Saturday, 7 June 2008

satyadev tripathi: माँ इसे देवी कहती... (समापन किस्त...)

satyadev tripathi: माँ इसे देवी कहती... (समापन किस्त...) प्रियवर बेनामजी, आशीर्वचनों के लिए बारम्बार शुक्रिया...! कहीं बहुत गहरे चुभी होगी देवी, तभी अपनी असलियत के साथ प्रकट हुए आप...। आप को लगी चोट के लिए खेद सहित - स.त्रि.

satyadev tripathi: cinema

satyadev tripathi: cinema अनाम महोदय, सही श्लोक भी लिख ही देते ! ग़लती किससे नहीं होती ? स. त्रि.

Friday, 6 June 2008

cinema

‘सरकार राज’ की ‘सरकारी’ के सबब.... रामगोपाल वर्मा की ‘सरकार’ में एक व्यापारिक प्रकल्प को रोकने में सुभाष नागरे (अमिताभ बच्चन) घायल होते हैं। बेटा शंकर नागरे (अभिषेक बच्च्न) उन सबको मार डालता है। अब इस ‘सरकार राज’ में एक बिजली उत्पाद योजना को लगाने में बेटा शंकर नागरे मारा जाता है और तब पिता उन सभी को मरवा डालता है। मुख़्तसर में यही थीम है फिल्म की... और यह पैटर्न वही गॉड फादर का है, जिस वजन पर निश्चित कयास हैं कि तीसरा भाग भी बनेगा, जिसमें पोता चीकू (मुझे चीकू चाहिए- सरकार) होगा और सरकार फिर भी जिन्दा रहेंगे। आख़िर, भीष्मों की परम्परा वाला देश है यह । ख़ैर..., इसी तरह की छोटी-छोटी तमाम आवा जाही देखी जा सकती है... मसलन - उसमें बडा बेटा बाग़ी होता है, छोटे भाई के हाथों मारा जाता है; तो इसमें बेटे सरीखा वफ़ादार सेवक पिता सरीख़े मालिक के हाथों...। विरोधियों में व्यापारियों, गुण्डों, स्मगलरों के साथ बडे-बडे ओहदों पर आसीन राजनीतिज्ञों की मिली भगत दोनो में है...और महाराष्ट्र की भक्ति व सच्ची सेवा की मिश्री तो घुली है ही। कुल मिलाकर सिर्फ़ ‘इस कोठी का धन उस कोठी’ करने के अलावा क्या है? फिर भी फिल्म हिट होगी और इंशा अल्लाह तीन साढे तीन स्टार से नवाजी भी जायेगी...। क्योंकि अमिताभ बच्चन हैं...। और बाला साहेब का ‘सरकार राज’ प्रदेश में हो, न हो; फिल्म में अमिताभ का है। फिर व्यक्तित्वों को बनाना तथा उनके हर सही-गलत की पूजा करना हमारे देश की पुरानी परम्परा है - ‘यत्र कृष्णो, ततो धर्म:’ से लेकर ‘इंडिया इज इन्दिरा’ तक के इतिहास को रामगोपाल वर्मा सरीखे लोग जानते हैं। सतत भुना रहे हैं...। सुभाष नागरे इतने लोगों को खुल्लमखुल्ला मरवा देते हैं इस बार कहा भी - ‘राजनीतिज्ञों के वेश में गुण्डे’, पर हिट... । हाँ, दो राय नहीं कि बस अमिताभ ही हो सकते हैं सरकार। तीन चौथाई फिल्म में उन्हें बेटे के पीछे कर दिया गया था। फिर बेटे को मरवाकर वर्मा ने अमिताभ की सरकारी दिखायी। इस सरकारी के होते हुए भी बेटे के मरने के बाद जागते हैं सरकार !! भाई, सरकार हैं, कोई स्टंट फिल्मों के विलेन तो नहीं कि बेटे को बचाने के लिए चीखें...? ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि जो बहू के मरने के बाद दिल के दौरे का शिकार हो जाता है, बेटे की मौत के बाद पहलवान होकर एक-एक को मरवा कैसे सकता है - सरकार जो ठहरा - ‘समरथ के नहिं दोष गुसाईं’ । दो-दो एकालापों में भी सरकारी सर चढकर बोली, पर फिल्म मुँह के बल गिरी- वह सब कुछ तो फिल्म को करके दिखाना चाहिए था...लेकिन सरकार ही तो फिल्म हैं- इन्दिरा इज़ इंडिया। और जब “गॉड फ़ादर’ ही नहीं बताती कि साराकुछ कारनामा होता कैसे है, तो वर्मा क्यों बतायें कि आख़िर किस बल पर शंकर नागरे क्या कुछ करता है, जो बाप से आगे व प्रदेश का भविष्य हो गया है। जैसे अभिषेक की भूमिका प्रायोजित है, वैसे ही अभिनय भी प्रक्षेपित (प्रोजेक्टेड) । और ऐश्वर्या को तो बस, दो लाख करोड वाली परियोजना की फाइल पकडाकर अभिषेक को निहारना भर था, जो अच्छा करती है वह। शालीन लिबास में खिलती भी है। परियोजना में इफ़रात बिजली से महाराष्ट्र का विकास होना है, पर 40 हजार लोगों को उजडना है, जिनके पुंनर्वास पर कुछ नहीं कहती फिल्म...बस, विरोध में प्रांत के अति मानिन्द राव साहेब को अपने बच्चे के लिए खूनी राजनीति का खेल खेलने वाले आज के नेताओं के साथ खडा करके उस ज़माने को भी नाहक दाग़दार बना देती है। परंतु राव साहेब बने दिलीप प्रभावलकर अपनी खास आवाज व निराबानी अदा से अभिनय मूल्यों को अवश्य खूब ऊंचा उठा देते हैं...। पॉवर प्लांट के बहाने पॉवर पॉलिटिक्स का यह खेल ही खेलना था, जिसके लिए सब दोयम दर्जे के विलेन (गोनिन्द नामदेव ...आदि) तो ठीक, पर सभी कैरिकेचर क्यों बन गये है वर्माजी ? क्या स्टाइल मरवाने के चक्कर में ? या आपको सीरियलों का बालाजी बनना है...? -सत्यदेव त्रिपाठी

Thursday, 5 June 2008

अरे, जा रे ज़माना

‘तीसरी कसम’ का गँवई नायक हीरामन बात-बात पर कहता है- ‘अरे जा रे ज़माना’...। आज कदम-कदम पर हमारा भी मन जमाने के लिए यही कहता है... ...अभी चार दिन पहले की बात है- हमारी बगल वाली बिल्डिंग में एक 58 वर्षीय आदमी को दिल का दौरा पडा। वह एक कॉलेज में प्राध्यापक है । शादी नहीं की है और अपनी अविवाहित बहन के साथ बँगले की पहली मंजिल पर रहता है। दौरे के दौरान वह फ़र्श पर गिर गया, उल्टियां होने लगीं..। पास-पडोस में किसी से ताल्लुक नहीं। भाई को उठाने में अकेली बहन असमर्थ...किसको बुलायें? तल मंजिल पर सगा बडा भाई रहता है। सम्पत्ति को लेकर केस चल रहे हैं। बातचीत बन्द है। उसे बुलाया नहीं। दूसरा भाई चार किमी की दूरी पर है। उसे फोन किया। पर आया वह तीन घंटे बाद...। तब एम्बुलेंस आयी। वह अस्पताल गया। नीचे से बडे भाई के परिवार ने देखा, पर घर से बाहर न निकला...। ....और यह सुनकर मेरे मुँह से बेसाख़्ता निकल पडा- अरे, जा रे ज़माना...! न निकलता... पर इसलिए निकला कि मैंने देखा है- दो पट्टीदारों में सम्पत्ति को लेकर पुश्तैनी मुकदमे चल रहे हैं। रात के आठ बजे एक को साँप काटने की चिल्लाहट होती है और सबसे पहले वही पट्टीदार आता है। पाँव में गमछा बाँधता है, ताकि ज़हर का ऊपर चढना रुका रहे। और तुरत अपनी सायकल पर लेकर इलाज़ के लिए चल पडता है - गोया दोनो में कभी अदावत रही ही नहीं...। पहला भी सहर्ष उसकी सेवाएं लेता है, क्योंकि वह भी जानता है कि वक्त पर ऐसा करने से वह भी बाज नहीं आयेगा...। यह तो मेरी जवानी के दिनो की बात है - दस साल पहले की। लेकिन यह सुनकर मुझे अपने बचपन की घटना याद हो आयी थी, जब मेरे बडे बाबूजी के दोस्त, जो पट्टीदार थे, खेत व घर के ज़मीन का मुकदमा लडने जिले की कचहरी जाते थे और आते-जाते रातों को मेरे घर ठहरेते, क्योंकि उनके घर यातायात के साधन से 15 किमी दूर थे, जहाँ से वे चलकर आते थे। दोनो साथ आते-जाते, साथ में बैठकर खाना खाते और यदि केस के खर्च के कारण एक के पास पैसे कम पड जाते, तो दूसरा उसे भाडे-किराये का पैसा भी देता... याद आना स्वाभाविक है महाभारत का भी, जहाँ राज्य के लिए दिन भर हर तरह की मार-काट मची रहती थी, पर सूर्यास्त के बाद सब एक दूसरे के शिविर में आते-जाते ही नहीं, खाते-पीते भी थे। पाण्डवों ने युद्ध के बाद कौरव-भाइयों का भी दाह-संस्कार किया था। इन्हीं संस्कारों से बनी मेरी समझ को ताज्जुब हुआ और निकल पडा- ‘अरे, जा रे जा रे ज़माना’ ...! वो संस्कार कहाँ चले गये ? क्यों मर गये... ? सोचता हूँ - शहर के ये बहुत ज्यादा पढे-लिखे लोग सही हैं.. या गाँव के वे कम पढे लिखे लोग...? इनकी निजता सही है या उनकी सामाजिकता ? दुश्मनी की हद में मनुष्य को जिन्दा रखना सही है या दुश्मनी के नाम पर अहम की ज़द में इतना अ-लगाव ? ये लोग शायद उस व्यवहार को पाखण्ड कहें - कि जब मुकदमा चल रहा है, बातचीत बन्द है, तो मदद करना एक नाटक है...। अब आप भी सोचें कि वह नाटक है या यह अमानवीय ? पर मैंने उस पट्टीदार से पूछा था ...। उसने अकुंठ भाव से बताया था- मुकदमे की बात और है... फैसला होगा, तो जायदाद मिलेगी या नहीं, पर रहना तो साथ ही है। दोनो के दुख-सुख में तो साथ ही है...। भाई, लडने के लिए भी दोनो को रहना है...। लेकिन इनसे तो पूछने की हिम्मत भी नहीं । न जाने क्या कह दें - ‘आपसे मतलब ? हमारी जिन्दगी है... मरें या जियें । जिससे केस है, बात नहीं है, उसकी मदद लेने से बेहतर है- मर जाना’...। पडोसी के नाते मेरा भी बडा मन था कि देखने जायें...। पर अपने घर में काम करने वाली बाई, जो वहाँ भी करती है, ने बताया- वे नहीं चाहते कि कोई देखने आये। सो, हिम्मत नहीं पडी। कहते हैं- इस दुनियादारी का क्या मतलब ? रोमैंटिक आन्दोलन की शुरुआत में ‘द वर्ल्ड इज़ टू मच विद अस’ (दुनिया बहुत-बहुत मेरे साथ है) की वैयक्तिकता भी थी, पर उसका मक़्सद भी मनुष्यमात्र से कटकर अकेले हो जाना तो नहीं रहा होगा...! वे सज्जन बहन से भी कहते हैं - यहाँ तो नर्सेज हैं देखभाल के लिए। तुम क्यों आती हो’? पर बहन जाती है। उसका भी मामूली-सा तर्क है - उसके बिना पूरा घर कैसा तो लगता है ! याने भाव भाई के जीने के प्रति नहीं, अपने होने के लिए है...। और वह भाई, जो छोटे भाई को एम्बुलेंस में जाते देखकर भी घर से न निकला..., जाने क्या कहे... !! दुष्यंतजी को क्या पता थ कि जो शेर वे शहर के लिए लिख रहे हैं, कभी भाई के लिए भी सच हो जायेगा - ‘इस शहर में अब कोई बारात हो या वारदात ; अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिडकियां’ । सोच के दायरे से बाहर वह भाई भी नहीं, जिसने कार से 5 किमी आने में तीन घंटे लगा दिये...! बस, समझ में एक बात आयी कि यदि ऐसे जीना है, तो दिल को इतना मज़बूत होना होगा कि वह भीषण दौरे को भी तीन-चार घंटे सह ले, वरना तो एक मिनट भी सम्भव नहीं होता...। - सत्यदेव त्रिपाठी

Sunday, 1 June 2008

हँसते हँसते

“हँसते-हँसते’ में बैठना ‘फँसते-फँसते’ बन गया....” ‘हँसते-हँसते’ जैसा नाम...व कलाकारों में राजपाल यादव। हास्य-विनोद का अन्दाज़ हुआ था। और यही सबसे बडे धोखे निकले। न फिल्म में कुछ हँसते-हँसते होता, न एक बार भी हँसी आती। हँसाने के नाम पर बाप-बेटे-चाच की तेहरी भूमिकओं में राजपाल जो कुछ करते हैं, बेहद बचकाना व फ़ालतू है। अभिनय तो कार्टून जैसा करते ही हैं वे, यहाँ चरित्र भी कार्टून ही हैं। सबसे अधिक कार्टून वो मुख्य भूमिका है, जिसमें वे विदेश में पढने गये हैं और हर लडकी से परिचय के दौरान ही चिपक जाते हैं। कूदकर होठों पर ‘पुच’ कर देते हैं। क्या लडकियां वहाँ इतनी बेवक़ूफ़ हैं! बिज़्नेस की गम्भीर बात चल रही है और ज़नाब खुलेआम लटपटाये जा रहे हैं। ऐसे ही खराब काम करते रहे, तो वो नाम मिट्टी में मिल जायेगा, जिसके कारण इतने रोल में आधी फिल्म को अकेले घेरे हुए हैं। उत्सुकता रही टोनी नामक जीव को लेकर भी, जो निर्माता से पहली बार निर्देशक बनकर अवतरित हो रहा था। पर वह बन्दा फिल्म के किसी पहलू को लेकर कुछ भी उल्लेख्य न कर पाया । सबकुछ हो जाने पर जब दर्शक जाने के मूड में हैं, नायक-नायिका के एक दूसरे को ढूँढने में 15 मिनट का फूटेज खाते हैं.. ऐसा ही सब कुछ है..। कहानी तक कुछ नहीं है। बस, विदेश के दृश्य फिल्माये हैं और वे भी बिना किसी कल्पना या संगति के । प्रेम दृश्यों में मिलते ही बस, गरदन पकडकर झूल जाना व गिर जाना भर है - गिरती ही चली जाती है फिल्म भी। जगह-जगह गीत भरे हैं और एक शीर्षक गीत के अलावा एक भी किसी अर्थ का नहीं। मन को छू ले, ऐसा एक भी नहीं । हाँ, जिम्मी शेरगिल के काम की सफाई के साथ नयी अभिनेत्रियों के नाम से जो आस थी, वह ठीक होती, यदि उन्हें कुछ करने-कराने को मिलता। कहानी का नायक होने के बावजूद जिम्मी को नहीं मिलता - राजपाल से इतनी अभिभूत है फिल्म । फिर भी जितना मिला है, अच्छा किया है। उससे सच्चा प्रेम करने में निशा रावल व उस पर अनायास फ़िदा होकर न पाने पर बदला लेने में मोनिष्का को जो करना था, ठीक ही हुआ है। शक्ति कपूर को ज़ाया किया गया है। और बेज़ा तो बहुत कुछ है, जिसे अब दिखाये जाने के बाद फिल्म वालों के लिए भी भूल जाना ही बेहतर है... - सत्यदेव त्रिपाठी

Saturday, 24 May 2008

- धूम धडाका

हास्य का अभिनय और अभिनय का हास्य... जो बाबा ने अपने ‘मानस’ के बारे में विनम्रता वश कहा था - ‘भनिति मोर सब गुन रहित, बिस्व बिदित गुन एक’, वही कठोर सत्य है - शशि रंजन लिखित-निर्देशित फिल्म ‘धूम धडाका’ का। बाबा में वह सत्य है -‘ एहि महँ रघुपति नाम उदारा’, और इसमें है -हास्य। और यही इस फिल्म की ख़ासियत है - हास्य के मुताबिक भरा पडा है अभिनय और अभिनय के मुताबिक बनता-निखरता हास्य। कहना होगा कि इस कला का समूचा इसमें समाहित है। ईर्ष्या, होड, प्रेम, दोस्ती, लालच, छल, फ़रेब, साज़िश, गुण्डई, संवेदना, सज़ा, त्याग ...आदि सारे भावों, सभी प्रवृत्तियों को हास्य में ढाला गया है और हास्य-अभिनय के प्राय: सभी प्रकारों-रूपों को साधा गया है, जो बख़ूबी सधे हैं। हास्य अभिनय का शास्त्र बन गयी है फिल्म, जिसकी बारीकियों (जो आम अमझ की नहीं हैं) को न समझने वालों के लिए यह ऊटपटाँग हरकत होगी। यूं तो सभी सातो-आठो कलाकारों ने अच्छा निभाया है, पर अनुपम खेर का कहना ही क्या ! मुंगीलाल के रूप में वही हीरो हैं - हास्य के हीरो जैसे। इस भूमिका में सबसे अधिक विविधता उनकी क्षमता के मुताबिक ही रची गयी होगी। उन्होंने आंगिक (देह के) अभिनय का मानक वाचिकता (बोलने) के सपोर्ट से साधा है, तो सतीश कौशिक ने वाचिक का जादू बिखेरने में आंगिक का सहाय लिया है। दोनो की कला में एनएसडी की ट्रेनिंग का निखार खुलकर बोलता है, जिसके अभाव में इंड्स्ट्री के मशहूर कॉमेडियन सतीश शाह सिमट कर रह गये हैं। क्या तभी दोस्त की मह्त्त्वपूर्ण भूमिका में दबे-दबे रूप में फिट कर दिये गये हैं? गुलशन ग्रोवर का खल पात्र चाह कर भी हास्य ला न सका। भूमिका में सम्भावना थी या नहीं, यह तो अनुपम जैसों को करना होता, तो पता लगता...। हाँ, गुलशन के बेटे बने कलाकार ने हास्य के कैरिकेचर रूप का अच्छा प्रदर्शन किया है। दोनो प्रेमी जोडे भी ठीक ही हैं। गेस्ट जैसी भूमिका में जैकी श्राफ से हास्य तो क्या, कुछ नहीं कराया गया है। परंतु कोफ्त होती है टेलीविज़न की ‘सोनपरी’ दीपशिखा को देखकर, जो फिल्मों में ढिबरी बनकर कारिख ही कारिख फेंक रही हैं। हास्य के अभिनय व अभिनय के हास्य की योजना न होती, तो कहानी तो ऐक्शन-सस्पेंस वाली हिंसक थीम की थी, पर मार-धाड भी इतनी अहिंसक, शालीन व विनोदी हो सकती है, के कायापलट फिल्मायन में शशि रंजन की विरल निर्देशन-कला का कमाल देखा जा सकता है। दृश्य-निर्माण में हास्य खिलता है, ध्वनि-संयोजन में गमकता है। पहनावे व सजावट इसमें चार-चाँद लगाते हैं। याने सबकुछ हास्यानुकूल है। परंतु यह भी उतना ही उल्लेख्य है कि इस सुनियोजित हास्य के इरादे ने कहानी को अजानी गलियों में भटकाया है, गोल-गोल घुमाया है। फिल्मांकन की स्थितियों, स्थलों, घटनाओं को काफ़ी ऊलजलूल बनाया हैं । गाने सब ठूँसे हैं- बस, सारी फालतू दृश्यावली के बावजूद होली वाला गीत पुराने बोल व पारम्परिक धुन (राठौड का इसमें क्या है?)में गाये होली वाले को छोडकर। याने किसी बात में कोई तर्क व वजह खोजना व्यर्थ है। और थोडी देर में ही यह समझ में आ जाता है। जो इस नीयत को समझकर देखेंगे, अभिनय का मज़ा ले सकेंगे, वरना... हाँ, बैठे रह गये, तो जान पायेंगे कि बचपन में ही बम्ब्लास्ट में घायल पिता के बिना इलाज मरने की वेदना से आहत अनुपम खेर ने अलीबाग में एक अस्पताल खोलने का संकल्प सँजोया, जो अंड्ररवर्ल्ड में जाकर कीव गयी सारी करतूतों के बावजूद बना रहा और ऐन समय पर सरगना जैकी ने मंजूरी दी। पैसे के लोभ में जाली वारिस बनकर आये चारो युवा-युवतियों ने भी सच का साथ दिया। याने भौतिकता के सारे लोभ-लाभ व अपराध की दुनिया की हैवानियत के बीच मनुष्यता अभी एकदम मरी नहीं है... का मेसेज... कितना सम्भव, पर प्रयास है, तो सही...। हास्य की फिल्मी बिक्री में संवेदना का यह फ्री गिफ्ट है। सो, फिल्म अपने शौकीनो से ये तवक्को रखती है कि ‘शौक-ए-दीदार अगर है, तो नज़र पैदा कर..’.। -सत्यदेव त्रिपाठी

Saturday, 17 May 2008

‘जन्नत’ का रास्ता - ईमाँ या कुफ़्र...?

‘जन्नत’ का रास्ता - ईमाँ या कुफ़्र...? चचा ग़ालिब के ज़माने में शायद यह द्वन्द्व जिन्दा था, जब उन्होंने लिखा था - ‘ईमाँ मुझे रोके है, खैंचे है मुझे क़ुफ़्र...’, लेकिन आज वह बात नहीं रही - क़ुफ़्र का जलजला तारी है... और ईमाँ की बेसिक समझ ही नदारद हो गयी है... लेकिन हमेशा की तरह भट्ट कैम्प ने अपनी नयी फिल्म ‘जन्नत’ में भी इस द्वन्द्व को क्या खूब जिन्दा रखा है...। क़ुफ़्र का सरताज़ है - हीरो अर्जुन (यह नाम हिन्दी फ़िल्मों को इतना प्रिय क्यों है !)। उसकी जन्नत का मतलब स्वर्ग नहीं, ऐशगाह है, जिसे वह जूए के बाद क्रिकेट पर दांव लगाने से होते हुए मैच-फिक्सिंग के ज़रिए झटपट में पा लेना चाहता है। झटपट में वह इतना बडा बूगी और फिर सबसे बडे डॉन का मैच सेटर कैसे बन जाता है, के लिए कहानी ने अर्जुन की छठीं इन्द्रिय (सिक्स्थ सेंस) जाग्रत कर दी है। इस बेवजह की वजह. से वह हर मैच के परिणाम का सही अन्दाज़ लगा लेता है। अब तो फिल्म की सतही समझ वाले इसे क्रिकेट की फिक्सिंग वाली फिल्म कह कर पल्ला झाड लेंगे। और इसे पिछले विश्व कप के वूल्मर-हादसे जैसी तमाम घटनाओं से जोड देंगे..। ख़ैर, इस काम के भरोसे वह अपनी जन्नत के एकदम करीब पहुँच जाता है- क़ुफ़्र का जल्वा...! पर इस भयावह लत तथा सिक्स्थ सेंस के साथ उसकी ‘जन्नत’ का एक अहम हिस्सा है - महबूबा ज़ोया, जिस पर पहली ही नज़र में दीवाना हो जाता है अर्जुन (दीवानगी की अदा के लिए फिल्म देखें) । सचमुच तो उसी के लिए वह डॉन का सेटर भी बनता है । और उस ज़ोया में कहानी ने कूटर्‍-कूट कर भर दिया है - ईमाँ। जूए के ज़माने से ही अर्जुन को सुधारने के पीछे पडा है - उसके मूल्यनिष्ठ पिता का मुरीद पुलिस इनस्पेक्टर ...। फिर तो दोनो (पक्षों) के बीच टक्कर शुरू। ज़ोया अर्जुन को पकडवा देती है। अर्जुन अपने रास्ते से यही समझता है कि पैसों के लिए ज़ोया ने ऐसा किया है, लेकिन डॉन की मदद से छूटकर आने पर पता चलता है कि वह तो अर्जुन की राह देख रही है और फिर से जिन्दगी शुरू करने के लिए क्लबों में नाचकर पैसे जुटा रही है। अब कश्मकश शुरू होती है - ज़ोया कुफ़्र के साथ रह नहीं सकती और अर्जुन ईमान पर चल नहीं सकता। अर्जुनों के बनने के कारण पर भी नज़र है । अर्जुन को याद है कि उसके माँ-पिता खिलौनों वाली सडक से उसे नहीं ले जाते थे..। उसे अपने बच्चे से इस तरह नहीं बचना है...। ऐसे अर्जुन को मारने के बाद इस कारण का जवाब भी देती है फिल्म, जब कम पैसों के कारण माँ ज़ोया को घर के जरूरी सामान लौटाते देखकर उसी अर्जुन का बेटा अपना खिलौना वापस कर देता है। याने जरूरत व विलासिता की समझ ही असली जन्नत बना सकती है। लेकिन वह बनेगी कैसे ? डॉन के रूप में कुफ़्र का सरगना तो जिन्दा है। याने कशमकश जारी है...। अर्जुन बना इमरान हाशमी इस कश्मकश को वैसा निभा नहीं पाता - जैसा कुफ्र को जी पाता है। कुफ़्र को छोडने जैसा जल्वा तो उसकी ज़ोया बनी सोनल चौहान का है भी नहीं। उसकी ईमाँ की ज़िद भी उसी की तरह नाज़ुक रह जाती है...। क्या यह सब भी इसी आज के पतनशील समय के असर का ही संकेत है ? कोई गीत-संगीत तो दिल को नहीं छू पाता, पर डॉन यूँ समझाता है कि क्रिकेट पर दाव लगाना ईमाँ का काम ही लगने लगता है । क्या यह भाषा भी इसी समय की देन है ? ये सब युग-सत्य के चेहरे की भयावह छबियाँ हैं। इनको उतना खुलकर न दिखा पाना एवं दोस्त व इंस्पेक्टर के चरित्र को कठ्पुतली-सा बना देना... क्या निर्देशक कुणाल देशमुख पर भी समय के दबाव के परिणाम हैं या कौशल की कमी...? इंस्पेक्टर के मना करने के बावजूद समर्पण के लिए तैयार अर्जुन को मार गिराने की ज़बर्दस्ती के बाद ज़ोया ठीक ही कहती है - यू बास्टर्स...। तो, यह सब देखने के लिए आँखें खुली रखना हो, तो एक बार इस ‘जन्नत’ में हो आना बुरा नहीं है...। - सत्यदेव त्रिपाठी