे दिया होता कि यह सब किस घटना, किस चरित्र, या इनके किस परिणाम से हो रहा है, तो हम भी शायद समझ पाते ! हम तो देखते हैं कि इसकी बालिकाबधू व बालकवर (आनन्दी-जगिया) परम प्रसन्न एवं सुखी हैं। जितना मान-सम्मान, स्नेह-दुलार उन्हें सीरियल के परिवार-समाज से मिल रहा है तथा उसी के चलते जितनी लोकप्रियता उन्हें आज मिल रही है, उसे देखकर हर बच्ची-बच्चा यदि बालिका बधू - बालक वर बनने का सपना देखने लगे (और देख रहे हैं), तो क्या बेज़ा है? क्या यह एक मृत हो गयी रूढ व्यवस्था को ग्लैमराइज़ करना नहीं है? कौन-सी जागृति इसमें निहित है। हाँ, जागृति के नाम पर आनन्दी के ससुराल में पढने की शुरुआत करायी गयी, जो कुछ कडियों को हिट करके ग़ायब हो गयी। वैसे बाल-विवाह की बात ही गडे मुर्दे उखाडना है और ‘कलर’ चैनल तो प्राय: सभी में यही कर रहा है। ‘लाडो...’ में लडकी की भ्रूण-हत्या का मामला कमिश्नर तक ले जाने वाली लडकी अब अम्मा के घर में नौकरानी बनकर रह रही है- पता नहीं कौन सी योजना लिये है !! कमिश्नर न जाने कहाँ गया? इतने पढे-लिखे जागरूक लोगों के बीच कोई पुलिस, कोई व्यवस्था नहीं आ पाती और अम्मा की निरंकुश तानाशाही सत्ता चल रही है... ऐसा गाँव भारतवर्ष में कहाँ है? अम्मा की दादागीरी के स्टंट के सामने तो मनमोहन देसाई व प्रकाश मेहरा की फिल्में भी पानी भरें ! तो बालिका वधू की पढाई की बात भी मुर्दे को भूत बनाना ही है। राजस्थान व बिहार में यदि कहीं-कहीं ये प्रथाएं हैं, तो ऐसे सीरियल वहाँ के लोकल चैनल पर दिखाये जायें। पूरे देश में इन मुरदा प्रथाओं को क्यों जल्वागीर किया जाये ? फिर दिखायें, तो ऐसे कि इनके प्रति अरुचि-जुगुप्सा पैदा हो, न कि ऐसा ग्लैमर कि वैसा बनने का रश्क़ होने लगे...? आइये आगे बढें... घर के बडे बेटे बसंत की दूसरी शादी भी घर वालों को पैसे देकर कच्ची उम्र की किशोरी से करा दी – क्रूर-जघन्य यथार्थ दिखा, विरोध भी दर्ज़ हुआ। लगा कि कोई सार्थक पहल होगी...। दस-बीस कडियां उसमें भी जम गयीं। यह ग़ैर कानूनी है, पर इस तरफ़ ख्याल क्यों जाये? बच्चा देकर ऋण उतारकर जाने के निश्चय से रुकी थी। बडा अच्छा लगा था...। पर अब वह अच्छी-ख़ासी ‘बींदनी’ बनकर घर-बार सँभाल रही है। घर के दुख-सुख में हँस-रो रही है। याने ये होता रहे, का ही सन्देश बना न ! तो कौन सा जागृति पैदा हुई और कौन-सी शिक्षा मिली ? बस, उन विरोधों के नाटक में कुछ कडियाँ फिर हिट हो गयीं। असल में यह सारा खेल कडियों को हिट करने का ही है। ऐसे मुद्दों को ‘हुक’ कहते हैं, जिसे खोजना सीरियल-लेखन का बडा गुर है। ये हुक दर्शक को फँसाने के लिए होते हैं। फिर उसे भूल जाना ही इस विधा का अनुशासन (डिसिप्लिन) है। इस हुक के मक़्सद और मर्म को आम दर्शक तो नहीं समझता, पर लेखक-विकारक ? हाँ, इस बींदनी के गर्भ के जिस बच्चे को लेकर इतना हंगामा हुआ, वह गया कहाँ? याने कहानी तक से ‘हुक’ का मतलब नहीं। तीसरा मसला दादी की पोती (सुगनी) का है, जो विधवा समस्या से जुडा है। उसकी दूसरी शादी कराना जरूर एक सकारात्मक बात है, पर वह गाँव कहाँ है भारतवर्ष में कि वह पहले पति से गवने के पहले इतना मिलती है (रोमांस भी भुना लिया !) कि गर्भवती हो जाती है। यदि यह सब पुराना है, तो मोबाइल कहाँ था तब ? और नया है, तो इतना सब कहाँ है? दोनो ही अतिवाद है। इसकी ज़रूरत न सच को थी, न कथा को । फिर विधवा हो जाने पर जो यातनाएं दी जाती हैं, वे तो किसी भी दृष्टि से कतई बर्दाश्त के काबिल नहीं। हमारा समाज आज के लिए इस सफेद झूठ व एकदम ग़ैरज़रूरी यातनाओं को देखता है, वही आश्चर्यजनक है। और अब एक बुद्धिजीवी पत्रकार से इसकी पैरोकारी तो जले पर नमक ही है। लगता है कि कमाऊ मीडिया के कुएं में पडी भाँग का नशा पूरे समुद्र पर तारी है। पूरा घर उस यातना के खिलाफ़ है और एक बूढी माँ सबकुछ किये जा रही है। कहाँ है ऐसी माँ ? और है, तो क्यों है अलकाजी ? वह पुरखों की बनायी व्यवस्था का वास्ता देती रहती है, जो तब भी इतनी क्रूर न थी। इसका सही रूप इतिहास के गवाक्ष से दिखाने वाली ‘राव साहेब’ फिल्म (जयवंत दळ्वी के नाटक ‘बैरिस्टर’ पर आधारित) में देखा जा सकता है। ऐसा सब और-और भी बहुत कुछ है...पर अभी बस इतना ही। अब कुछ विमर्श देखें... सीरियल का आज मतलब कि हर अच्छे-बुरे को इतना बढा-चढा कर दिखाया जाये कि दर्शक गदगद होकर, गलदश्रु होकर, चमत्कृत होकर... याने चाहे जैसे... बस, देखे। उनकी टी.आर.पी. बढे। विज्ञापन मिलें। सब कमायें-खायें। बनाने में तो व्यापारी घुस ही आये हैं मीडिया में, करने वालों को भी मोहजाल में फँसे जमाना हो गया। वरना बालिकाबधू के मुख्य चरित्र एनएसडी के हैं – एक सरोकारपरक संस्थान से प्रशिक्षित । दोनो बेटे तो अपेक्षाकृत नये एनएसडियन हैं, उनसे क्या पूछना, पर आधुनिक हिन्दी रगमंच में अभिनय की वृहत्रयी में शुमार उस जमाने की एनएसडी अभिनेत्री सुरेखा सीकरीजी, जो स्वयं सारी गल्दराजी की शीर्ष् (दादी) बनी मौजूद हैं, से आख़िरी बार पूछने का मन होता है – ‘दाग़ेदिल ग़र नज़र नहीं आता, बू भी क्या चाराग़र नहीं आती...’!! ख़ैर, इनका तो फ़ायदा हो रहा है। तमाम नाटकों के बावजूद इतनी अपार लोकप्रियता सुरेखाजी को कभी नहीं मिली। ‘लाडो...’ की अम्मा बनी मेघना भी एनएसडी की है और फूले न समा रही होगी कि जो मुकाम सुरेखाजी को जीवन के आखिरी पडाव पर मिला, उसे पहले चरण में ही मिल गया। महिमा मीडिया के ज़माने की ! लेकिन अख़बारों में इसकी स्तुति करने वालों को क्या मिल रहा है? मैं नहीं जानता कि सदन मे उस सांसद (शरद यादव – जे.डी.य़ू.) ने क्यों यह सवाल उठाया। क्या राजनीति है इसके पीछे? बकौल अलकाजी इस सीरियल पर और भी कई तरह के संकट आये। विरोध हुए। बन्द करने की कोशिशें हुईं... वो सब उन्हें सुनियोजित साज़िशों के परिणाम लगते हैं। इस अन्दरूनी बात का भी मुझे पता नहीं, लेकिन चाहे जैसे – ग़लती से ही सही, एक सही सवाल उठा तो सही ! अब उस पर कुछ सप्रमाण व तर्कसम्मत न कहकर सदिच्छा या अपनी निहित पसन्द को थोपकर उस सवाल को उलझाने का क्या मतलब है? और यदि सीरियल में से वे बातें निकालकर बतायी जायें, जिससे शिक्षा, सरोकार, सकारात्मक बदलाव... आदि होते हों, तो मैं अवश्य लाभान्वित और उपकृत महसूस करूँगा...। * * * * सम्पर्क- ‘नीलकण्ठ’, एन.एस. रोड नं.-5, विलेपार्ले-पश्चिम, मुम्बई- 400056 फोन- 022-26101987/ 26163215. मो. 09869355103

Saturday, 20 June 2009

हबीब तनवीर को एक श्रद्धांजलि भारतीय रंगकर्म से भारतीयता का जाना ... - सत्यदेव त्रिपाठी - हबीब तनवीर का जाना अनपेक्षित न था, पर 8जून, 2009 को यह ख़बर एक आघात की तरह लगी। मन से उठी ‘हाय’ शब्दों में यूँ निकली – ‘आज भारतीय रंगकर्म से भारतीयता चली गयी...’। जी हाँ, उनके हर नाटक को देखते हुए इस बात का गहरा अहसास होता था कि हम सच्चे अर्थों में एक भारतीय नाटक देख रहे हैं। इसका एक बडा कारण यह है कि हिन्दी के बाकियों में यह अहसास प्राय: नहीं होता या कभी-कभार होता है। मराठी-बँगला आदि में प्राय़: होता है – बहुत कुछ भाषा के कारण भी। किंतु हबीब साहब में हर क्षण महसूस होता है कि ‘ये है भारतीय नाटक...’। वे संस्कृत के क्लासिक (मृच्छकटिकम, मुद्राराक्षस, वेणीसंहार) करें या शेक्सपीयर (मिड समर नाइट ड्रीम- कामदेव का अपना, वसंत ऋतु का सपना) करें, आप को नहीं बताया जाये या आपने वह न पढा हो, तो कतई नहीं जान पायेंगे। क्योंकि हबीब साहब के नाटक शैली-शिल्प, विधान-वितान, भाव-भाषा, तमीज़-अन्दाज़, गीत-संगीत... हर कुछ में याने सर से पाँव तक इस कदर खाँटी भारतीय होते हैं कि भारतीयता को परिभाषित करते हैं। उसे देखकर भारतीयता के निकष निर्धारित किये जा सकते हैं। और हबीब साहब ने यह भारतीय रसायन तब अपनाया, जब इप्टा से लेकर बाल नाट्य, रायपुर-अलीगढ से लेकर मुम्बई-दिल्ली और रेडियो-फिल्म से लेकर राडा (रॉयल अकैडेमी ऑफ़ ड्रैमेटिक आर्ट) के प्रशिक्षण तथा योरप के तमाम स्थलों के थियेटर व कला का अनुभव-अर्जन कर चुके थे। इस सबके बाद हुआ यूँ कि वे रायपुर गये थे अपनों से मिलने-जुलने और वहीं अपने बचपन के स्कूल में ‘नाचा’ की एक प्रस्तुति देखने का मौका मिल गया। विदेश में थियेटर के अनुभव के बाद जब उन्होंने उन कलाकारों की सहज-प्राकृतिक कला देखी और तो इलहाम की तरह पाया कि यही असली रंगमंच है। तय किया कि इन्हीं के साथ अपनी शैली में थियेटर करना है। वहीं से छह कलाकारों को लेकर गये। यह फैसला मामूली न था। पर बात अंतस से निकली थी। ऐसे ही उन्होंने राडा के प्रशिक्षण में भी किया था। जहाँ जाने के लिए सब लोग तरसते हैं, उसे उन्होंने उस प्रतिष्ठित संस्थान व छात्रवृत्ति देने वाले भारतीय दूतावास आदि सबकी नाराज़गी के बावजूद एक साल बाद छोड दिया था। क्यों? उन्हीं के शब्दों में सुनिए – ‘यदि मैं यहाँ और अधिक रुकता हूँ, तो एक अभिनेता के रूप में आडम्बरपूर्ण और अस्वाभाविक हो जाऊँगा। मैं अंग्रेजी में नहीं, वरन अपनी भाषा में अपनी रंग सक्रियता को जारी रखने के लिए वापस जाऊँगा। यहाँ प्रयुक्त होने वाले नियम और सिद्धांत मेरी भाषा में और मेरे देश में काम नहीं आयेंगे’। यही बात ब्रेख़्त को लेकर भी है। ब्रेख़्त इन्हें पसन्द हैं। प्रवास के दौरान उन्हें ख़ास तौर पर समझने गये थे। उनसे प्रभावित हैं। पर वही कि अन्धानुकरण पूर्वक नहीं, ब्रेख़्त को अपने देश-काल की तरह भारतीय मुहावरे में ढालकर लेने के हामी हैं। और ऐसा हुआ भी, वरना एडिनबरा नाट्योत्सव में ‘चरनदासचोर’ देखकर कोई समीक्षक कैसे कहता – ‘लोकनृत्य और गीतों से सजी इस प्रस्तुति में संस्कृत परम्परा और ब्रेख़्त का अद्भुत समन्वय है’। याने भारतीयता का यह जज़्बा शुरू से ही सवार था, जिसने ऐसा फैसला कराया। इस निश्चय के साथ उन्होंने ‘नया थियेटर’ की स्थापना की। और बस, वही खाँटी माटी उनकी पहचान बनी, ख़ासियत बनी। उन्हीं ठेंठ गँवईं कलाकारों के साथ वे आजीवन काम करते रहे। अपनी भाषा को उन्होंने जड से उठाया - हिन्दी नहीं, छत्तीसगढी। सूरदास ने ब्रज भाषा को राष्ट्रीय भाषा बना दिया था और कहना अत्योक्ति न होगी कि हबीब तनवीर ने छत्तीससगढी को रंगमंच की राष्ट्रीय भाषा तो बनाया ही, अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी उसका लोहा मनवाया। जब हिन्दी तक न बोल सकने वाले कलाकारों व एक अंचल की भाषा में बने नाटकों – चरनदासचोर, माटी की गाडी, मिर्ज़ा शोहरत, बहादुर कलारिन आदि...- को लेकर राडा की उसी धरती पर गये, तो जो कह कर राडा को छोडा था, मानो वह सिद्ध ही कर दिखाया। फ़रमाइश कर-करके ‘चरनदास चोर’ के शोज़ वहाँ कराये गये। छठें दशक से शुरू हुए उनके विशुद्ध भारतीय रंगकर्म ने भूमंडलीकरण व बाज़ारवाद के दौर भी देखे और वैसे ही पसन्द किये जाते रहे – बल्कि बढते रहे। और इन नये विकास से लुभाये, इसकी आड में अपनी भारतीयता व अपने लोक को भुलाकर भागने वाले आज के युग को मानो हबीब साहब बता गये हों कि भाई, सही अर्थों में लोकल हुए बिना ग्लोबल नहीं हुआ जा सकता। इसे लोग ‘लोक नाट्यकर्म’ कहते हैं, पर हबीब साहब इसे लोक के आगे का रंगकर्म मानते हैं। हालाँकि इस पॉप्युलर टर्म (लोक) के सामने उनका यह कहना माना नहीं जा सका - चलन में नहीं आया। यह हस्र साहित्य की उसी आँचलिकता वाला ही है, जो आज़ादी मिलने के बाद ‘गाँवों की ओर चलो’ की समझ के साथ आयी थी। वे लोग तो कहते रहे कि इसके दृश्य आँचलिक भले हों, दृष्टि आँचलिक नहीं है, पर वह माना कहाँ गया। हबीब साहब की रंगदृष्टि व प्रयोग-सृष्टि को ऐसे संकीर्ण दायरे में नहीं डाला जा सका, तो यह श्रेय उनके रंगकर्म की व्यापकता को है और सुपरिणाम थियेटर जगत की सही समझ का - नाट्य-समीक्षा के अभाव के बावजूद। किंतु हबीब साहब के इस लोक की ओर आने को उसी युग-प्रवाह के साथ जोडकर ही देखा जाना चाहिए। नाम भी वही उस दौर वाला है – ‘नयी कविता, नयी कहानी’ और ‘नया थियेटर’। लोक के आगे की बात यथार्थ और प्रतिबद्धता की है। ‘लोक’ उनका माध्यम है - शैली-शिल्प है। पर इतना पुरज़ोर व इसीलिए इतना पुरअसर है कि लोग उसी में उलझकर रह जाते हैं। उसी को उनके नाटकों का मक़्सद मान लेते हैं। हबीब साहब का ‘इससे आगे जाकर असली मक़सद तक पहुँचने’ का आह्वान इसी यथार्थ व प्रतिबद्धता को समझने का है। पर लोग भी क्या करें ? यह विधान बना ही ऐसा सटीक, मौलिक व मौजूँ है कि आदमी का उलझ कर रह जाना लाज़मी है – ‘दिया है दिल अग़र उसको, बशर है, क्या कहिए ’ ! लेकिन जो अध्येता उससे आगे जाते हैं, वे साफ़-साफ़ देख पाते हैं कि हबीब साहब का नाट्यकर्म बामपंथी सोच से संवलित है। इप्टा के साथ उस दौर में रहना भी इसका प्रमाण है। यह इस हद तक भी है कि इनके रंगकर्म को ‘पोलिटिकल थियेटर’ कहने वाले ऐसे लोग भी हैं, जिनकी आस्था मार्क्सवाद-विरोधी है या जो हबीब साहब के नाट्यकर्म के समक्ष बौने होने लगते हैं। परंतु इनकी दृष्टिबेधकता और जैसा कि कहा गया, ग़ज़ब के रंगबोध से बने सृजन से ऐसे कथनों का संहार अपनेआप होता गया...। यह सृजन मुख्य धारा से किनारे कर दिये गये लोगों की पीडा का चितेरा है। जाति-पाँति, धर्म-सम्प्रदाय, धनी-ग़रीब...जैसे भेदों को खत्म करके समानता व स्वतंत्रता की स्थापना पर आधारित मनुष्यता का पक्षधर है। और ये मूल्य किसी लेबल के बिना भी हमारे लोक में मौजूद रहे हैं और हैं। इसी को हबीबजी ने भारतीयता के पर्याय के रूप में अपनाया व साधा है। लोगों तक पहुँचाया है, जो बख़ूबी पहुँचा भी है। यह इनके यहाँ प्राय: शोक या यंत्रणा बनकर नहीं आता, व्यंग्य-विद्रूप-विनोद या विरोध बनकर आता है। ध्यातव्य है कि ये वृत्तियां भी हमारे लोक की हैं। सच्ची भारतीयता हर ज़ोर-जुल्म से विरोध में बसती है। और हबीब साहब की जुझारू वृत्ति किसी से छिपी नहीं। उनकी रंगयात्रा में विरोधों से जूझने के जितने पडाव है, उतने शांति-सुक़ून के नहीं हैं। शायद इसी में उन्हें शांति-सुकून मिला करता था। वरना ‘पोंगा पंडित’ के ख़िलाफ़ जो कुछ हुआ, कोई दूसरा होता, तो टूट भी सकता था। या तो नाटक बन्द कर देता या समझौता कर लेता। लेकिन हबीब साहब अस्सी पार की उम्र में भी और साम्प्रदायिक शक्तियों के सत्ता-काल में भी इससे विचलित हुए बिना इस राह पर चलते रहे। और चुपचाप नहीं, बल्कि हर प्रतिरोध पर रिऐक्ट करते रहे। प्रतिरोधी शक्तियों के पास समझ होती, तो वे देख पाते कि यदि पोंगा पंडित में ब्राह्मणी लालच व कर्मकाण्डी ढ्कोसलों की पोल खोली गयी है (और यह तो तमाम हिन्दू लेखकों ने भी कितनी बार खोली है- मोटेराम की डायरी, प्रायश्चित्त..आदि), तो मुस्लिम कट्टरपंथियों को और अधिक बेनक़ाब करने वाला ‘जिस लाहौर नहिं देख्या’ भी तो उन्होंने खेला है, जिसमें सीधा व सीरियस आक्रमण है - पोंगा पंडित जैसा हास्य-विनोद नहीं। विवाद ज्यादा हुए इसी धार्मिक मामले को लेकर, पर हबीब साहब के यहाँ व्यवस्था पर चोट करने का जज़्बा ज्यादा है, लेकिन इस पर बवाल करने का अब रवाज़ नहीं रहा – शायद अपने बेपर्द होने के डर से व्यवस्थापक ही नहीं होने देते। ‘सडक’ जैसे नाटक इस थीम के सिरमौर हैं, पर मैं यहाँ एक दुर्लभ उदाहरण देना चाहूँगा, जो एक सम्पूर्ण नाट्यकर्मी हबीब साहब के शायर रूप का है। कहने की बात नहीं कि वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता के कार्यकाल में यह मामूली-सी लगने वाली कविता सुनायी थी। आप स्वयं देखें उसकी मार्मिकता...। शीर्षक है- ‘रामनाथ’ – “रामनाथ ने जीवन पाया साठ साल या इकसठ साल रामनाथ ने जीवन में कपडे पहने कुल छह सौ गज पगडी पाँच, जूते पन्द्रह रामनाथ ने अपने जीवन में कुल सौ मन चावल खाया सब्जी दस मन, फाके किये अनगिनत, शराब पी दो सौ बोतल अजी पूजा की दो हजार बार रामनाथ ने जीवन में धरती नापी कुल जुमला पैंसठ हजार मील सोया पन्द्रह साल। उसके जीवन में आयीं, बीवी के सिवा, कुल पाँच औरतें एक के साथ पचास की उम्र में प्यार किया और प्यार किया नौ साल सत्तर फुट कटवाये बाल और सत्रह फुट नाख़ून रुपया कमाया दस हजार या ग्यारह कुछ रुपया मित्रों को दिया, कुछ मन्दिर को और छोडा कुल आठ रुपये उन्नीस पैसे का कर्ज़... ...बस, यह गिनती रामनाथ का जीवन है इसमें शामिल नहीं चिता की लकडी, तेल, कफ़न, तिरही का भोजन रामनाथ बहुत हँसमुख था उसने पाया एक संतुष्ट-सुखी जीवन चोरी कभी नहीं की- कभी कभार कह दिया अलबत्त बीवी से झूठ एक च्यूँटी भी नहीं मारी – गाली दी दो-तीन महीने में एक आध बच्चे छोडे सात भूल चुके हैं गाँव के सब लोग अब उसकी हर बात रामनाथ ‘नया थियेटर’ है तो लोकाधारित, उसी से निर्मित; लेकिन उसे ‘पेशेवर रंगमंच’ (प्रोफेशनल थियेटर) बनाने की कल्पना की हबीब साहब ने – शायद रंगमंच को पेशेवर बनाने का यह आइडिया हिन्दी थियेटर में पहली बार तभी आया। लोक और पेशा में मूलत: अंतर्विरोध रहा है (मैं आज की बात नहीं कर रहा हूँ, जब सब कुछ ही पेशे तो क्या बाज़ार में तब्दील हो गया है), पर ऐसे अंतर्विरोधों को साधना ही तनवीर साहब को ‘हबीब’ रहा है और उन्होंने इसे भी करके दिखा दिया। तात्पर्य यह नहीं, कि पेशे के रूप में सफल कर गये, बल्कि यह कि अप्रोच पेशेवर हो गयी। उदाहरण के लिए जिस भी नाटक को जब कहिए, प्रस्तुत कर देने के लिए तैयार। इसकी सिद्धि के लिए जो सबसे बडा परिवर्तन किया हबीब साहब ने, वह प्रस्तुति को सेट के तामझाम से मुक्ति का है, जिससे कि जब जहाँ चाहो, खेल दो। इसे तकनीकी भाषा में ‘प्रोसिनियम से निकाल कर जनता के बीच में ला देना भी कहते हैं। वे कहा करते थे कि कहानी को कहने में जितने भी अवरोध आते हैं, उसे बेधडक निकाल दो। दीवारों के बीच न कला पनपती, न कलाकार। लेकिन अब इस चर्चा को यहाँ रोक देना होगा, वरना जिस थ्रियेट्रिकल गैल में जाना पडेगा, उसके लिए यह स्थल नहीं है। हाँ, तो इसी सब के चलते माटी की गाडी, आग़रे बाजार, चरनदास चोर, बहादुर कलारिन, गाँव क नाँव ससुरार मोर नाँव दमाद, ...आदि जाने कितने ही नाटक हमेशा चलते रहे – फिर-फिर बनते रहे...। ‘आगरे बाज़ार’ पहले एक लघु रूपक था। फिर पूर्ण नाटक बन गया। ‘जिस लाहौर नहिं देख्या’ को ‘डब्ल्यू एस एफ, मुम्बई’ में मैंने 45 मिनट का देखा और पूरा देख चुके मुझे भी वह अधूरा या सम्पादित नहीं लगा, तो पहली बार देखने वालों को क्या लगा होगा ! इस नाटक को मैंने समय-समय पर घटी घटनाओं के मुताबिक इम्प्रोवाइज़ करके करते देखा है और मूल संवेदना पर कोई फ़र्क़ नहीं पडता। सो, पेशेवर से मूलत: मेरा मतलब यह था। हाँ, दो-ढाई दर्जन कलाकारों को नौकरी देना तथा समूह के लिए स्थल व संसाधन मुहय्या करा लेना तो है, पर वह मामला ज्यादा सरकारी है। यहाँ विवेच्य नहीं। हाँ, इसे लेकर प्रवाद भी कम न थे, जिसमें अफ़वाह ही ज्यादा रही, जिसका प्रमाण शायद आगे मिल सकें...। अपनी इन थियेट्रिकल मान्यताओं तथा उसे साधने वाले रंगशिल्प व उसे साकार करने वाले उन ठेंठ कलाकारों को हबीब साहब ने कैसे-कैसे साधा... आदि, पर ढेरों सामग्री मौजूद है– लोगों की लिखी, ख़ुद उनकी लिखी व तमाम साक्षात्कारों मे उनकी कही। जैसे वे जमकर नाटक करते, उसी तरह जमकर लिखते-बतियाते भी। पर मेरा ही दुर्भाग्य रहा कि कई अवसरों के बावजूद कोई बातचीत तैयार न हो पायी। पहले अवसर का जिक्र रोचक होगा... मुझे गोवा (विश्वविद्यालय) में गये कुछ ही दिन हुए थे कि पंजिम के कलाअकादमी में ‘माटी की गाडी’ का शो होने की ख़बर मिली। दिल बल्लियों उछलने लगा... मुम्बई छोडने के कुछ ही दिनों पहले ‘पृथ्वी नाट्योत्सव’ में ‘आग़रे बाज़ार’ देखकर गया था- ख़ुमारी उतरने का नाम नहीं ले रही थी। वहाँ छोटी जगह में ऐसे अवसर यूँ भी कम आते हैं और फुर्सत कुछ ज्यादा रहती है। सो, झटपट एक इंटरव्यू की योजना बना डाली। उनके आते ही जाकर मिला और शो के तुरत बाद का समय भी मिल गया। औपचारिक अभिवादन एवं सदिच्छा-संवाद के अलावा यह मेरी पहली मुलाकात थी। ज़ाहिर है, बेहद उत्साहित था। शो देखकर और ‘चार्ज्ड’ हो गया। हबीब साहब ने ‘राजा का साला’ की भूमिका की थी। मज़ा आ गया था। नेपथ्य में पहुंचा और पाँच मिनट में प्रशंसकों के जाने के बाद हबीब साहब ने बातचीत शुरू करने का इशारा किया और गहन मेकअप को स्वयं उतारते हुए सारे प्रश्न सुनने की इच्छा जाहिर की। मैंने एक-एक सवाल पढना शुरू किया- वे स्वीकार में सिर हिलाते रहे...कि 3-4 सवालों के बाद एक सवाल आ गया, जो मामला थोडे ही दिनों पहले ‘संडेमेल’ में पढने को मिला था – ‘आपके और रामचन्द्र देशमुख के छत्तीसगढी रंगकर्म मे क्या अंतर है और किन मुद्दों पर आप दोनो में मतभेद है’ ? उनका तेवर थोडा-सा बदला, प्रतिप्रश्न आया – तो, आप यह भी लिखने वाले हैं? मैं ज्यादा कुछ भाँप न पाया और उसी रौ में कह गया- आप जो जवाब देंगे, उसे ज़रूर लिखूँगा... बस, वे झटके से यूँ खडे हुए कि मैं डर ही गया। दरवाज़े का रास्ता दिखाते हुए गरजे- ‘निकल जाइए आप। मुझे कोई बात नहीं करनी आप से...’। सबकुछ अचानक बदल गया। मैं चकित, अवाक...मामला समझने की कोशिश कर रहा था और वे न जाने क्या-क्या तडकते जा रहे थे। आवाज सुनकर मोनिकाजी (उनकी पत्नी) आयीं। उन्हें शांत किया। मुझसे पूछा कि मैंने क्या कह दिया...। बताया कि उन्हें हाई बीपी है। फिर पानी आया। शायद चाय भी पी गयी। उनका मेकअप उतरा। हम किसी और केबिन में बैठे। बातें हुईं। पता लगा कि रामचन्द्र देशमुख लोकनाट्य के नाम पर कमाने-खाने का धन्धा करते हैं और अख़बारों वग़ैरह में अपने को हबीब साहब के प्रतिस्पर्धी के रूप में प्रोजेक्ट करते हैं, जो इन्हें बहुत नाग़वार लगता है। कायदे से बात पूरी भी हुई, पर मैं लिख न सका- शायद जिस बेक़ायदे से शुरुआत हुई, उससे मन बिदक गया– इतना बडा कलाकार इतनी-सी बात पर इतना बेक़ाबू कैसे हो सकता है, का दंश सालता रहा। अन्दर से बिदकना ऐसा रहा कि लेंस का कवर खोले बिना ही मैंने फोटोज़ ले डाले थे, जिसका पता घर जाकर लगा। यह 18 साल पहले की बात है, वरना ऐसा न होता...। पर उनके काम इतना मुतासिर रहा कि नाटक देखते रहा। गोवा के बाद मैं पूना चला गया। वहाँ ‘थियेटर अकादमी’ के फेस्टिवल में भेंट हुई। उन्होंने पहचाना नहीं, मैं क्यों बताता? अच्छा ही लगा- कटु स्मृति नहीं रही। याद आता है कि ‘बाल गन्धर्व’ में सुबह खुली बातचीत थी। बंसी कौल भी मंच पर थे- नाटक लेकर आये थे। दोनो से बातचीत शायद महेश एलकुंचवारजी कर रहे थे। कोई गीत गाने की फ़रमाइश हुई। बंसी भाई बगली काट गये, तो हबीब साहब से विनम्रतावश कहा गया कि आप अपने किसी कलाकार से गवा दीजिए। मुझे उनके शब्द याद हैं। खींचकर बोले थे– ‘क्यूँकर? तक़ाज़ा मुझसे हुआ है’। और अपना वो प्रिय ‘पॉप्युलर’ गीत सुनाया था- ‘सास गारी देवे, ननद मुँह लेवे, देवर बाबू मोर...सइंया गारी देवे, परोसी ग़म लेवे...’। और इन तमाम रूपों से समझ में आया ‘प्रतिभाएं जुनूनी हुआ ही करती हैं’ (कबीर के लिए द्विवेदीजी की कही बात)। नये सिरे से बात करने की इच्छा बलवती होती रही...। आख़िरस, भोपाल जाकर बात करने का समय लिया, पर दुर्दैव ने पीछा नहीं छोडा। निश्चित तारीख़ से एक सप्ताह पहले ख़बर आयी - उसी वक्त हबीब साहब को कहीं जाना पड गया और बात रह गयी। भेंट हुई 2003-4 में जाकर इप्टा, रायगढ के नाट्योत्सव में, जो हबीब साहब पर ही केन्द्रित था। मैं ख़ास प्रेक्षक के रूप में आमंत्रित था। छह दिन साथ रहने का मौका मिल रहा था। पहुँच गया। फिर तो उठना-बैठना, खाना-पीना साथ होता। तमाम बातें होतीं। रिहर्सल देखते। बस, रात को सोने भर नज़रों से दूर रहते। उस वक्त वे 80 साल के पार थे और उनकी सक्रियता हैरत में डालने वाली थी। 16-17 घंटे काम करते। स्मृति ग़ज़ब की...! सब कुछ याद। किसी भी विषय पर एकदम अपडेट। ढेरों बातें होती रहीं, पर जानबूझकर छिट-फुट ही। क्योंकि आयोजकों ने विधिवत साक्षात्कार का एक सत्र रखा था; जिसमें तमाम श्रोताओं के बीच मुझे उनसे बात करनी थी। वह समय आया भी, बातें खूब जमकर हुईं। हबीब साहब अपने स्वभाव व सुभाव के मुताबिक खुलकर बोले। याद में बस गये एक उदाहरण का मोह-संवरण नहीं कर पा रहा हूँ...। उनके व्यस्त कार्यक्रम को सुनते-सुनते बीच में चुहल के अन्दाज़ में पूछ बैठा था- इतने कामों के बीच शादी का समय कैसे निकाल पाये? उन्होंने तपाक से कहा - मोनिकाजी के पक्ष वालों का दबाव बढता जा रहा था। मेरे काम कम होने का नाम नहीं ले रहे थे। एक दिन घेराव जैसा कर लिया। बस, मैंने कैलेंडर खोला। बताया कि देखो – ये-ये तारीखें शो की हैं। ये-ये रिहर्सलों की हैं। इस-इस दिन मीटिंग है। ये व्याख्यान है। ये वर्कशॉप है...अच्छा लो, ये एक डेट खाली है। उस दिन करना है, तो जहाँ कहो, मैं आ जाऊँ। ये नहीं हो पाया, तो मैं कह नहीं सकता कि कितने दिनों लग जायेंगे कोई खाली दिन पाने में। चुनांचे उसी दिन हो गयी। बस ! मैंने चुहल आगे बढा दी – फिर हनीमून कैसे मना? हबीब साहब उतने ही तपाक से– वो तो आज तक नहीं मना। ...ग़रज़ ये कि ऐसी बहुत-सी बातें हुई थीं। लगभग दो घंटे रेकॉर्डिंग लाइव कैमरॉ में दर्ज़ हुई। हबीब साहब से टुकडों मे हुई ढेरों बातों को मिलाकर सोचा था कि बढिया-सी स्टोरी बनाऊँगा। उनकी कार्य- पद्धति देखी थी। अपनी टीम के साथ उनके सलूक का चश्मदीद हुआ था। बडा सुन रखा था कि शोषण करते हैं। उनसे नौकरों की तरह पेश आते हैं। इसीलिए मैंने लगभग सभी सदस्यों से बातें की थीं। पहले कोई तैयार न हुआ। शायद हबीब साहब के कानों तक बात पहुँची। उन्होंने कुछ कहा होगा। फिर सबने बातें कीं - नगिन (उनकी एकमात्र संतान) ने भी। कुछ ने कम, कुछ ने ज्यादा। पता लगा कि सभी कलाकार ख़ुश हैं। मानते हैं कि ‘साहब’ न होते, तो उन्हें कौन पूछता? हबीब साहब सबकी निजी समस्याओं से भी वाक़िफ़ रहते हैं। उन्हें हल भी करते हैं। हर तरह की बातें उनसे होती हैं। एक मज़ेदार बात मालूम हुई कि रामचरन निर्मल ने एक व्यंग्य-विनोदभरी कविता लिखी है हबीब साहब पर। किसी को न बताने की शर्त पर उसने मुझे सुनायी और मैंने लिख ली। बाद में पता लगा कि सभी जानते हैं। सभी सुन चुके हैं। पता हबीब साहब को भी है- शायद सुनी भी हो। तो क्या निर्मल मुझे बना रहा था या परीक्षा ले रहा था। इस वक़्त मैंने खोजी, तो फाइल में दबी पडी मिल गयी। आप सुनना चाहेंगे? क्या छिपाना, जब सभी जानते हैं ! असली मज़ा आयेगा, उन्हें जानने वालों को। “होकर कौतूहल के बस में/ गया एक दिन मैं सर्कस में भै बिस्मय के काम अनोखे/ देखे बहु व्यायाम अनोखे एक बडा-सा बन्दर आया/उसने झट्पट लैम्प जलाया डट कुर्सी पर पुस्तक खोली/आ तबतक मैना यूँ बोली- हजिर है हुज़ूर का घोडा/चौंक उठाया उसने कोडा आया तब तक एक बछेडा/ चढ बन्दर ने उसको फेरा टेटू ने भी किया सपाटा/टट्टर फाँदी चक्कर काटा फिर बन्दर कुर्सी पर बैठा/ मुँह में चुरुट दबाकर ऐंठा माचिस लेकर उसे जलाया/ और धुआँ भी खूब उडाया ले उसकी अधजली सलाई/ टेटू ने यों तोप चलायी (इसके आगे के संकेत मुझे भी समझ में नहीं आते, पर पढ लें...) एक मनुष्य अंत में आया/ पकडे हुए सिंह को लाया मनुष्य-सिंह की देख लडाई/ की मैंने इस भाँति बडाई किसे साहसी जन डरता है/ नर नाहर को वश करता है मेरा एक मिंत्र तब बोला/भाई, तू भी है बस भोला यह सिंही का जना हुआ है/ किंतु स्यार अब बना हुआ है यह पिंजडे में बन्द रहा है/ नहीं कभी स्वच्छन्द रहा है छोटे से यह पकडा आया/ मार-मार कर गया सिखाया” बता दूँ अपने दुर्भाग्य की बात। जब मुम्बई आने के काफी दिनों बाद तक लाइव कैमरे की रेकॉर्डिग नहीं आयी, उषा व अजय आठले को फोन किया। पता लगा कि वह पूरी रेकॉर्डिग किसी हादसे का शिकार होकर नष्ट हो गयी। मन तडप कर रह गया। यह कह-कहकर संतोष किया कि ‘कुछ इच्छाएँ अधूरी रह जायें, तो जीवन में आस्था बनी रहती है। अब वे यादें ही जिन्दा हैं...। ख़ैर, उनकी टीम में ऐसा हँसी-खुशी, हास्य-विनोद का माहौल देखा। लेकिन अपने जन्मप्रदेश के जनसामान्य में हबीब के प्रति जो सम्मान देखा, वह रोमांचक है। एक शाम ‘मिलनयात्रा’ निकली। यह आयोजन भी भारतीयता की उसी परम्परा का अंग है, जिसके पोषण का हामी हबीबजी का पूरा रंगकर्म है। आगे-आगे हबीबसाहब पैदल ही...। साथ में ग्रुप के कलाकार, रंगोत्सव के आयोजक व हमसब और पीछे बढता हुआ हुजूम। रास्तों के दोनो तरफ लोग फूल-मालाएँ लिए खडे...अपने प्रिय कलाकार को अपने हाथों देने-पहनाने को आतुर। और ये जुटाये हुए लोग नहीं थे. जैसे राजनेताओं के लिए आजकल होते हैं। इनमें सच का प्यार उमड रहा था। होंठ प्रस्फुरित हो रहे थे, आँखें चमक रही थीं…। हर गाँव में छोटा-छोटा मंच सजा था। मंच पर पहुँचते हबीब साहब पर पुष्प-वर्षा होती। गाँव के प्रधान-पंच वग़ैरह स्वागत करते - चन्द शब्द हबीब साहब से सुनना चाहते। वे बोलते भी, पर अपने को व्यक्त करने के हजारों तरीकों से लैस इतने महान कलाकार को अभिव्यक्ति के ऐसे संकट से गुज़रते हुए देखना भी एक अनोखा अनुभव था। दो महाकवियों के शब्दों में – ‘प्रेम न हृदय समात’ और इसीलिए ‘कण्ठ: स्तम्भित वाष्पवृत्ति’ वाला हाल हो गया था। यह किसी भी कलाकार के लिए सबसे बडा गौरव है। यह देखकर मुझे वे टिप्पणियां एकदम बकवास लगीं, जिनमें ‘हबीब अपने क्षेत्र में जा नहीं सकते। उन्होंने वहाँ के लिए कुछ नहीं किया...’ वग़ैरह कहा जाता है। ऐसा कहने वाले लोग ही अब उनके जाने के बाद छत्तीसगढ की सरकार से उनका स्मारक बनाने के लिए प्रच्छन्न ग़ुज़ारिशें कर रहे हैं। वह तो बनेगा ही और उसके भी निहित मक़सद होंगे – ठीक कहने वालों की ही तरह । पर उससे क्या होगा? एक सरकारी खानापूर्त्ति। गान्धीजी तक की तमाम मूर्त्तियाँ गन्दगी से भरी पडी हैं और फाइल से चलायमान सरकार के पास सफाई तक का बजट नहीं है। प्रेमचन्द, ग़ालिब, निराला... सबका यही हाल है। पर ऐसी अज़ीम शख़्सियतों के स्मारक वहीं होते हैं – लोगों के दिलों में। और वह बन चुका है, जो कभी धूमिल तक न होगा। ‘हबीब साहब ने अपने थियेटर की कोई परम्परा नहीं छोडी’, ‘नया थियेटर’ का कोई समर्थ वारिस नहीं’... जैसी आलोचनाओं के जवाब भी इसी सत्य में निहित हैं। ये परम्परायें अवाम की यादों में अक्षुण्ण रह्ती हैं। और कालिदास की परम्परा में दूसरे कालिदास पैदा नहीं होते। वे हर ज़हीन कवि की कविताओं में समाये होते हैं। ग़ालिब में ख़ुशरो कहाँ दिखते हैं? पर उन्होंने ख़ुद कहा है- ‘पीते हैं धोके ख़ुशरु-ए-शीरीं सुख़न के पाँव’। इसी तरह हबीब साहब की परम्परा व ‘नया थियेटर’ के वारिस ढेरों कलाकारों के कलाकर्म में समाये हैं। व्यक्त हो रहे हैं। उन्हें देखने के लिए नज़र चाहिए – शौक़-ए-दीदार अग़र है, तो नज़र पैदा कर’ - हबीब साहब (के नाटक) की तरह ‘देख रहे हैं नैंन’...। * * * सम्पर्क- ‘नीलकण्ठ’, एन.एस. रोड नं.-5, विलेपार्ले (पश्चिम), मुम्बई- 400056 फोन- 022-26101987, मो.- 09819722077/09869355103 ई मेल- satyadevtripathi@gmail.com

Wednesday, 19 November 2008

संवेदनाएं प्रैक्टिकल हो रही हैं...!!

कल एम.ए.-द्वितीय वर्ष की मौखिकी (वाइवा) चल रही थी... एक लडकी आयी। चल नहीं पा रही थी। थोडी देर में अपनी साथी प्राध्यापिकाओं की बातों से समझ में आ गया कि गर्भवती है। ऐसे में मैं हर स्त्री के चेहरे पर ‘कामायनी’ के श्रद्धा वाले वर्णन का सच जाँचने लगता हूँ...। उसका ‘केतकी गर्भ-सा पीला मुख’ तो था, पर ‘आँखों में आलस भरा स्नेह’ नदारद था। इसी तरह ‘कुछ कृशता नयी लजीली-सी’ की जगह ‘अति दुबली दुख की प्रतिमा-सी’ बनी पडी थी...हाँ, ‘कम्पित लतिका-सी लिए देह’ अवश्य साकार दिखी...। मुझसे रहा न गया। पूछ बैठा- ससुराल के घर से आ रही हो? उसने ‘ना’ में सिर भर हिलाया। तो कब आयीं माँ के घर? – मैंने पूछा। पाँच-छह दिन हुए... के उत्तर के बाद मैं अचानक विनोद के स्वर में पूछ बैठा –‘अच्छा, मायके और ससुराल के जीवन के अंतर पर कुछ बोलो...’ और वह फफक कर रो पडी...। टेबल पर सर टिका कर आँसू पोंछते हुए उसकी सिसकती आवाज निकली- ‘पिताजी लाने गये थे। बहुत झगडा हुआ...। वाइवा तक के लिए आयी हूँ। परसों वापस पहुंचाना है...’। अब दोनो जीवन का क्या अंतर जानना बचा था !! विषय पर कुछ बातचीत के बाद वह जाने को उठी। दरवाजे तक गयी कि अचानक मैंने उसे बुलाया और पूछा- ‘यदि कल का वाइवा एक सप्ताह के लिए आगे बढा दिया जाये, तो तुम इतने दिन और मायके रह पाओगी?’ वह एक मिनट खडी सोचती रही और बोली – ‘नहीं सर, जाने दीजिए...। वो लोग ज्यादा ही झगडा करेंगे...। फिर आखिर तो रहना वहीं है – ऐसा कितने दिन करेंगे...?’ स्वीकृति में सर हिलाने के अलावा मेरे पास कोई चारा न था..। वह तो चली गयी...। पर मुझे वह घटना याद दिला गयी, जहाँ मेरे पास चारा था। पिछले महीने की दीवाली के एक दिन पहले की घटी अपने भाई की बेटी की घटना...। बेटी को हमने बडे लाड से पाला। एम.ए. तक पढाया। बडे रज-गज से शादी की। लडका अपने ही जिले के शहर में अच्छी नौकरी में है। उम्मीद थी कि शहर में बेटी भी कुछ करेगी। अच्छा जीवन होगा। लेकिन चार भाइयों व पिता के सम्मिलित परिवार का दबाव ऐसा कि बच्ची को पडोसी के घर तक जाने की इजाज़त नहीं। थोडी ही दूर पर उसके साथ 14 सालों तक पढी सहेली की ससुराल है, पर वहाँ जाने या उसे अपने घर बुलाने की मनाही । दो कमरों में दो बच्चों को लेकर सडने पर विवश। कभी कहीं घूमने-फिरने जाने की कोई सूरत नहीं। एक चम्मच तक खरीद नहीं सकते अपनी मर्जी से – फ़िल्म आदि देखने की तो बात ही क्या? घर से पूछना पडता है सबकुछ...। हर शनिवार की शाम 15 किमी. पर स्थित गाँव जाना ही पडता है – बाइक पर दोनो बच्चों को लेकर। फिर सोम की सुबह वैसे ही आना...। बस, इसके अलावा कहीं कुछ नहीं। हमारे यहाँ तक आने देने में हजार बहाने-बन्दिशें। इस-उस कारण से तीन-तीन, चार-चार साल तक बिदाई नहीं। बेटी पस्त्। आकुल। भाई भी बेकल, पर झगडे और बेटी के पिसने के डर से चुप । मेरे उबाल पर भी भाई के संकोच का ढक्कन। और इस दीवाली के एक सप्ताह पहले किसी तरह बिदाई हुई थी। दीवाली मनाकर वापस जाने की बात थी। संयोग से मैं भी पहुंच गया था। बेटी से बातें करते और दोनो नातियों के साथ खेलते हुए बडा मज़ा आ रहा था... कि दीवाली के दो दिन पहले समधी आ गये। और शाम को अचानक बिदाई पर ज़ोर देने लगे। कहा कि दीवाली की पूजा है, पूरे परिवार का साथ रहना जरूरी है। मैं बिफर पडा – ‘यह बात बिदाई के पहले क्यों नही की ?’ ... भइया घर पे नहीं थे। और पिछ्ली सारी बातों का असर रहा होगा। कई सालों का बन्द ढक्क्न ऐसा खुला कि मैंने एकदम ‘ना’ कह दिया। और मन ही मन तैयार हो गया- सारे झगडे के लिए। सोच लिया कि कोर्ट-कचहरी भले हो जाये, पर इस साँसत से निकलना ही होगा- सम्बन्ध रहे, चाहे टूटे...। इस सडाँध को झेलने से टूट जाना ही बेहतर। बस, इसी रौ में उनके सारे रहन-सहन, सोच-सलूक पर एकदम साफ-साफ, काफी कुछ कह भी दिया – बेशक़ शांत लहज़े और सुथरी भाषा में...। समधी तो चले गये, पर दूसरे दिन दामाद आ गया- शायद पिता ने मेरे कहने को नमक –मिर्च लगाकर बताया होगा। शहर से अपने घर न जाकर सीधे मेरे घर आया। शाम को घर में सिर्फ औरतें व बच्चे थे। एकाध घंटे ही रहा और हमें तो किसी ने बताया नहीं, पर पता लगा कि लगातार कुछ कहता-धमकाता रहा। छह साल के नाती ने जरूर कहा- ‘नाना, आप नहीं थे, तो पापा आये थे। मम्मी से कह रहे थे- ‘पत्नी के लिए सबसे बडा होता है पति। भगवान से भी बडा..। क्या पति भगवान से भी बडा होता है..’। मैं क्या बताता ! मुझे चुप देखकर फिर बोला- ‘बताओ न नाना, पापा आज ऐसा क्यों कह रहे थे? रोज़ तो भगवान को सबसे बडा बताते हैं’। मैं हतप्रभ... ! पर अब बच्चे के मानस-पटल पर दरार न पडने देने के लिए कुछ तो बताना ही पडेगा..., सोचते हुए मेरे मुँह से निकला – ‘मेरे लिए तो सबसे बडा है – मेरा ये नन्हा-सा नाती। भगवान से भी बडा...’ कह्ते हुए उसे गोद में लेकर उछाल दिया...और हँसते हुए ‘और उछालो, और उछालो’ कहने में वह अपना सवाल भूल भी गया। लेकिन कुछ ही देर बाद समधीजी बाइक पर नमूँदार हुए अपने बडे बेटे के साथ। गडबड का पूरा अन्देशा हो गया...। गाँव को जवाब देने का ख्याल सबसे पहले आया... नयी नताई ! कल ही गये हैं समधी... आज फिर क्यों आ गये इतनी रात को !! शाम को दामाद आया था...। याने गाँव सोच रहा होगा कि क्या हो रहा है। ख़ैर, चाय-पानी हुआ। खाना-वाना खाकर सोया गया। सुबह नाश्ता करते हुए शुरू हुए समधी महोदय– ‘जरा ध्यान से सुनिए प्रोफेसर साहब, आप तो पढे-लिखे हैं। बात को समझिए... कल शाम को मेरे मना करने के बावजूद मेरा बेटा यहाँ आया था। बडा जिद्दी है। मानेगा नहीं। आप बहू को विदा कर दें। मैं उसे लेकर जाऊँ और सब बात खतम हो जायेगी’। सुनकर तो मेरे बदन में आग ही लग गयी, पर अपने घर का लिहाज रखते हुए मैंने भरसक पूरी नरमी से ही कहा – ‘देखिये, कल मैंने इतनी बातें कीं...और आज आप बेटे को समझाने के बदले यहाँ चले आये लिवांने... यह तो उसे शह देना है। और मेरी बात वही है कि चार साल बाद बिटिया आयी है। अभी 8 दिन हुए... परसों दीवाली है। उसकी बहन आयी है, कल बुआ आ रही है। मैं आ गया हूँ। इतना सब संयोग बन गया है, तो इस बार हमें साथ में दीवाली मना लेने दीजिए...जिन्दगी भर तो आपके यहाँ रहना ही है। चार साल बाद कम से कम दस दिन मायके में रहने का संतोष भी हो जायेगा’। परंतु वे मेरी बात को जैसे अनसुनी करते हुए बोले- ‘आप मेरी स्थिति को समझिये... बच्चे के दिमाँग की सोचिये..। और् बिदाई कर दीजिए। बस, मैं इतना ही कहूँगा’। ‘और मैं कहूँगा कि आप मेरी बात को समझिए, पर आप तो सुनना तक नहीं चाह रहे हैं। अब बेटे को आप तीन दिन कैसे सँभालेंगे, आप सोचिए’- शब्दों पर दबाव बढ गया। ‘तो मतलब कि बिदाई नहीं होगी...?’- ढिठाई थी पूछने में....। ‘बिदाई होगी- दीवाली बाद। उसी दिन, जो कल तय हुआ’- उतनी ही ढिठाई आवाज में। ‘तो ठीक है, तब तक हम भी यहीं रहेंगे, उसी दिन जायेंगे लिवाकर ही...’। बस, अब तो मेरा पारा सातवें आसमान पर ‘तो तुम धरना दोगे हमारे दरवाजे पर ? और हम देने देंगे? अब तो आप को जाना ही होगा’। वो थोडा हँसे- ‘तो क्या आप भगा देंगे? मैं तो यहीं ओरी की नीचे निखरह्री खाट पर भी सो लूँगा- जमीन पर सो लूँगा, पर जाऊँगा बहू को लेकर ही...’। मेरे हाथ उठे ही थे –‘निकल जाओ’- कहने के लिए कि अचानक मैंने अपने हाथ को बेटी के हाथों में थमा पाया । भर सिर को आँचल से ढँके वह अपने ससुर और मेरे बीच खडी हो थी। मुझे विश्वास तो अब नहीं हो रहा, पर सुनी मैंने अपने ही कानों से अपनी ही पाली बेटी की आवाज... वह अपने ससुर से मुखातिब थी - ‘मैं चलूँगी पापा, आप अभी लेकर चलिए...’ और फिर मेरी तरफ़ मुडी। शब्द निकलने के पहले ही मैंने उसके होंठों पर हाथ रख दिया। और बोला- ‘ठीक है बेटा, अब मुझे कुछ नहीं सुनना है। मैं गाडी मँगाता हूँ अभी। और तुम लोग चले जाओ... अब तुम वहीं रहोगी। बस, सब खत्म..’। और मैं चल पडा गाडी वाले को फोन करने...। लेकिन फिर बेटी के जाने तक घर वापस न आ सका। बगल वाले भाई के दरवाजे पर पडी एक खाट पर पड गया। पडे-पडे ख्याल आया अपनी बडी बहन का...। तब मैं नवीं में पढ रहा था। बहन किसी झगडे के कारण ससुराल से अपने आप चली आयी थी। दो-तीन दिन बाद उसके ससुर लेने आये थे। मैंने बचपनी आक्रोश में मना कर दिया था- अब मेरी बहन उस घर में नहीं जायेगी। घर के किसी ने मेरी बात का विरोध नहीं किया था। उसके ससुरजी नाराज होकर चले गये थे। जाते हुए कह भी गये थे – आज तक कोई अपनी बहन-बेटी को जिन्दगी भर रख नहीं पाया है बेटा...। और मैंने उसी जुनून में कह दिया था – मैं वही करके दिखा दूँगा...। चार साल रही बहन अपने दो बच्चों के साथ, कभी चूँ तक नहीं किया । और उसी ससुर के मरने के बाद मैंने ही पहुँचाया था, तब गयी थी। उस दिन लगा कि मेरी बहन बेवकूफ़ थी- और मैं तो आज भी हूँ। उसे भी चले जाना चाहिए था। किस बिसात पर मैंने उसे रोका था और किस उम्मीद पर वह रुकी थी !! अब तो मेरे पास बिसात है। नियम-कानून हैं। पर बेटी चली गयी...। जवाब दिया आज इस छात्रा ने...। और अचानक मन में कौंधा– संवेदनाएं अब काफ़ी प्रैक्टिकल हो रही हैं और मैं आउट ऑफ़ डेट...। ** ** ** सम्पर्क- नीलकण्ठ, एन एस रोड न.-5, विलेपार्ले-पश्चिम, मुम्बई – 400056, मो-

Saturday, 9 August 2008

सिंग इज़ किंग...नाम में क्या नहीं है...! अनीस बज़्मी को अंग्रेजी नामों का खासा मोह है। ‘नो एंट्री’, ‘वेलकम’ को तो हिन्दी में कह सकते थे, पर ‘सिग इज़ किंग’ को तो हिन्दी में ढालना भी कठिन है, पर है इतना सरल कि अंग्रेजी लगता नहीं। तभी तो सिगों की कुछ ट्रकों के पीछे भी दिख जाता है...। क्या जाने वहीं से ले लिया हो..! लेकिन फिल्म का नाम बनने के बाद इसका जल्वा देखकर आज होते, तो शेक्स्पीयर भी ‘नाम में क्या रखा है’ को बदलकर कर देते- ‘नाम में क्या नहीं है?’। ऐसा हिट हुआ कि कहाँ-कहाँ फ़िट होने लगा ! ख़बरों-एसएमएसों आदि में सिंग लोग किंगमय होने लगे। विश्वास पाकर मनमोहन सिंह, छह विकेट लेकर हरभजन सिंह किंग हो गये। अमर सिह भी नहीं बचे। नाम ही नारा हो गया। प्रचार भी भीषण हुआ। और इसी के चलते कुछ न करने वाले सिंग लोग नाम को देखकर ही तूफ़ान मचाने चल उठे...। लेकिन फिल्म देखकर लगा कि तूफ़ान मचाने जैसा तो प्याला भी नहीं है और यह नाम अपने काम में भी कुछ ऐसा ‘किंग साइज़’ नहीं है। हैपी सिंग बना अक्षय कुमार बेचारा गाँव का भोलाभाला लडका है। सबकी मदद करता है। ईमानदार है। भावुक है। सो, चढाने पर कुछ भी करने को चढ जाता है - मुर्गी पकडने से लेकर ऑस्ट्रेलिया में डॉन बन बैठे अपने गाँव के दोस्त लकी सिंग (सोनू सूद) को वापस लाने तक का...। मुर्गी पकडने में पूरे गाँव के सामान तहस-नहस करता हैं, तो लकी सिंग को विरोधी गैंग वालों से बचाने में उसी के सर-पैर तोड डालता है। इन सबमें गँवईंपने को बेहद बढा-चढा कर दिखाने से फ़ार्स वाला हास्य बनता तो है, पर हँसी लाने तक खींचने में दृश्यों का कीमा भी बन जाता है। साथ में ओमपुरी हैं, जो ‘मेरे बाप पहले आप’ स्टाइल में बर्बाद होने के लिए टाइप्ड होते जा रहे हैं। लेकिन हैपी सिग की तो यही सब पहचान बन जाता है, जिसे निभाने के मास्टर हो चले हैं अक्षय - नमस्ते लंडन व भूलभुलैया आदि से..। फिर ऐसे कारनामे खोज-खोज कर शामिल किये गये हैं, जिनके चलते बडी कुशलता से कहानी भी बनती जाती है। ऑस्ट्रेलिया जाने में इजिप्ट पहुंच जाना गँवरपन के चलते है, पर वहाँ सोनिया (कैटरीना कैफ़) का पर्स लेकर भागने वाले को मुर्गी के अन्दाज में पकडना ऐक्शन है। उसे दिल दे बैठना फिल्मी है। फिर ऑस्ट्रेलिया में उसी की माँ (किरन खेर) के यहाँ रहना और उसी के चलते लकी सिंग की गैंग में पैठना, लकी का बीमार व हैपी का सरगना बन जाना...आदि सब असम्भव के आकस्मिक जोड का मसाला भी है, पर कथाकला का सबब भी। कैटरीना आती है अपने ब्वायफ्रेंड (रनवीर शौरी) के साथ, पर हिन्दी फिल्म का दर्शक जानता है कि वो मिलेगी हीरो को ही। सो, लकी की गैंग ढेरों मेलोड्रामा रचती है, जो खासे मनोरंजक बन पडे हैं - बस, आप दिमाँग को पूर्ण विश्राम देकर उनका विशुद्ध मजा लेने का मन बना लें। हैपी पूरी गैंग को हिंसक से अच्छा इंसान बनाता है, जो फिल्म का शुभ पक्ष है और इस प्रयत्न में सभी चरित्रों व कलाकारों - नेहा धूपिया, यशपाल शर्मा, मनोज पाहवा, कमल चोपडा, सुधांशु पाण्डेय आदि कलाकारों की पहचान बन जाना अच्छी कला का नमूना है। लेकिन हीरो के लिए सबके रोल का कटना छिपता नहीं। ऐसे में नामवाले जावेद जाफ़री के रोल का विस्तार भी खुल जाता है। किरन खेर की सदाबहार आवाज व अदा मोहक है, तो कैटरीना की सुन्दरता को अभिनय की दरकार नहीं। विरासती पुट के साथ नयेपन को मिलाकर संवाद फिल्म के किंगपने को सार्थक करते हैं - ‘मैं कहता हूँ सच, अच्छा तो अपने आप लगने लगता है’। गीत कई हैं, पर शीर्षक गीत के सिवा सभी औसत हैं और औसत संगीत से मिलकर औसत मनोरंजन दे जाते हैं। और लगता है कि औसत के स्तर से ऊपर उठना आज की हिन्दी फिल्मों को भूल-सा गया है। - सत्यदेव त्रिपाठी

Saturday, 2 August 2008

99 तमाचे और एक चुम्बन की ‘अगली और पगली’ ... सचिन खोत की फ़न्नी, पर अच्छा ‘टाइमपास’ फिल्म ‘अगली और पगली’ के अंत में पर्दे पर लिखा पाया जाता है - ‘99 स्लैप्स ऐण्ड वन किस’। पूरी फिल्म हम देखते रहे थे कि बात बात पर या बिना बात बात की बात पर हिरोइन मल्लिका शेरावत ज़ोरदार थप्पड मारती रही है हीरो रनवीर शौरी को। सो, हमने 99 मान लिया। और अपने जन्म दिन पर होटेल में झटके, पर धडल्ले से गालों पर चूमते देखा था, सो हिसाब बराबर समझ कर उठने ही चले कि दिखायी पडा- मल्लिका-रनवीर का होंठों में गाढे चुम्बन का दृश्य... और ख्याल आया कि ओह, हम भी कहाँ के दाना ठहरे कि ‘ख़्वाहिश-ए-मल्लिका’ को रुसवा करने चले थे- भला गालों पर ‘पुच्च’ कर देना भी कोई मलिका-ए-चुम्बन का चूमना हुआ...। ग़रज़ ये कि इज्जत रख ली खोत ने। दर्शकों का भी कुछ पैसा वसूल हुआ। चुम्बन चुलबुलाते निकले...। और काफ़ी पैसा वसूल हुआ मल्लिका के ‘आइटम नाच-गान’ में - दृश्यांकन (कैमरा व नियोजन) तो पूरी फिल्म का ही अच्छा है। फिर मल्लिका का भरपूर इस्तेमाल भी और भावन नैंनसुख भी। यूँ अभिनय भी कम नहीं। पगली की ख़िताब को अगली ने बनावटी गम्भीरता से अच्छा साकार किया - इसे अंग्रेजी का ‘अगली’ (जो सोचकर हम भी गये थे) कतई न समझें। और जब पगली है ही वह, तो प्रेमी को पेटीकोट पहनाकर बिना सीट की सायकल पर शहर में घुमाने जैसा सनक तथा ख़ुद भी अंतर्वस्त्रों को कपडों के ऊपर पहनकर कॉलेज जाने जैसा बोल्ड...क्या-क्या सब कराती-करती है कि हँसें भी और सर भी पीटें । पर इसी सबकी तो फिल्म है, जिसे आप जाके ही देखें कि खुद को मालिक व प्रेमी को गुलाम बनाकर कैसे रखती है ! फिर हीरो प्रेमी कबीर कैसे उसे सहर्ष निभाता है और दिखाता है कि मज़बूरन कर रहा है। इसी दोराहे के बीच उभरता है रनवीर के अभिनय का गुर कि बन और जम जाती है हीरो जैसी भरपूर साख़...। लेकिन इसी पागलपन व गुलामी के बीच बनता है वह विचित्र प्रेम भी, जिसके लिए चचा ग़ालिब ने कहा था- ‘यही है आज़माना, तो सताना किसको कहते हैं ; अदू के हो लिये जब तुम, तो मेरा इम्तहाँ क्यों हो’। बस, यहाँ आज़माने-सताने के इम्तहान में प्रेमी पास भी होता है और कोई अदू (दुश्मन) भी नहीं है। था तो पूर्व प्रेमी, पर मर चुका है और उसी ग़म में शराब पीने व रेल से कटकर मरने के लिए तैयार कुकहू टकराती है कबीर से...। याने मुख़्तसर से फ़ुटेज में पूरी मनोवैज्ञानिकता भी समा उठी है। निर्देशक की मज़बूत मनभावन पकड ऐसी कि सब होने में मज़ेदार नाटकीयता भी और हास्य में शालीन होती मनमानियाँ भी...। फिल्म शुरू होने के साथ हीरो निकला था जिस आँटी से मिलने, उससे मिल पाता है फिल्म के समाप्त होने के समय और यह नाटकीय यात्रा भी बन जाती है लाजवाब फ़न का सिला । बस, आँटी में ज़ीनत अमान ज़ाया होती हैं और बिना बताये लडकी के रात-रात भर ग़ायब होने को शराब पी-पीकर गिरने-सहने में बाप बने टीनू आनन्द भी...। पर कुछ अच्छा बनने के लिए किसी को तो बलि होना ही पडता है...। -सत्यदेव त्रिपाठी

Saturday, 26 July 2008

इस्तानबुल का मिशन टाँय-टाँय फ़िस्स अपूर्व लखिया को लगा कि ‘शूट आउट’ को मिशन और ‘लोखंड्वाला’ को ‘इस्तानबुल’ कर देंगे, तो एक और हिट बन जायेगी; पर भूल गये कि वह एक वारदात थी, जिसके निशानात लोगों की जेहन में थे। सो, लोग गये देखने। और जैसा कि हर घटना के पीछे एक कहानी होती है, वह कहानी भा गयी। फिल्म चल गयी। लेकिन यहाँ ओसामा व अलक़ायदा की छाप के साथ अमेरिकन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का छौंक भी काम न आया...। क्योंकि जो कहानी बनी, वह पिटी-पिटायी फिल्मी साबित हुई । ब्लॉस्ट में पत्नी-बच्ची को खोने के बाद बने स्वयंभू हीरो विवेक ओबेरॉय(रिज़वान) को इतने संसाधन व इतनी सूचनाएं कहाँ से मिलती हैं, लखिया ही लख सकते हैं। साथ में है नये हीरो बने ज़ायेद ख़ान, जिसका किरदार (विवेक साग़र) इतनी कम उम्र में आर्मी से निकलकर ‘आज तक’ का विश्वप्रसिद्ध रिपोर्टर बन गया है और किसी पद व जिम्मेदारी के बिना भी खासे बडे-बडे कारनामे करके आतंकवादी गैंग का खात्मा कर देता है। विवेक को हँसमुख व ज़ायेद को गम्भीर बनाने का बानक चरित्रांकन का सही जोड है, पर दोनो के ठीक करने के बावजूद फिल्म का कोई सही तोड नहीं बन पाता। इनके साथ मिशन में जुडती है श्वेता बजाज, जिसे ध्यान में आने लायक अदाकारी का मौका तो नहीं मिला है, लेकिन उसका चरित्र (लिज़ालोबो) अवश्य काफी रोचक है। ‘डॉन’ की ज़ीनत अमान की याद दिला देता है। और फिर तो आतंकवादियों की रोबोट जैसी गैंग से लडते हुए अमित-प्रान-ज़ीनत की तिकडी भी दिखती है और लाल डायरी के बदले कम्पुटर से उतारी सीडी है। बस, हॉय विवेक से प्यार न कराकर श्वेता को नाहक मरवा डाला !! लेकिन यहाँ पुलिस नहीं आती, क्योंकि जाँबाज़ लडाकू रिपोर्टर काफी हैं। पर दूसरा क्योंकि यह कि यहाँ सिर्फ़ गैंग लड रही होती है। दोनो सरगनों से दोनो हीरोज की आख़िरी, रुटीन और फिल्मी, लडाई अंत में होती है। निकेतनधीर (गज़्नी) की बलिष्ठ देह (बॉडी बिल्डर) काम नहीं आती और इतनी बडी आतंकवादी गैंग के सरगना का इतनी मोटी बुद्धिवाला होने पर पूरी फिल्म के दौरान विश्वास नहीं होता। पहले के खल पात्र स्मगलिंग का धन्धा करते थे और ऊपर से समाजसेवी बने रहते थे। अब धन्धा आतंकवाद का करते हैं और ऊपर से श्रेष्ठ मीडिया कर्मी बने हुए हैं। तभी तो पूरा टर्की उसकी घोषणा पर दोनो हीरो के पीछे पड जाता है...। नये हीरो की नयी हिरोइन श्रिया सरन का अभिनय भी बेजान है और उसका पूरा अंजलि-मामला भी ठूँसा हुआ है, जिसके न होने से कहानी पर कोई फ़र्क़ न पडता । अंत के सस्ते भावुक ड्रामा से भी दर्शक बच जाता और एक रस्मी गीत से भी। यूँ सभी गीत ऐसे ही हैं। अभिषेक बच्चन वाला ‘आइटम नाच-गान’ है, जो फिल्म की तो छोडिए, अभिषेक की पोल एक बार फिर खोल देता है। दूसरी अतिथि भूमिका स्वरूप सुनील शेट्टी तो गोया मरने के लिए ही आये थे..। मज़े का दृश्य जॉर्ज बुश वाला है, जहाँ वे म-न मो-ह-न कहना सीख रहे हैं और हॉल में जाते हुए एक दर्शक ‘मिशन इस्तानबुल’ कहना सीख रहा था... ‘मिशन काबुल’ व ‘मिशन इस्तकबाल’ कहे जा रहा था। जॉर्ज यह भी कह रहे थे कि ‘डोंट टच इंडियंस’ और बाहर निकलते हुए दूसरा दर्शक कहते सुना गया- डोंट सी दिस मिशन यार,...वैसे कहाँ है यह ‘इस्तानबुल’? -सत्यदेव त्रिपाठी