Wednesday, 19 November 2008

संवेदनाएं प्रैक्टिकल हो रही हैं...!!

कल एम.ए.-द्वितीय वर्ष की मौखिकी (वाइवा) चल रही थी... एक लडकी आयी। चल नहीं पा रही थी। थोडी देर में अपनी साथी प्राध्यापिकाओं की बातों से समझ में आ गया कि गर्भवती है। ऐसे में मैं हर स्त्री के चेहरे पर ‘कामायनी’ के श्रद्धा वाले वर्णन का सच जाँचने लगता हूँ...। उसका ‘केतकी गर्भ-सा पीला मुख’ तो था, पर ‘आँखों में आलस भरा स्नेह’ नदारद था। इसी तरह ‘कुछ कृशता नयी लजीली-सी’ की जगह ‘अति दुबली दुख की प्रतिमा-सी’ बनी पडी थी...हाँ, ‘कम्पित लतिका-सी लिए देह’ अवश्य साकार दिखी...। मुझसे रहा न गया। पूछ बैठा- ससुराल के घर से आ रही हो? उसने ‘ना’ में सिर भर हिलाया। तो कब आयीं माँ के घर? – मैंने पूछा। पाँच-छह दिन हुए... के उत्तर के बाद मैं अचानक विनोद के स्वर में पूछ बैठा –‘अच्छा, मायके और ससुराल के जीवन के अंतर पर कुछ बोलो...’ और वह फफक कर रो पडी...। टेबल पर सर टिका कर आँसू पोंछते हुए उसकी सिसकती आवाज निकली- ‘पिताजी लाने गये थे। बहुत झगडा हुआ...। वाइवा तक के लिए आयी हूँ। परसों वापस पहुंचाना है...’। अब दोनो जीवन का क्या अंतर जानना बचा था !! विषय पर कुछ बातचीत के बाद वह जाने को उठी। दरवाजे तक गयी कि अचानक मैंने उसे बुलाया और पूछा- ‘यदि कल का वाइवा एक सप्ताह के लिए आगे बढा दिया जाये, तो तुम इतने दिन और मायके रह पाओगी?’ वह एक मिनट खडी सोचती रही और बोली – ‘नहीं सर, जाने दीजिए...। वो लोग ज्यादा ही झगडा करेंगे...। फिर आखिर तो रहना वहीं है – ऐसा कितने दिन करेंगे...?’ स्वीकृति में सर हिलाने के अलावा मेरे पास कोई चारा न था..। वह तो चली गयी...। पर मुझे वह घटना याद दिला गयी, जहाँ मेरे पास चारा था। पिछले महीने की दीवाली के एक दिन पहले की घटी अपने भाई की बेटी की घटना...। बेटी को हमने बडे लाड से पाला। एम.ए. तक पढाया। बडे रज-गज से शादी की। लडका अपने ही जिले के शहर में अच्छी नौकरी में है। उम्मीद थी कि शहर में बेटी भी कुछ करेगी। अच्छा जीवन होगा। लेकिन चार भाइयों व पिता के सम्मिलित परिवार का दबाव ऐसा कि बच्ची को पडोसी के घर तक जाने की इजाज़त नहीं। थोडी ही दूर पर उसके साथ 14 सालों तक पढी सहेली की ससुराल है, पर वहाँ जाने या उसे अपने घर बुलाने की मनाही । दो कमरों में दो बच्चों को लेकर सडने पर विवश। कभी कहीं घूमने-फिरने जाने की कोई सूरत नहीं। एक चम्मच तक खरीद नहीं सकते अपनी मर्जी से – फ़िल्म आदि देखने की तो बात ही क्या? घर से पूछना पडता है सबकुछ...। हर शनिवार की शाम 15 किमी. पर स्थित गाँव जाना ही पडता है – बाइक पर दोनो बच्चों को लेकर। फिर सोम की सुबह वैसे ही आना...। बस, इसके अलावा कहीं कुछ नहीं। हमारे यहाँ तक आने देने में हजार बहाने-बन्दिशें। इस-उस कारण से तीन-तीन, चार-चार साल तक बिदाई नहीं। बेटी पस्त्। आकुल। भाई भी बेकल, पर झगडे और बेटी के पिसने के डर से चुप । मेरे उबाल पर भी भाई के संकोच का ढक्कन। और इस दीवाली के एक सप्ताह पहले किसी तरह बिदाई हुई थी। दीवाली मनाकर वापस जाने की बात थी। संयोग से मैं भी पहुंच गया था। बेटी से बातें करते और दोनो नातियों के साथ खेलते हुए बडा मज़ा आ रहा था... कि दीवाली के दो दिन पहले समधी आ गये। और शाम को अचानक बिदाई पर ज़ोर देने लगे। कहा कि दीवाली की पूजा है, पूरे परिवार का साथ रहना जरूरी है। मैं बिफर पडा – ‘यह बात बिदाई के पहले क्यों नही की ?’ ... भइया घर पे नहीं थे। और पिछ्ली सारी बातों का असर रहा होगा। कई सालों का बन्द ढक्क्न ऐसा खुला कि मैंने एकदम ‘ना’ कह दिया। और मन ही मन तैयार हो गया- सारे झगडे के लिए। सोच लिया कि कोर्ट-कचहरी भले हो जाये, पर इस साँसत से निकलना ही होगा- सम्बन्ध रहे, चाहे टूटे...। इस सडाँध को झेलने से टूट जाना ही बेहतर। बस, इसी रौ में उनके सारे रहन-सहन, सोच-सलूक पर एकदम साफ-साफ, काफी कुछ कह भी दिया – बेशक़ शांत लहज़े और सुथरी भाषा में...। समधी तो चले गये, पर दूसरे दिन दामाद आ गया- शायद पिता ने मेरे कहने को नमक –मिर्च लगाकर बताया होगा। शहर से अपने घर न जाकर सीधे मेरे घर आया। शाम को घर में सिर्फ औरतें व बच्चे थे। एकाध घंटे ही रहा और हमें तो किसी ने बताया नहीं, पर पता लगा कि लगातार कुछ कहता-धमकाता रहा। छह साल के नाती ने जरूर कहा- ‘नाना, आप नहीं थे, तो पापा आये थे। मम्मी से कह रहे थे- ‘पत्नी के लिए सबसे बडा होता है पति। भगवान से भी बडा..। क्या पति भगवान से भी बडा होता है..’। मैं क्या बताता ! मुझे चुप देखकर फिर बोला- ‘बताओ न नाना, पापा आज ऐसा क्यों कह रहे थे? रोज़ तो भगवान को सबसे बडा बताते हैं’। मैं हतप्रभ... ! पर अब बच्चे के मानस-पटल पर दरार न पडने देने के लिए कुछ तो बताना ही पडेगा..., सोचते हुए मेरे मुँह से निकला – ‘मेरे लिए तो सबसे बडा है – मेरा ये नन्हा-सा नाती। भगवान से भी बडा...’ कह्ते हुए उसे गोद में लेकर उछाल दिया...और हँसते हुए ‘और उछालो, और उछालो’ कहने में वह अपना सवाल भूल भी गया। लेकिन कुछ ही देर बाद समधीजी बाइक पर नमूँदार हुए अपने बडे बेटे के साथ। गडबड का पूरा अन्देशा हो गया...। गाँव को जवाब देने का ख्याल सबसे पहले आया... नयी नताई ! कल ही गये हैं समधी... आज फिर क्यों आ गये इतनी रात को !! शाम को दामाद आया था...। याने गाँव सोच रहा होगा कि क्या हो रहा है। ख़ैर, चाय-पानी हुआ। खाना-वाना खाकर सोया गया। सुबह नाश्ता करते हुए शुरू हुए समधी महोदय– ‘जरा ध्यान से सुनिए प्रोफेसर साहब, आप तो पढे-लिखे हैं। बात को समझिए... कल शाम को मेरे मना करने के बावजूद मेरा बेटा यहाँ आया था। बडा जिद्दी है। मानेगा नहीं। आप बहू को विदा कर दें। मैं उसे लेकर जाऊँ और सब बात खतम हो जायेगी’। सुनकर तो मेरे बदन में आग ही लग गयी, पर अपने घर का लिहाज रखते हुए मैंने भरसक पूरी नरमी से ही कहा – ‘देखिये, कल मैंने इतनी बातें कीं...और आज आप बेटे को समझाने के बदले यहाँ चले आये लिवांने... यह तो उसे शह देना है। और मेरी बात वही है कि चार साल बाद बिटिया आयी है। अभी 8 दिन हुए... परसों दीवाली है। उसकी बहन आयी है, कल बुआ आ रही है। मैं आ गया हूँ। इतना सब संयोग बन गया है, तो इस बार हमें साथ में दीवाली मना लेने दीजिए...जिन्दगी भर तो आपके यहाँ रहना ही है। चार साल बाद कम से कम दस दिन मायके में रहने का संतोष भी हो जायेगा’। परंतु वे मेरी बात को जैसे अनसुनी करते हुए बोले- ‘आप मेरी स्थिति को समझिये... बच्चे के दिमाँग की सोचिये..। और् बिदाई कर दीजिए। बस, मैं इतना ही कहूँगा’। ‘और मैं कहूँगा कि आप मेरी बात को समझिए, पर आप तो सुनना तक नहीं चाह रहे हैं। अब बेटे को आप तीन दिन कैसे सँभालेंगे, आप सोचिए’- शब्दों पर दबाव बढ गया। ‘तो मतलब कि बिदाई नहीं होगी...?’- ढिठाई थी पूछने में....। ‘बिदाई होगी- दीवाली बाद। उसी दिन, जो कल तय हुआ’- उतनी ही ढिठाई आवाज में। ‘तो ठीक है, तब तक हम भी यहीं रहेंगे, उसी दिन जायेंगे लिवाकर ही...’। बस, अब तो मेरा पारा सातवें आसमान पर ‘तो तुम धरना दोगे हमारे दरवाजे पर ? और हम देने देंगे? अब तो आप को जाना ही होगा’। वो थोडा हँसे- ‘तो क्या आप भगा देंगे? मैं तो यहीं ओरी की नीचे निखरह्री खाट पर भी सो लूँगा- जमीन पर सो लूँगा, पर जाऊँगा बहू को लेकर ही...’। मेरे हाथ उठे ही थे –‘निकल जाओ’- कहने के लिए कि अचानक मैंने अपने हाथ को बेटी के हाथों में थमा पाया । भर सिर को आँचल से ढँके वह अपने ससुर और मेरे बीच खडी हो थी। मुझे विश्वास तो अब नहीं हो रहा, पर सुनी मैंने अपने ही कानों से अपनी ही पाली बेटी की आवाज... वह अपने ससुर से मुखातिब थी - ‘मैं चलूँगी पापा, आप अभी लेकर चलिए...’ और फिर मेरी तरफ़ मुडी। शब्द निकलने के पहले ही मैंने उसके होंठों पर हाथ रख दिया। और बोला- ‘ठीक है बेटा, अब मुझे कुछ नहीं सुनना है। मैं गाडी मँगाता हूँ अभी। और तुम लोग चले जाओ... अब तुम वहीं रहोगी। बस, सब खत्म..’। और मैं चल पडा गाडी वाले को फोन करने...। लेकिन फिर बेटी के जाने तक घर वापस न आ सका। बगल वाले भाई के दरवाजे पर पडी एक खाट पर पड गया। पडे-पडे ख्याल आया अपनी बडी बहन का...। तब मैं नवीं में पढ रहा था। बहन किसी झगडे के कारण ससुराल से अपने आप चली आयी थी। दो-तीन दिन बाद उसके ससुर लेने आये थे। मैंने बचपनी आक्रोश में मना कर दिया था- अब मेरी बहन उस घर में नहीं जायेगी। घर के किसी ने मेरी बात का विरोध नहीं किया था। उसके ससुरजी नाराज होकर चले गये थे। जाते हुए कह भी गये थे – आज तक कोई अपनी बहन-बेटी को जिन्दगी भर रख नहीं पाया है बेटा...। और मैंने उसी जुनून में कह दिया था – मैं वही करके दिखा दूँगा...। चार साल रही बहन अपने दो बच्चों के साथ, कभी चूँ तक नहीं किया । और उसी ससुर के मरने के बाद मैंने ही पहुँचाया था, तब गयी थी। उस दिन लगा कि मेरी बहन बेवकूफ़ थी- और मैं तो आज भी हूँ। उसे भी चले जाना चाहिए था। किस बिसात पर मैंने उसे रोका था और किस उम्मीद पर वह रुकी थी !! अब तो मेरे पास बिसात है। नियम-कानून हैं। पर बेटी चली गयी...। जवाब दिया आज इस छात्रा ने...। और अचानक मन में कौंधा– संवेदनाएं अब काफ़ी प्रैक्टिकल हो रही हैं और मैं आउट ऑफ़ डेट...। ** ** ** सम्पर्क- नीलकण्ठ, एन एस रोड न.-5, विलेपार्ले-पश्चिम, मुम्बई – 400056, मो-

Saturday, 9 August 2008

सिंग इज़ किंग...नाम में क्या नहीं है...! अनीस बज़्मी को अंग्रेजी नामों का खासा मोह है। ‘नो एंट्री’, ‘वेलकम’ को तो हिन्दी में कह सकते थे, पर ‘सिग इज़ किंग’ को तो हिन्दी में ढालना भी कठिन है, पर है इतना सरल कि अंग्रेजी लगता नहीं। तभी तो सिगों की कुछ ट्रकों के पीछे भी दिख जाता है...। क्या जाने वहीं से ले लिया हो..! लेकिन फिल्म का नाम बनने के बाद इसका जल्वा देखकर आज होते, तो शेक्स्पीयर भी ‘नाम में क्या रखा है’ को बदलकर कर देते- ‘नाम में क्या नहीं है?’। ऐसा हिट हुआ कि कहाँ-कहाँ फ़िट होने लगा ! ख़बरों-एसएमएसों आदि में सिंग लोग किंगमय होने लगे। विश्वास पाकर मनमोहन सिंह, छह विकेट लेकर हरभजन सिंह किंग हो गये। अमर सिह भी नहीं बचे। नाम ही नारा हो गया। प्रचार भी भीषण हुआ। और इसी के चलते कुछ न करने वाले सिंग लोग नाम को देखकर ही तूफ़ान मचाने चल उठे...। लेकिन फिल्म देखकर लगा कि तूफ़ान मचाने जैसा तो प्याला भी नहीं है और यह नाम अपने काम में भी कुछ ऐसा ‘किंग साइज़’ नहीं है। हैपी सिंग बना अक्षय कुमार बेचारा गाँव का भोलाभाला लडका है। सबकी मदद करता है। ईमानदार है। भावुक है। सो, चढाने पर कुछ भी करने को चढ जाता है - मुर्गी पकडने से लेकर ऑस्ट्रेलिया में डॉन बन बैठे अपने गाँव के दोस्त लकी सिंग (सोनू सूद) को वापस लाने तक का...। मुर्गी पकडने में पूरे गाँव के सामान तहस-नहस करता हैं, तो लकी सिंग को विरोधी गैंग वालों से बचाने में उसी के सर-पैर तोड डालता है। इन सबमें गँवईंपने को बेहद बढा-चढा कर दिखाने से फ़ार्स वाला हास्य बनता तो है, पर हँसी लाने तक खींचने में दृश्यों का कीमा भी बन जाता है। साथ में ओमपुरी हैं, जो ‘मेरे बाप पहले आप’ स्टाइल में बर्बाद होने के लिए टाइप्ड होते जा रहे हैं। लेकिन हैपी सिग की तो यही सब पहचान बन जाता है, जिसे निभाने के मास्टर हो चले हैं अक्षय - नमस्ते लंडन व भूलभुलैया आदि से..। फिर ऐसे कारनामे खोज-खोज कर शामिल किये गये हैं, जिनके चलते बडी कुशलता से कहानी भी बनती जाती है। ऑस्ट्रेलिया जाने में इजिप्ट पहुंच जाना गँवरपन के चलते है, पर वहाँ सोनिया (कैटरीना कैफ़) का पर्स लेकर भागने वाले को मुर्गी के अन्दाज में पकडना ऐक्शन है। उसे दिल दे बैठना फिल्मी है। फिर ऑस्ट्रेलिया में उसी की माँ (किरन खेर) के यहाँ रहना और उसी के चलते लकी सिंग की गैंग में पैठना, लकी का बीमार व हैपी का सरगना बन जाना...आदि सब असम्भव के आकस्मिक जोड का मसाला भी है, पर कथाकला का सबब भी। कैटरीना आती है अपने ब्वायफ्रेंड (रनवीर शौरी) के साथ, पर हिन्दी फिल्म का दर्शक जानता है कि वो मिलेगी हीरो को ही। सो, लकी की गैंग ढेरों मेलोड्रामा रचती है, जो खासे मनोरंजक बन पडे हैं - बस, आप दिमाँग को पूर्ण विश्राम देकर उनका विशुद्ध मजा लेने का मन बना लें। हैपी पूरी गैंग को हिंसक से अच्छा इंसान बनाता है, जो फिल्म का शुभ पक्ष है और इस प्रयत्न में सभी चरित्रों व कलाकारों - नेहा धूपिया, यशपाल शर्मा, मनोज पाहवा, कमल चोपडा, सुधांशु पाण्डेय आदि कलाकारों की पहचान बन जाना अच्छी कला का नमूना है। लेकिन हीरो के लिए सबके रोल का कटना छिपता नहीं। ऐसे में नामवाले जावेद जाफ़री के रोल का विस्तार भी खुल जाता है। किरन खेर की सदाबहार आवाज व अदा मोहक है, तो कैटरीना की सुन्दरता को अभिनय की दरकार नहीं। विरासती पुट के साथ नयेपन को मिलाकर संवाद फिल्म के किंगपने को सार्थक करते हैं - ‘मैं कहता हूँ सच, अच्छा तो अपने आप लगने लगता है’। गीत कई हैं, पर शीर्षक गीत के सिवा सभी औसत हैं और औसत संगीत से मिलकर औसत मनोरंजन दे जाते हैं। और लगता है कि औसत के स्तर से ऊपर उठना आज की हिन्दी फिल्मों को भूल-सा गया है। - सत्यदेव त्रिपाठी

Saturday, 2 August 2008

99 तमाचे और एक चुम्बन की ‘अगली और पगली’ ... सचिन खोत की फ़न्नी, पर अच्छा ‘टाइमपास’ फिल्म ‘अगली और पगली’ के अंत में पर्दे पर लिखा पाया जाता है - ‘99 स्लैप्स ऐण्ड वन किस’। पूरी फिल्म हम देखते रहे थे कि बात बात पर या बिना बात बात की बात पर हिरोइन मल्लिका शेरावत ज़ोरदार थप्पड मारती रही है हीरो रनवीर शौरी को। सो, हमने 99 मान लिया। और अपने जन्म दिन पर होटेल में झटके, पर धडल्ले से गालों पर चूमते देखा था, सो हिसाब बराबर समझ कर उठने ही चले कि दिखायी पडा- मल्लिका-रनवीर का होंठों में गाढे चुम्बन का दृश्य... और ख्याल आया कि ओह, हम भी कहाँ के दाना ठहरे कि ‘ख़्वाहिश-ए-मल्लिका’ को रुसवा करने चले थे- भला गालों पर ‘पुच्च’ कर देना भी कोई मलिका-ए-चुम्बन का चूमना हुआ...। ग़रज़ ये कि इज्जत रख ली खोत ने। दर्शकों का भी कुछ पैसा वसूल हुआ। चुम्बन चुलबुलाते निकले...। और काफ़ी पैसा वसूल हुआ मल्लिका के ‘आइटम नाच-गान’ में - दृश्यांकन (कैमरा व नियोजन) तो पूरी फिल्म का ही अच्छा है। फिर मल्लिका का भरपूर इस्तेमाल भी और भावन नैंनसुख भी। यूँ अभिनय भी कम नहीं। पगली की ख़िताब को अगली ने बनावटी गम्भीरता से अच्छा साकार किया - इसे अंग्रेजी का ‘अगली’ (जो सोचकर हम भी गये थे) कतई न समझें। और जब पगली है ही वह, तो प्रेमी को पेटीकोट पहनाकर बिना सीट की सायकल पर शहर में घुमाने जैसा सनक तथा ख़ुद भी अंतर्वस्त्रों को कपडों के ऊपर पहनकर कॉलेज जाने जैसा बोल्ड...क्या-क्या सब कराती-करती है कि हँसें भी और सर भी पीटें । पर इसी सबकी तो फिल्म है, जिसे आप जाके ही देखें कि खुद को मालिक व प्रेमी को गुलाम बनाकर कैसे रखती है ! फिर हीरो प्रेमी कबीर कैसे उसे सहर्ष निभाता है और दिखाता है कि मज़बूरन कर रहा है। इसी दोराहे के बीच उभरता है रनवीर के अभिनय का गुर कि बन और जम जाती है हीरो जैसी भरपूर साख़...। लेकिन इसी पागलपन व गुलामी के बीच बनता है वह विचित्र प्रेम भी, जिसके लिए चचा ग़ालिब ने कहा था- ‘यही है आज़माना, तो सताना किसको कहते हैं ; अदू के हो लिये जब तुम, तो मेरा इम्तहाँ क्यों हो’। बस, यहाँ आज़माने-सताने के इम्तहान में प्रेमी पास भी होता है और कोई अदू (दुश्मन) भी नहीं है। था तो पूर्व प्रेमी, पर मर चुका है और उसी ग़म में शराब पीने व रेल से कटकर मरने के लिए तैयार कुकहू टकराती है कबीर से...। याने मुख़्तसर से फ़ुटेज में पूरी मनोवैज्ञानिकता भी समा उठी है। निर्देशक की मज़बूत मनभावन पकड ऐसी कि सब होने में मज़ेदार नाटकीयता भी और हास्य में शालीन होती मनमानियाँ भी...। फिल्म शुरू होने के साथ हीरो निकला था जिस आँटी से मिलने, उससे मिल पाता है फिल्म के समाप्त होने के समय और यह नाटकीय यात्रा भी बन जाती है लाजवाब फ़न का सिला । बस, आँटी में ज़ीनत अमान ज़ाया होती हैं और बिना बताये लडकी के रात-रात भर ग़ायब होने को शराब पी-पीकर गिरने-सहने में बाप बने टीनू आनन्द भी...। पर कुछ अच्छा बनने के लिए किसी को तो बलि होना ही पडता है...। -सत्यदेव त्रिपाठी

Saturday, 26 July 2008

इस्तानबुल का मिशन टाँय-टाँय फ़िस्स अपूर्व लखिया को लगा कि ‘शूट आउट’ को मिशन और ‘लोखंड्वाला’ को ‘इस्तानबुल’ कर देंगे, तो एक और हिट बन जायेगी; पर भूल गये कि वह एक वारदात थी, जिसके निशानात लोगों की जेहन में थे। सो, लोग गये देखने। और जैसा कि हर घटना के पीछे एक कहानी होती है, वह कहानी भा गयी। फिल्म चल गयी। लेकिन यहाँ ओसामा व अलक़ायदा की छाप के साथ अमेरिकन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का छौंक भी काम न आया...। क्योंकि जो कहानी बनी, वह पिटी-पिटायी फिल्मी साबित हुई । ब्लॉस्ट में पत्नी-बच्ची को खोने के बाद बने स्वयंभू हीरो विवेक ओबेरॉय(रिज़वान) को इतने संसाधन व इतनी सूचनाएं कहाँ से मिलती हैं, लखिया ही लख सकते हैं। साथ में है नये हीरो बने ज़ायेद ख़ान, जिसका किरदार (विवेक साग़र) इतनी कम उम्र में आर्मी से निकलकर ‘आज तक’ का विश्वप्रसिद्ध रिपोर्टर बन गया है और किसी पद व जिम्मेदारी के बिना भी खासे बडे-बडे कारनामे करके आतंकवादी गैंग का खात्मा कर देता है। विवेक को हँसमुख व ज़ायेद को गम्भीर बनाने का बानक चरित्रांकन का सही जोड है, पर दोनो के ठीक करने के बावजूद फिल्म का कोई सही तोड नहीं बन पाता। इनके साथ मिशन में जुडती है श्वेता बजाज, जिसे ध्यान में आने लायक अदाकारी का मौका तो नहीं मिला है, लेकिन उसका चरित्र (लिज़ालोबो) अवश्य काफी रोचक है। ‘डॉन’ की ज़ीनत अमान की याद दिला देता है। और फिर तो आतंकवादियों की रोबोट जैसी गैंग से लडते हुए अमित-प्रान-ज़ीनत की तिकडी भी दिखती है और लाल डायरी के बदले कम्पुटर से उतारी सीडी है। बस, हॉय विवेक से प्यार न कराकर श्वेता को नाहक मरवा डाला !! लेकिन यहाँ पुलिस नहीं आती, क्योंकि जाँबाज़ लडाकू रिपोर्टर काफी हैं। पर दूसरा क्योंकि यह कि यहाँ सिर्फ़ गैंग लड रही होती है। दोनो सरगनों से दोनो हीरोज की आख़िरी, रुटीन और फिल्मी, लडाई अंत में होती है। निकेतनधीर (गज़्नी) की बलिष्ठ देह (बॉडी बिल्डर) काम नहीं आती और इतनी बडी आतंकवादी गैंग के सरगना का इतनी मोटी बुद्धिवाला होने पर पूरी फिल्म के दौरान विश्वास नहीं होता। पहले के खल पात्र स्मगलिंग का धन्धा करते थे और ऊपर से समाजसेवी बने रहते थे। अब धन्धा आतंकवाद का करते हैं और ऊपर से श्रेष्ठ मीडिया कर्मी बने हुए हैं। तभी तो पूरा टर्की उसकी घोषणा पर दोनो हीरो के पीछे पड जाता है...। नये हीरो की नयी हिरोइन श्रिया सरन का अभिनय भी बेजान है और उसका पूरा अंजलि-मामला भी ठूँसा हुआ है, जिसके न होने से कहानी पर कोई फ़र्क़ न पडता । अंत के सस्ते भावुक ड्रामा से भी दर्शक बच जाता और एक रस्मी गीत से भी। यूँ सभी गीत ऐसे ही हैं। अभिषेक बच्चन वाला ‘आइटम नाच-गान’ है, जो फिल्म की तो छोडिए, अभिषेक की पोल एक बार फिर खोल देता है। दूसरी अतिथि भूमिका स्वरूप सुनील शेट्टी तो गोया मरने के लिए ही आये थे..। मज़े का दृश्य जॉर्ज बुश वाला है, जहाँ वे म-न मो-ह-न कहना सीख रहे हैं और हॉल में जाते हुए एक दर्शक ‘मिशन इस्तानबुल’ कहना सीख रहा था... ‘मिशन काबुल’ व ‘मिशन इस्तकबाल’ कहे जा रहा था। जॉर्ज यह भी कह रहे थे कि ‘डोंट टच इंडियंस’ और बाहर निकलते हुए दूसरा दर्शक कहते सुना गया- डोंट सी दिस मिशन यार,...वैसे कहाँ है यह ‘इस्तानबुल’? -सत्यदेव त्रिपाठी

Friday, 18 July 2008

अकेलेदम आतंकवाद को खत्म करने का ‘कॉंट्रैक्ट’ ... रामगोपाल वर्मा का नया हीरो आतंकवाद को खत्म करने का ‘कॉंट्रैक्ट’ लेता है और यह फिल्म का ही कमाल है कि वो ऐसा कर देता है - दो गैंगों का सफ़ाया...वरना तो इस बात में कोई माल नहीं है, यह रागोव को भी मालूम है। तो क्या कर रहे हैं वे ? सफ़ाया आतंकवाद का या जनता की जेब का...? हाँ, हीरोगीरी के सारे सरंजाम के बावजूद आध्विक महाजन काफ़ी सहज संतुलित व सही लगा। ‘अंडरवर्ल्ड का आतंकवाद से मेल’ का नारा - एक और फिल्मी फ़ण्डा ! दो में से एक गैंग का इस्तेमाल आतंकवादी सरगना कर रहा है, तो क्या फ़र्क़ पड जा रहा है? हाँ, कुछ बात वहाँ है, जहाँ दूसरी गैंग का इस्तेमाल खुली व्यवस्था के तहत सरकारी तरह से हो रहा है। कहना चाहिए- ‘सरकार का अंडरवर्ल्ड से मेल’। क्या कर रही है सरकार व सेंसर ? और नया क्या है इसके सिवा इस ‘कॉंट्रैक्ट’ में कि एक पुलिस शूटर को सडकों पर नंगे दौडाता है हीरो। वरना तो पुलिस द्वारा अपराधियों की गैग में मुखबिर भेजना ‘डॉन’ जैसी स्टंट से लेकर ‘द्रोहकाल’ जैसी सार्थक फिल्मों तक में कितनी ही बार हुआ है..! फिर दोनो का मिक्स्चर ...मुखबिर बनाकर भेजने वाले का खात्मा व गैंग की लडकी से प्यार होता है डॉन जैसा, तो भेजने वाले अफसर को सामने मरते देखना व उसके पदचिन्हों पर चलना तथा सबसे बडे अफसर (यहाँ गृहमंत्री) का आतंकवादी से मिला होना है ‘द्रोहकाल’ जैसा..। बस, इस बार मुखबिर बना हीरो अमान भुक्तभोगी है - बमब्लास्ट में बेटी व पत्नी को खो चुका है। वरना उसे मालूम ही न पडता कि आम आदमी की पीडा क्या होती है ? वह तो आतंकवादी सरगना के फ़लसफ़े - “तुम भी शूटर ही हो। किसी के कहने पर लोगों को मारते हो। तुम्हारा कोई अपना वजूद ही नहीं” - का कायल होक्रर फौज की नौकरी छोड चुका है। और 99% दिमाँग वाले ऑफ़िसर को फ़तह के कग़ार पर पहुंचने के बाद भी नहीं पता कि मुखबिर-योजना का अंत कैसे होगा...! ये ही हैं फिल्म के विचारप्रधान होने के दावे के ढहे हुए आधार !! सारी कडाई के बावजूद वह मोबाइल नहीं पकडा जाता, जिस पर हीरो की ऑफिसर से इतनी लबी बातें होती हैं कि हमारा दिल धडकने लगता है और सारे रुटीन के बावजूद यह दिल धडकाना ही इस फिल्म का उल्लेख्य पहलू है, जो कला का न होकर तकनीक का है। बस, संवाद खासे तगडे हैं, जिसमें ‘सिक्रेट’ आदि के प्रसंगों के बनाव उल्लेख्य हैं। यदि उससे आधी दम भी कहानी व बात में होती, तो रामगोपाल वर्मा जैसा कुछ होता...। शेष बहुत सारा तो अलग व खास करने के चक्कर का शिकार हो गया है। किशोर कदम, अमृता सुभाष तो कॉर्टून हुए ही हैं, छोटे राजन जैसा पात्र करने वाला उपेन्द्र लिमये सबसे बडा कार्टून बन गया है। प्रसाद पुरन्दरे की बोलने की अदा ही उन्हें ख़ास बनाती है, पर पोशीदा गुफ़्तगू के लिए वह एकदम बेमेल है। यही हाल ज़ाकिर हुसेन का भी हुआ है। दाऊद की छबि को साकार करते आर.डी. (सुमित) का कोई काम ही नहीं...। बिना दिखाये ही दृश्यं व चरित्र को मशहूर करने की अदा है रागोव की, जो यहाँ भी फलीफूली है...। प्रेम का उत्सर्ग वाला रूप भी अच्छा बना है और इसे निभाती साक्षी गुलाटी भी संतोष जनक हो पायी है। सब कुछ पुराना है, पर बासी नहीं...के थ्रिल का मज़ा लेना हो, तो फुर्सती समय में देख लेने लायक भर ही बन सका है - फिल्म का दर्शकों से ‘कॉंट्रैक्ट’ ...। - सत्यदेव त्रिपाठी

Sunday, 13 July 2008

पुराने फॉर्मूलों को खींचतानकर बनी ‘महबूबा’ का क्या हो...? सफ़ाई देखिए कि करन (अजय देवगन) सपने में लडकी को देखता है और उसे पेंटिग्स में हू-ब-हू उतार लेता है !! स्टुडियो (सॉरी, बैठक है) भर रखा है.। फिर कमाल देखिए कि वह लडकी उसी शहर में है। तब मह्बूबा-महबूबा (फिल्म के नाम को साकार करते हुए) गाते-गाते पीछा करता है, जिसे देखकर लडकी कहती है - ‘नाटकबाज़ी का यह फ़ॉर्मूला बहुत पुराना हो गया है’। निर्देशक अफ़ज़ल खान यह संवाद सुन लेते, तो समझ जाते कि पूरी फिल्लम ही ऐसा बासी फ़ॉर्मूला है- एक फूल दो माली याने प्रेम त्रिकोण का.. बस, दो बातें फ़ॉर्मूले से अलग हैं...1- पहला माली श्रवण धारीवाल (संजय दत्त) प्रेमी नहीं, ‘हर रात इक नया हो बदन’ का व्यापारी है और मानता है कि हर औरत बिकाऊ होती है- चाहे पैसों की कीमत से या वादे की और इसी रौ में पैसे से हार जाने के बाद वादे से फाँसता है और मँगनी के बाद ही भावुक बनाकर रात बिताकर उसके तमाचों का जवाब देकर निकाल देता है...। 2- दोनो माली सगे भाई हैं, जिसका पता दर्शकों को तब लगता है, जब करन अपनी महबूबा को राजी करके शादी कराने अपने घर जाता है, जहाँ ‘हम आपके हैं कौन’ का पूरा बडजात्या-परिवार - रीमा लागू, बिन्दु, हिमानी शिवपुरी..आदि के साथ - तैयार है, जिनके बीच पहला माली ग़म ग़लत करते हुए शराब में ग़र्क हुआ पडा है - ज़ाहिर है उसी फूल के लिए पछ्तावा ...। लेकिन फूल एक ही है - मनीषा कोइराला ; इसका पता चेहरा देखने के कारण दर्शकों को है, पर फूल तो वर्षा से पायल हो गयी है,, इसलिए दोनो मालियों को पता नहीं है। जिस कौमार्य (वर्जिनिटी) की कीमत जीवन में रोज़ घटती जा रही है, उसका भाव फिल्मों में इतना बढा कि कौमार्य-भंग के बाद लडकी नाम तक बदल लेती हैं - गोया एक जीवन ही खत्म हो गया हो...? आख़िर हिन्दी फिल्में बालिग़ कब होंगी ? अब आधी फिल्म में यह भर बचा था कि फूल किस माली का होता है ! पलडा भारी है अजय का, पर हिन्दी फिल्मों में पलडे का वजन देखने पर विश्वास होता, तो हम उठकर चले न आते - ‘हमें क्या बुरा था मरना, ग़र ऐतबार होता’ ! और इस बेऐतबारी के चलते इतनी ग़लाज़त सहनी पडी कि उफ़...भाइयों की लँगोटिया यारी, अपनी-अपनी प्रेमिका की सुन्दरता को लेकर बाज़ियाँ, फ़ालतू के दृश्य व पिटे-पिटाये संवाद, चाय व नाच-गान..यानी ढेरों फिल्मी लटके-झटके...। सबसे जिन्दा बचे, तो देखा- प्रेमिका को त्यागने के लिए दोनो भाई तैयार। बक़ौल मनीषा ‘भाइयों का ऐसा प्यार कहीं नहीं देखा’ और फिर वही बात, जो ‘निक़ाह’ में इससे बहुत-बहुत ज़ोरदार ढंग से सलमा आगा कह चुकी है- मेरी जिन्दगी का फैसला और मुझे बिना बताये ? क्योंकि ‘निक़ाह’ को कुछ कहना था और ‘महबूबा’ को कुछ कहने का इल्म तक नहीं...। तमाम फ़ॉर्मूलों को निभाना तक नहीं आया अफ़ज़ल को- 7-8 साल तक न जाने क्या होता रहा..। बस, सुफल यही कि संजय को ज़रा चुस्त देखना भला लगा। मनीषा अपने रूप की तरह ही सधी-सँवरी है। अजय देवगन ने बहुत कोशिश की, पर पानी पीटने से कहीं रास्ता

Saturday, 5 July 2008

लव स्टोरी- 2050 हैरी बावेजा लिखित-निर्देशित फिल्म ‘लवस्टोरी-2050’ में सना (प्रियंका चोपडा) व करन (हरमन बावेजा) को देखते हुए आधी फिल्म तक यही लगा कि 2050 का प्यार भी वही पहली नज़र वाला ही होगा- बिना किसी कारण व तर्क के...। फिर लडकी के पास बडा अच्छा घर होगा, जहाँ वह अकेली रहती होगी...। परंतु वह घर 2050 में भी सिर्फ हॉय व बॉय करने के काम आयेगा…प्रेमी वहाँ सिर्फ फूल देगा और मिलने का समय तय करेगा...बाकी प्यार तो वे सडकों पर, पहाडों पर, बाज़ारों-मॉलों में गाते-नाचते-कूदते ही करेंगे। [इससे अच्छा उपयोग तो वैजयंती माला (के आदिवासी बाप) के घर का ‘मधुमती’ में दिलीपकुमार कर लेते थे।] बेचारे जावेद अख़्तर ही 2050 में भी गाने लिखेंगे...पर वे गद्यगीत होंगे, जिन्हें संगीतकार गवा देगा। हाँ, उसमें अनिवार्य रूप् से उछल-कूद के लिए जावेद जी गैप्स छोडेंगे और संगीतकार उन गैप्स पर अपने ख़म रख सकेगा...ठीक है कि एकाध गीत इसके अपवाद होंगे, जिसे 2050 का समय अवश्य माफ़ नहीं करेगा..। हाँ, 2050 में भी बिछडते हुए दोनो रोयेंगे। मैं यह सब देखकर पहले तो कम्बख़्त 2050 के समय को कोसने लगा...। पर फिर आश्वस्त हुआ कि चलो, बाग-बागीचों-नदियों-वादियों में आधे-पौना घंटे गा-नाच कर प्यार को प्रतिष्ठित करने की देवानन्द-राजकपूर युग की विरासत ज्यों की त्यों सुरक्षित तो है...ठीक है कि वादियां विदेशी (आस्ट्रेलियाई) हैं, क्योंकि देसी वाली बार-बार आकर बासी हो गयीं हैं...। तब के निर्देशक तरसते थे कि काश, अंग्रेजी फिल्मों की तरह छूट होती, तो एक चुम्बन से पाँच सेकेंड्स में यह काम हो जाता...। और आज तो छूट के बावजूद आधी-आधी फिल्म में वही हो रहा है, क्योंकि करें क्या...? तो हुआ न परम्परा-पालन ! इस रौ में लडकी की माँ (अर्चना पूरन सिंह) ज़रूर बडी मॉडर्न होगी कि होटेल में दोनो के लिए ऑर्डर देकर ख़ुद खिसक लेगी, पर वह 2050 में भी कुंडली जरूर मिलवायेगी...परम्परा...! और इसके लिए नायक के चाचा ज्योतिषी-वैज्ञानिक (वोमन ईरानी) मौजूद, पर वे असल में क्या कर रहे हैं, शायद वोमन को ही मालूम हो...। उनकी बनायी टाइम मशीन में बैठकर नायिका ‘2050 मुम्बई’ लिखती है, तब पता चलता है कि यह तो 2008 ही था...। तब तक नायिका एक आइस्क्रीम लिए रोड पार करते हुए मोटर से टकराती है व प्रेमी की बांहों में दम तोड देती है...ठडे-ठंडे होठों से एक किस देने का वायदा धरा का धरा रह जाता है - बेचारा हरमन !... पर किती शालीन है फिल्म !! अब मध्यांतर के बाद जाते हैं - 2050 की मुम्बई में, जहाँ सना का पुंनर्जन्म हो चुका है। वह एक सुपरस्टार डांसर है। शायद 2050 की मुम्बई में जवान ही पैदा होंगे- बच्चा पैदा करके कौन पाले-पोषे ? परिवार रोबोट हैं व आसमान में उडते वाहन हैं। पूरा परिवेश आसमानी रंग का है। शायद तकनीक के बल बनायी यही विज्ञान-कथा है...। लेकिन यहां भी फ़र्जी पहचान पत्र बनते हैं। विलेन होते हैं - नक़ाबपोश रोबोट । लेकिन अकेले करन सबकी ताकतों पर भारी पडता है - आख़िर हीरो है, फिर निर्माता-निर्देशक परिवार का राजकुमार भी...। काया भी हिरोइक और काम में भी दम...। प्रेमिका को खोजता ही नहीं, पहचनवा भी लेता है - डायरी तक ले जाना नहीं भूला था...। और प्रेमिका भी तो हसीन-दिलदार - पहली बार भायी प्रियंका ...। बडा मज़ा आया यह देखकर कि कभी पुराण-काल में पतिव्रता सावित्री अपने मरे पति को यमराज से माँग लायी थी- 2050 की मुम्बई में प्रेमिकाव्रती प्रेमी होंगे, जो दूसरे जनम से खींच लायेंगे प्रेमिका को...। जय हो टाइम मशीन की...जिसमें हिरोइन के घर के छोटे-छोटे बच्चे भी आ गये थे...। बच्चों को बोर करता होगा प्रेम व बडों को बोर करता है कथा विहीन फिल्म का बचकानापन...। इस तथ्य का पता चल गया होता, तो अपनी नयी कल्पना की कथा व कला को सँवार सकते थे हैरी बावेजा... -सत्यदेव त्रिपाठी