Sunday, 1 June 2008

हँसते हँसते

“हँसते-हँसते’ में बैठना ‘फँसते-फँसते’ बन गया....” ‘हँसते-हँसते’ जैसा नाम...व कलाकारों में राजपाल यादव। हास्य-विनोद का अन्दाज़ हुआ था। और यही सबसे बडे धोखे निकले। न फिल्म में कुछ हँसते-हँसते होता, न एक बार भी हँसी आती। हँसाने के नाम पर बाप-बेटे-चाच की तेहरी भूमिकओं में राजपाल जो कुछ करते हैं, बेहद बचकाना व फ़ालतू है। अभिनय तो कार्टून जैसा करते ही हैं वे, यहाँ चरित्र भी कार्टून ही हैं। सबसे अधिक कार्टून वो मुख्य भूमिका है, जिसमें वे विदेश में पढने गये हैं और हर लडकी से परिचय के दौरान ही चिपक जाते हैं। कूदकर होठों पर ‘पुच’ कर देते हैं। क्या लडकियां वहाँ इतनी बेवक़ूफ़ हैं! बिज़्नेस की गम्भीर बात चल रही है और ज़नाब खुलेआम लटपटाये जा रहे हैं। ऐसे ही खराब काम करते रहे, तो वो नाम मिट्टी में मिल जायेगा, जिसके कारण इतने रोल में आधी फिल्म को अकेले घेरे हुए हैं। उत्सुकता रही टोनी नामक जीव को लेकर भी, जो निर्माता से पहली बार निर्देशक बनकर अवतरित हो रहा था। पर वह बन्दा फिल्म के किसी पहलू को लेकर कुछ भी उल्लेख्य न कर पाया । सबकुछ हो जाने पर जब दर्शक जाने के मूड में हैं, नायक-नायिका के एक दूसरे को ढूँढने में 15 मिनट का फूटेज खाते हैं.. ऐसा ही सब कुछ है..। कहानी तक कुछ नहीं है। बस, विदेश के दृश्य फिल्माये हैं और वे भी बिना किसी कल्पना या संगति के । प्रेम दृश्यों में मिलते ही बस, गरदन पकडकर झूल जाना व गिर जाना भर है - गिरती ही चली जाती है फिल्म भी। जगह-जगह गीत भरे हैं और एक शीर्षक गीत के अलावा एक भी किसी अर्थ का नहीं। मन को छू ले, ऐसा एक भी नहीं । हाँ, जिम्मी शेरगिल के काम की सफाई के साथ नयी अभिनेत्रियों के नाम से जो आस थी, वह ठीक होती, यदि उन्हें कुछ करने-कराने को मिलता। कहानी का नायक होने के बावजूद जिम्मी को नहीं मिलता - राजपाल से इतनी अभिभूत है फिल्म । फिर भी जितना मिला है, अच्छा किया है। उससे सच्चा प्रेम करने में निशा रावल व उस पर अनायास फ़िदा होकर न पाने पर बदला लेने में मोनिष्का को जो करना था, ठीक ही हुआ है। शक्ति कपूर को ज़ाया किया गया है। और बेज़ा तो बहुत कुछ है, जिसे अब दिखाये जाने के बाद फिल्म वालों के लिए भी भूल जाना ही बेहतर है... - सत्यदेव त्रिपाठी

Saturday, 24 May 2008

- धूम धडाका

हास्य का अभिनय और अभिनय का हास्य... जो बाबा ने अपने ‘मानस’ के बारे में विनम्रता वश कहा था - ‘भनिति मोर सब गुन रहित, बिस्व बिदित गुन एक’, वही कठोर सत्य है - शशि रंजन लिखित-निर्देशित फिल्म ‘धूम धडाका’ का। बाबा में वह सत्य है -‘ एहि महँ रघुपति नाम उदारा’, और इसमें है -हास्य। और यही इस फिल्म की ख़ासियत है - हास्य के मुताबिक भरा पडा है अभिनय और अभिनय के मुताबिक बनता-निखरता हास्य। कहना होगा कि इस कला का समूचा इसमें समाहित है। ईर्ष्या, होड, प्रेम, दोस्ती, लालच, छल, फ़रेब, साज़िश, गुण्डई, संवेदना, सज़ा, त्याग ...आदि सारे भावों, सभी प्रवृत्तियों को हास्य में ढाला गया है और हास्य-अभिनय के प्राय: सभी प्रकारों-रूपों को साधा गया है, जो बख़ूबी सधे हैं। हास्य अभिनय का शास्त्र बन गयी है फिल्म, जिसकी बारीकियों (जो आम अमझ की नहीं हैं) को न समझने वालों के लिए यह ऊटपटाँग हरकत होगी। यूं तो सभी सातो-आठो कलाकारों ने अच्छा निभाया है, पर अनुपम खेर का कहना ही क्या ! मुंगीलाल के रूप में वही हीरो हैं - हास्य के हीरो जैसे। इस भूमिका में सबसे अधिक विविधता उनकी क्षमता के मुताबिक ही रची गयी होगी। उन्होंने आंगिक (देह के) अभिनय का मानक वाचिकता (बोलने) के सपोर्ट से साधा है, तो सतीश कौशिक ने वाचिक का जादू बिखेरने में आंगिक का सहाय लिया है। दोनो की कला में एनएसडी की ट्रेनिंग का निखार खुलकर बोलता है, जिसके अभाव में इंड्स्ट्री के मशहूर कॉमेडियन सतीश शाह सिमट कर रह गये हैं। क्या तभी दोस्त की मह्त्त्वपूर्ण भूमिका में दबे-दबे रूप में फिट कर दिये गये हैं? गुलशन ग्रोवर का खल पात्र चाह कर भी हास्य ला न सका। भूमिका में सम्भावना थी या नहीं, यह तो अनुपम जैसों को करना होता, तो पता लगता...। हाँ, गुलशन के बेटे बने कलाकार ने हास्य के कैरिकेचर रूप का अच्छा प्रदर्शन किया है। दोनो प्रेमी जोडे भी ठीक ही हैं। गेस्ट जैसी भूमिका में जैकी श्राफ से हास्य तो क्या, कुछ नहीं कराया गया है। परंतु कोफ्त होती है टेलीविज़न की ‘सोनपरी’ दीपशिखा को देखकर, जो फिल्मों में ढिबरी बनकर कारिख ही कारिख फेंक रही हैं। हास्य के अभिनय व अभिनय के हास्य की योजना न होती, तो कहानी तो ऐक्शन-सस्पेंस वाली हिंसक थीम की थी, पर मार-धाड भी इतनी अहिंसक, शालीन व विनोदी हो सकती है, के कायापलट फिल्मायन में शशि रंजन की विरल निर्देशन-कला का कमाल देखा जा सकता है। दृश्य-निर्माण में हास्य खिलता है, ध्वनि-संयोजन में गमकता है। पहनावे व सजावट इसमें चार-चाँद लगाते हैं। याने सबकुछ हास्यानुकूल है। परंतु यह भी उतना ही उल्लेख्य है कि इस सुनियोजित हास्य के इरादे ने कहानी को अजानी गलियों में भटकाया है, गोल-गोल घुमाया है। फिल्मांकन की स्थितियों, स्थलों, घटनाओं को काफ़ी ऊलजलूल बनाया हैं । गाने सब ठूँसे हैं- बस, सारी फालतू दृश्यावली के बावजूद होली वाला गीत पुराने बोल व पारम्परिक धुन (राठौड का इसमें क्या है?)में गाये होली वाले को छोडकर। याने किसी बात में कोई तर्क व वजह खोजना व्यर्थ है। और थोडी देर में ही यह समझ में आ जाता है। जो इस नीयत को समझकर देखेंगे, अभिनय का मज़ा ले सकेंगे, वरना... हाँ, बैठे रह गये, तो जान पायेंगे कि बचपन में ही बम्ब्लास्ट में घायल पिता के बिना इलाज मरने की वेदना से आहत अनुपम खेर ने अलीबाग में एक अस्पताल खोलने का संकल्प सँजोया, जो अंड्ररवर्ल्ड में जाकर कीव गयी सारी करतूतों के बावजूद बना रहा और ऐन समय पर सरगना जैकी ने मंजूरी दी। पैसे के लोभ में जाली वारिस बनकर आये चारो युवा-युवतियों ने भी सच का साथ दिया। याने भौतिकता के सारे लोभ-लाभ व अपराध की दुनिया की हैवानियत के बीच मनुष्यता अभी एकदम मरी नहीं है... का मेसेज... कितना सम्भव, पर प्रयास है, तो सही...। हास्य की फिल्मी बिक्री में संवेदना का यह फ्री गिफ्ट है। सो, फिल्म अपने शौकीनो से ये तवक्को रखती है कि ‘शौक-ए-दीदार अगर है, तो नज़र पैदा कर..’.। -सत्यदेव त्रिपाठी

Saturday, 17 May 2008

‘जन्नत’ का रास्ता - ईमाँ या कुफ़्र...?

‘जन्नत’ का रास्ता - ईमाँ या कुफ़्र...? चचा ग़ालिब के ज़माने में शायद यह द्वन्द्व जिन्दा था, जब उन्होंने लिखा था - ‘ईमाँ मुझे रोके है, खैंचे है मुझे क़ुफ़्र...’, लेकिन आज वह बात नहीं रही - क़ुफ़्र का जलजला तारी है... और ईमाँ की बेसिक समझ ही नदारद हो गयी है... लेकिन हमेशा की तरह भट्ट कैम्प ने अपनी नयी फिल्म ‘जन्नत’ में भी इस द्वन्द्व को क्या खूब जिन्दा रखा है...। क़ुफ़्र का सरताज़ है - हीरो अर्जुन (यह नाम हिन्दी फ़िल्मों को इतना प्रिय क्यों है !)। उसकी जन्नत का मतलब स्वर्ग नहीं, ऐशगाह है, जिसे वह जूए के बाद क्रिकेट पर दांव लगाने से होते हुए मैच-फिक्सिंग के ज़रिए झटपट में पा लेना चाहता है। झटपट में वह इतना बडा बूगी और फिर सबसे बडे डॉन का मैच सेटर कैसे बन जाता है, के लिए कहानी ने अर्जुन की छठीं इन्द्रिय (सिक्स्थ सेंस) जाग्रत कर दी है। इस बेवजह की वजह. से वह हर मैच के परिणाम का सही अन्दाज़ लगा लेता है। अब तो फिल्म की सतही समझ वाले इसे क्रिकेट की फिक्सिंग वाली फिल्म कह कर पल्ला झाड लेंगे। और इसे पिछले विश्व कप के वूल्मर-हादसे जैसी तमाम घटनाओं से जोड देंगे..। ख़ैर, इस काम के भरोसे वह अपनी जन्नत के एकदम करीब पहुँच जाता है- क़ुफ़्र का जल्वा...! पर इस भयावह लत तथा सिक्स्थ सेंस के साथ उसकी ‘जन्नत’ का एक अहम हिस्सा है - महबूबा ज़ोया, जिस पर पहली ही नज़र में दीवाना हो जाता है अर्जुन (दीवानगी की अदा के लिए फिल्म देखें) । सचमुच तो उसी के लिए वह डॉन का सेटर भी बनता है । और उस ज़ोया में कहानी ने कूटर्‍-कूट कर भर दिया है - ईमाँ। जूए के ज़माने से ही अर्जुन को सुधारने के पीछे पडा है - उसके मूल्यनिष्ठ पिता का मुरीद पुलिस इनस्पेक्टर ...। फिर तो दोनो (पक्षों) के बीच टक्कर शुरू। ज़ोया अर्जुन को पकडवा देती है। अर्जुन अपने रास्ते से यही समझता है कि पैसों के लिए ज़ोया ने ऐसा किया है, लेकिन डॉन की मदद से छूटकर आने पर पता चलता है कि वह तो अर्जुन की राह देख रही है और फिर से जिन्दगी शुरू करने के लिए क्लबों में नाचकर पैसे जुटा रही है। अब कश्मकश शुरू होती है - ज़ोया कुफ़्र के साथ रह नहीं सकती और अर्जुन ईमान पर चल नहीं सकता। अर्जुनों के बनने के कारण पर भी नज़र है । अर्जुन को याद है कि उसके माँ-पिता खिलौनों वाली सडक से उसे नहीं ले जाते थे..। उसे अपने बच्चे से इस तरह नहीं बचना है...। ऐसे अर्जुन को मारने के बाद इस कारण का जवाब भी देती है फिल्म, जब कम पैसों के कारण माँ ज़ोया को घर के जरूरी सामान लौटाते देखकर उसी अर्जुन का बेटा अपना खिलौना वापस कर देता है। याने जरूरत व विलासिता की समझ ही असली जन्नत बना सकती है। लेकिन वह बनेगी कैसे ? डॉन के रूप में कुफ़्र का सरगना तो जिन्दा है। याने कशमकश जारी है...। अर्जुन बना इमरान हाशमी इस कश्मकश को वैसा निभा नहीं पाता - जैसा कुफ्र को जी पाता है। कुफ़्र को छोडने जैसा जल्वा तो उसकी ज़ोया बनी सोनल चौहान का है भी नहीं। उसकी ईमाँ की ज़िद भी उसी की तरह नाज़ुक रह जाती है...। क्या यह सब भी इसी आज के पतनशील समय के असर का ही संकेत है ? कोई गीत-संगीत तो दिल को नहीं छू पाता, पर डॉन यूँ समझाता है कि क्रिकेट पर दाव लगाना ईमाँ का काम ही लगने लगता है । क्या यह भाषा भी इसी समय की देन है ? ये सब युग-सत्य के चेहरे की भयावह छबियाँ हैं। इनको उतना खुलकर न दिखा पाना एवं दोस्त व इंस्पेक्टर के चरित्र को कठ्पुतली-सा बना देना... क्या निर्देशक कुणाल देशमुख पर भी समय के दबाव के परिणाम हैं या कौशल की कमी...? इंस्पेक्टर के मना करने के बावजूद समर्पण के लिए तैयार अर्जुन को मार गिराने की ज़बर्दस्ती के बाद ज़ोया ठीक ही कहती है - यू बास्टर्स...। तो, यह सब देखने के लिए आँखें खुली रखना हो, तो एक बार इस ‘जन्नत’ में हो आना बुरा नहीं है...। - सत्यदेव त्रिपाठी

Saturday, 10 May 2008

भूतनाथ - भूत को देवदूत बनाता है आदमी

सिनेमा- भूतनाथ भूत को देवदूत बनाता है आदमी ... जी हाँ, बी.आर. चोपडा बैनर की फिल्म ‘भूतनाथ’ यही बताती है (इसलिए नाम देखकर इसे डरावनी वग़ैरह वाली फिल्म न समझें)। गोवा के एक भूत बँगले, जिसमें टैक्सी वाले व नौकर-चाकर तक नहीं आते, में रहने आये परिवार की माँ अंजलि शर्मा (जुही चावला) अपने बच्चे बंकू (अमन सिद्दीकी) को बताती है - ‘भूत-वूत कुछ नहीं होते, देवदूत (ऐंजिल) होते हैं’ (सारे माता-पिता, कृपया ध्यान दें)। और रात को जब सचमुच भूतनाथ (अमिताभ बच्चन) बनकर भूत आता है, तो उसे बच्चा देवदूत समझता है - डरता ही नहीं । वरन् ऐसे आदर, प्यार व मज़े से पेश आता है कि उसे सच ही देवदूत बनना पडता है, जो फिल्म में एक बेहतर इंसान सिद्ध होता है। याने फ़र्क़ आदमीयत का है - आदमी ही भूत भी बनता-बनाता है या भूत को देवदूत भी। फिर तो दोनो दोस्त बन जाते हैं और भूतनाथ का जादुई असर बंकू से मिलकर घर व स्कूल में खूब मज़े कराता है । यही मौज-मज़ा ही है तीन-चौथाई फिल्म, जिसके लिए ‘भूतनाथ’ सबसे पहले ‘बच्चों की फिल्म’ है - गर्मी की छुट्टियों की दावत (ट्रीट)। पर कहना होगा कि यह सबकुछ बचकाना भी है और कुछ बासी भी। गीत-संगीत भी महा बेरस.. जावेद अख़्तर तथा विशाल व शेखर ने क्या किया है, वही जानें। हाँ, एक गाने में अमिताभ बच्चन की आवाज उनके पिता बच्चनजी के काव्य-गायन की ख़नक की याद दिलाते हुए श्रवणीय बन पडी है। वरना ज़ाहिर है कि हम ऊबते हैं, लेकिन इस दौरान अमिताभ व उनके समक्ष अमन सिद्दीकी के अभिनय की समक्षता उल्लेखनीय है। दोनो के बडे-छोटे होने का अंतर तो ज़मीन-आसमान का है, पर अभिनय का रसायन (केमिस्ट्री) ऐसा बना है कि ‘को बड छोट कहत अपराधू’। और इसलिए मैं इस फिल्म का नायक तो अमन को ही कहूँगा - बिग बी तो महानायक हैं ही। सो, ‘भूतनाथ’ के असली खाद्य (रोटी-चावल) ये दोनो ही है, पर जुही चावला दाल की तरह सबमें मिली हैं तथा सदा की तरह खिली भी हैं। शाहरुख खान तो शुरू और अंत में शोरबे व मिष्ठान्न (सूप व स्वीट) की तरह हैं। चटनी-अँचार के लिए स्कूल में प्रिंसिपल सतीश शाह व घर में शराबी-पागल राजपाल यादव हैं, पर दोनो ही अपेक्षित स्वाद लाने में नाक़ामयाब हैं। इस सामग्री के साथ यदि आप बैठे रह गये, तो बच्चों की इस फिल्म के अंत के चौथाई भाग में बडों के लिए कुछ बडी बातें भी मिलेंगी - आज के लिए मौजूँ एवं मनोविज्ञान-सम्मत। तब समझ में आयेगा कि यह तत्त्व शुरू से ही पिरोया है, पर माले के धागे की तरह दिखता नहीं। इतने आयामों वाली इस फिल्म में ऐसा कौशल विवेक शर्मा के निर्देशन की खूबी है। कहानी (लॉर्ड ऑफ़ घोस्ट्स) की ताकत है, जिसमें भूतनाथ सचमुच भूतनॉट (भूत नहीं) है। वह तो उस बँगले के मालिक कैलाशनाथ की अतृप्त आत्मा है, जो बँगले में भटक रही है...। पोशाक व पात्रत्त्व में भी भूत का वैसा भान नहीं होता । क्या सोद्देश्य ? उनका बेटा अमेरिका पढने गया था, पर वहीं बस गया। अपनी मरती माँ को देखने तक नहीं आया। और एक बार आकर पिता से पूछे-बताये बिना बडे महँगे दामों वह बँगला बेचने चला। न बेचने लिए जो तर्क देते हैं कैलाशजी, उसे आज की नयी पीढी के हर युवक को सुनना चाहिए - भौतिक यथार्थ के समक्ष भावात्मक यथार्थ का ज़हीन पक्ष। 4-5 साल का पोता दादाजी से लिपट जाता है, पर बटे-बहू खींच कर लिए चल देते हैं - मुडकर देखते तक नहीं कि उन्हें रोकने के आवेग में कैलाशनाथजी गिर जाते हैं- खून से सने लावारिस-से मर जाते हैं। इसी अतृप्ति वश भूत बनकर इस बँगले की रक्षा में किसी को रहने नहीं देते थे, पर बंकू में उसी पोते को पाकर अब इन्हें जाने नहीं देते। अमेरिकन बेटा ग्राहक लाता है, तो तूफ़ान खडा कर देते हैं। यहीं खत्म होना था फिल्म को, पर एक और वर्ग को भुनाने की कोशिश में मन्दिर के पुजारी की सलाह पर कैलाशनाथ की आत्मा की मुक्ति के लिए बंकू के हाथों शाहरुख व जुही श्राद्ध कराते हैं। पहले इनकार के बाद अंत में बेटा विजय भी शामिल हो जाता है और इस भाग में विजय बने प्रियांशु चटर्जी ध्यान भी खींच पाते हैं। भूत से बना देवदूत अब मुक्ति के बाद सितारा देवदूत (स्टार ऐंजिल) बन जाता है और खल पात्र रहा विजय सद्पात्र बन जाता है । फिल्म को बच्चों की नज़र से देखने व बडों की दृष्टि से समझने के लिए सभी को देखनी ही चाहिए, पर धीरज धरे जिग़र के साथ,,,। - सत्यदेव त्रिपाठी

Friday, 9 May 2008

माँ इसे देवी कहती... (समापन किस्त...)

माँ इसे देवी कहती... (समापन किस्त...) इस तरह देवी इतना बाहर रहने लगी कि घर के लिए ही पहुनिया हो गयी। कहीं रुकने पर फोन करना भी बन्द हो गया। इसे लेकर कभी किसी बात पर मेरी पत्नी के मुँह से निकल गया - ‘जीजी का इतना बाहर रहना ठीक तो नहीं है...’ और माँ ने डपट दिया - ‘ख़बरदार, देवी है मेरी बेटी। मत भूलो कि उसी की राय से ही तुम इस घर में बहू बनकर आयी हो...’। देवी के कानों तक भी यह बात गयी । उसने कहा तो कुछ नहीं, पर तभी से ज्योति के हाथ का खाना-पीना तक बन्द कर दिया - बात करना तो दूर की बात। उसका ऐसा करना मुझे कुछ ठीक न लगा, पर माँ के लिए यह भी उसके देवी होने का ही प्रमाण बन गया - त्याग, प्रतिज्ञा, साधना,.. जाने क्या-क्या !! और देवी का खाना माँ ख़ुद बनाने लगी - वह जब कभी-कभार घर रहती...। लेकिन बात ज्योति तक ही नहीं रही...। चाल की कोई पडोसन कभी पूछ ही देती - ‘देवी इतने-इतने दिन तक कहाँ रहती है बहनजी...’? और माँ गर्व के साथ बताती - ‘फला लेखक के यहाँ गयी है या अमुक कलाकार ने बुलाया है. या तमुक जगह सेमिनार है..’। बिटिया जाति का इस तरह बाहर रहना ठीक नहीं बहना...’ - पडोसन बडे अपनापे से कहती। ‘मेरी बेटी कोई ऐसी-वैसी नहीं...’- माँ का वही पुराना राग बजता- ‘’देवी है, देवी...’। पर नौकरी के मामले में बडी अनलक्की रही देवी - न उसका देवीत्व काम आता, न सम्पर्क के इतने सारे बडे-बडे लोग...! छोटी-मोटी अस्थायी नौकरियां ही करती रहती...। फिर तो एक दिन ग़ज़ब ही हो गया। वह ऑटो से उतरी और झम्म से मेरे सामने आकर खडी हो गयी - ‘पहचानो, तो जानें...’। और फिर मॉ की ओर मुडी - ‘देखा माई, हमहूँ मॉडर्न हो गइली ...’! इस विनोद भरे प्रदर्शन के बाद ख़ुद ही बताने लगी - “बहुत दिनों से लोग कहते थे - ‘ब्यूटी पॉर्लर जाओ...ब्यूटी पॉर्लर जाओ...। वे लोग ‘लुक’ ऐसा बदल देंगे कि व्यक्तित्त्व निखर आयेगा- आजकल नौकरी के लिए योग्यता के साथ यह सब भी ज़रूरी है’। और आज तो अमिताजी जबर्दस्ती लेकर ब्यूटी पॉर्लर ही चली गयीं। पेमेंट भी उन्होंने ही किया”। ये अमिताजी इधर देवी की नयी मित्र हुई हैं। उम्र पचास के ऊपर.। रहन-सहन टीप-टॉप । पति का करोडों का कारोबार। ख़ुद का एन.जी.ओ.। उन्हें देवी में न जाने क्या दिखता कि महीनों अपने यहाँ से आने नहीं देतीं। वहाँ भी रहने जाने के पहले रिचुअल की तरह मुझे घर दिखाने ले गयी थी देवी - झील किनारे राजा-महाराजा जैसा उनका बँगला...। इधर अमिताजी के रोज़ ही कुछ न कुछ उपहार आने लगे - सोने तक के। और आज ‘लुक’ ही बदल डाला- बालों के स्टाइल से चेहरे तक का काफ़ी कुछ...। शायद मेरे चेहरे पर इस नये अवतार के प्रति उदासीनता दिखी हो...तभी तो देवी ने कहा- ‘मेरे भैया को तो यह सब फ़ूहड लग रहा होगा, क्योंकि अपनी बहन कराके आयी है। दूसरी औरत कराके आये तो...’। होंठ तो फडके मेरे, पर कह कुछ न सका, लेकिन ताज्जुब हुआ कि माँ भी उस दिन चुप रह गयी - देवी-पुराण शुरू नहीं किया। ..... बस, माँ की उस चुप्पी की याद ने खयालों से निकालकर अचानक माँ के पास पहुंचा दिया - दुकान पर। जाकर उसे अन्दर खींच कर ले गया और सीधे बोलना शुरू किया - “तुम्हें पता है सविता-अमिता के गिफ़्ट के नाम पर तुम्हारी देवी की मोबाइलों की दुकान खुल गयी है। एक की घंटी बजी और झोले में हाथ डाला, तो चार-चार मोबाइल...। मालूम है, उठाने पर क्या सुनना पडा - ‘क्यों मेरी जान, इतनी देर से फोन बजा रहा हूँ। कहाँ हो...”? गुस्से से मेरा मुँह टेढा हो गया था। शब्द चबा-चबा कर निकलने लगे थे - “एक अलहदा फोन देने पर भी यह हाल है कि चांस नहीं मिल रहा है...कहाँ-कहाँ एनगेज़ रहती हो ? ...कल इसी वक्त तुम्हारी बाँहों में था। बडी याद आ रही है...’’ - कहते-कहते रुलाई फूट पडी मेरी... रोते-रोते ही डाँटने पर उतर आया- “अब बोलो, यह मोबाइल की दुकान है या धन्धे का सामान ? और बनाओ देवी..। मेरा माथा तो ब्यूटी पॉर्लर के दिन ही ठनका था- वैक्संग, आईब्रोज़...। ब्लाउज़ के आगे का हिस्सा देखा है आजकल उसका ? पीठ तो आधी कब से खुली रहती थी !! देख लिया ? रात-रात भर बाहर रहकर कौन-सा इंटर्व्यू लेती-देती है ? किस सेमिनार में जाती है ? उसकी सहेलियां हैं कि दलालों की गैंग ? बहनजी रोज़ लाती थीं - उपहाSर. ! हुंह..सब बकवास..। कीमत मिलती थी - कीमत । गिफ़्ट के नाम पर हमें उल्लू बनाया जाता था। सब अय्याशी है। आने दो आज तुम्हारी ‘देएएवी’ को, गला न दबा दिया, तो...” ”नाहीं-नाहीं बचवा...अइसा ना करना” - माँ के झर-झर आंसू बह रहे थे - “वो खुदै जाने वाली है। हम तो कब से जानि गयी हूँ। एक बार फोन पर की बात सुन ली थी। तब से केतना दफा आड-आड से सुनी। अपनी लाज... केसे कहैं ? आज तुमहूं जानि गये, तो बताय देत हैं..। होटल-फोटल के धन्धा करै वाले सविता के घर के मर्दन ने पहले बिगाडा इसको..। सान-सौकत की लत लगाय दिये। ऊ सब हियाँ से तो मिलता नाहीं..। बस, ऐस-आराम के बस में होय के बिगड गयी लडकी..। गल्ती हमरी भी है कि देवी माना। कभी जानने की परवाह नहीं की...। बाकी अब तो अमिता के मरद से इसका परेम चलि रहा है”। ‘’प्रेएएम...!! वो भी धन्धा ही होगा... कालगर्ल कह्ते हैं । बहुत बडा रैकेट चलता है ...” “जो होवे...” - माँ पर जरा भी असर नहीं - ‘’ ऊ रखै वाले हैं इसको। अलग घर देवै की बात चलि रही है। ई सब चरित्तर खुलने के पहिले अइसे ही सही, बन्द होइ जाये, उहै अच्छा...” “माई, क्या कह रही है..? तू तो औरत है। जरा सोच, अमिता आँटी का क्या होगा “? “ई बखत ई सब देखने का नाहीं है” - फिर आँसू पोंछते हुए बोली -“हमन के मुंह कालिख लगने के पहिले ई बलाय हियां से टरि जाय, तबै अच्छा...” ”और अपने से 20 साल बडे शादीशुदा आदमी की रखैल बनने से कालिख नहीं लगेगी क्या” ? “हम सोचि लिये हैं ऊ भी। एक बार गयी, तो फिर इस छिनाल को लात नहीं रखने देंगे हियाँ। सबको कहि देंगे- बहुत बडे लोग हैं। साल में दस-ग्यारह महीना तो बिदेस में रहत हैं। बाद में चाहे कोई जो कहे... इस जैसी बदनामी से तो बचि जायेंगे...”। और मैं इस ‘देवी’ को देखता रह गया था - हैरत से, हसरत से...!! ** ** **

Thursday, 8 May 2008

माँ इसे देवी कहती ...! दूसरी किस्त

माँ इसे देवी कहती ...! दूसरी किस्त देवी की पढाई भी रंग लाने लगी। उसने बी. ए. पास किया - युनिवर्सिटी में टॉप करके । अब तो पास-पडोस व नात-हित ने भी मान लिया कि देवी में कुछ तो खास है...। वरना जब से वह ससुराल से लौटी थी, किसी को भी उसके लिए अन्दर से सहानुभूति नहीं रह गयी थी। फिर तो एम.ए. में दाखिला लिया और सभी अध्यापकों की प्रिय हो चली...। उसका एक सर्कल बनने लगा, जिसमें धनी घरों की दो-चार लडकियां देवी की सबसे अच्छी दोस्त बनीं। पर कहना होगा कि चाल के अपने छोटे-से घर व केराना की दुकान जैसे पेशे से कतई शर्मिन्दा नहीं होती देवी..। सबको घर ले आती । आने वाले भी मुतासिर होते कि इतनी असुविधाओं के बीच भी देवी इतना अच्छा पढ लेती है। तथा ऊँची सोसाइटी वालों के साथ भी बाहर उतनी ही सहजता से रह लेती है। बस, मुझे खटकता यही कि पिता की बीमारी व मौत के बाद की अपनी करनी सबको बताती जरूर - टुकडे-टुकडे में, पर पूरी। और अपने को ‘देवी’ मानने की बात का तडका ऐसा लगाती, जो लोगों को विनोद भी लगता, मगर सच भी । परंतु यह मुझे बडा फूहड लगता...। इस सरनाम स्थिति में जब एम.ए. के पहले वर्ष की परीक्षा के दिन आये, तो देवी पहली बार अपनी एक अमीर सहेली अर्पणा के घर रहकर पढाई करने गयी - बेशक़ मुझे वहाँ पहले ले जाकर दिखा देने के बाद ही। परीक्षा के बाद वहाँ से आयी, तो कन्धे पर एक झोला लटकाए हुए । बताया अर्पणा के भाई ने दिया है - ‘शबनम’ कह्ते हैं। तभी से शबनम उसके कन्धे का स्थायी शृंगार बन गया। फिर तो भिन्न-भिन्न रंगों-डिज़ाइनों के कई-कई शबनम भेंट में आने लगे...। फिर उनमें रखे कई तरह के उपहार भी...। कोई किसी सहेली ने दिया, कोई किसी सहेली के भाई ने...फिर कोई और किसी मित्र ने...। न तो देवी बताते अघाती, न ही माँ सुनते...। तमाम सहेलियों-दोस्तों के फोन आने लगे...कुछ घर भी आते। देवी की तारीफ़ों के खूब पुल बाँधते...। और माँ गदगदायमान होकर कहती - ‘देवी तो सच ही देवी है’। ज़ाहिर होता गया कि उसके दोस्तों का सर्कल बढरहा है - बेतरह...। क्या बेतरतीब भी ? झोले में दिखता कि ढेर सारी दुनिया-जहान की चीज़ें भरी हैं...। और आज उसी झोले के सामान ने ही अचानक प्रकट होकर यह सब सोचने पर मज़बूर कर दिया...। पछता भी रहा हूँ कि क्यों उठा लिया मोबाइल...? बजकर बन्द हो जाने क्यों नहीं दिया...? या शुरू में ही क्यों नहीं रोका इस उपहार परम्परा को...? आखिर देवी तो कभी भेंट देती नहीं किसी को...। फिर इस इकतरफ़ा गिफ़्ट का मतलब... ? अजीब तब भी लगा था, जब एम.ए. दूसरे वर्ष की परीक्षा के दिनों वह अर्पणा के यहाँ न जाकर सविता के यहाँ जाने की बात करने लगी - ‘वो मान नहीं रही है। कहती है, इस बार मेरे ही घर आना होगा। दोनो साथ ही पढेंगे..’। सविता के पति का होटेल का करोबार है। देवी वहाँ जाती तो पहले भी थी, पर रहने जाने के पहले वहाँ भी मुझे ले गयी। याद है, मैंने रास्ते में कहा था - ‘दीदी, तुम दोस्तों के मामले में बडी ‘लकी’ हो’। वह मुस्करायी, फिर बोली - ‘अच्छी पढाई की सुविधा मिल जा रही है, तब तक माँग बनाये रखनी है’...। और मैं चौंक पडा था - यह तो बाज़ार की भाषा बोल रही है...। पर बातों की रौ में बात ‘आयी-गयी’ हो गयी। सविता का घर बडा आलीशान । देखकर पहला ख्याल यही मन में आया - यहाँ एकाध महीने रहने के बाद देवी उस चाल वाली अपनी खोली में रह कैसे पायेगी ! पर मानना पडेगा कि वहाँ से लौटने के बाद अपनी खोली में और अधिक मन से ही रहती दिखी...। लेकिन अब धडक खुल गयी और धीरे-धीरे सहेलियों के यहाँ रुकना अक्सर होने लगा। कभी भी बस, फोन घुमा देती - ‘माई, हम फलानी किहाँ हई। आज यहीं रुकि जाब... हाँ ई ना मानति हईं...अच्छा..’ ? लेकिन कई बार मुझे यह भी लगता कि देवी यहाँ-वहाँ जाने का मौका ख़ुद ही निकालती है। हाँ, छाप ऐसी छोडती है कि जाना-रुकना पड रहा है ! इसी तरह एक-एक उपहार किस-किसने दिया, सभी दोस्तों को यूँ बताती कि मुझे लगता - जैसे सामने वाले को उकसा रही है उपहार देने के लिए...। और यह सब दिनो-दिन बढता ही रहा ...। हाँ, रिज़ल्ट आया, तो उसने टॉप किया एम.ए. में भी । बधाइयों-प्रशंसाओं के ढेरों फोन आये., अख़बार में फोटो भी छपा। अब तो हमारी चाल की स्टार ही हो गयी देवी - सभी लड्कियों के लिये उदाहरण, आदर्श । चाल की सभी लडकियाँ ‘देवी दीदी, देवी दीदी’ कहती उसके इर्द-गिर्द घिरी रहने लगीं, जो मुझे बहुत अच्छा लगता...। अब ‘देवी’ नाम सार्थक होने लगा था...। लेकिन जल्दी ही यह भी होने लगा कि लडकियाँ अक्सर इंतज़ार कर-करके थक जातीं और देवी नहीं मिलती...। कभी जब मिल जाती, तो दस-पाँच मिनट भर के लिए ही। और उस दौरान भे यही बताती सुनी जाती कि किस तरह किसी कविगोष्ठी, किसी कहानी-पाठ, किसी सेमिनार...आदि आयोजन में रोक ली गयी...। और माँ यह सब कान पारकर सुनती.. गर्व से भर उठती। पर न जाने क्यों, मुझे इतना बाहर रहना अच्छा न लगता। रोज़-रोज़ इतने आयोजनों पर शंका हो उठती..। मेरे भाव ताड ही गयी होगी , तभी तो एक दिन कहा उसने - ‘सामतवादी पुरुष-परम्परा के मेरे भाई को मेरा यह सब भा नहीं रहा न...! लेकिन परेशान न होओ मेरे भाई, धीरे-धीरे समझ जओगे कि मैं तनिक भी ग़लत नहीं हूँ...’। और आज समझा, तो घिन आ रही है, पर तब तो शरमा ही गया था...। फिर तो देवी बाहर भी जाने लगी - नेशनल आयोजनों में...। कभी हवाई जहाज से भी बुलाया जाता । दो दिन के लिए कहकर जाती और कभी सप्ताह भर भी लगा देती...। वहीं से फोन करती - यहाँ एक बडी ऐतिहासिक जगह है। आयोजक हमें कार से वहाँ पिकनिक कराना चाह रहे हैं। तो, दो-तीन दिन बाद आती हूँ’। और ऐसा ही कुछ अक्सर होता...। सुनकर मैं उदास हो जाता, पर माँ बडे अभिमान भरे उछाह से कहती - ‘का फिकिर करते हो बचवा, तोहरी बहन तो सचमुच की देवी है। किसी बडे पुण्य से पैदा हुई है इस घर में। देखते रहो - केतना आगे जाती है...! तोहरे बाबूजी की बानी - ‘ देवी खान्दान का नाम रोशन करेगी’ - झूठ थोडे न होगी ‘! समापन किस्त.पढिए - कल...

माँ इसे ‘देवी’ कहती... !!

माँ इसे ‘देवी’ कहती... !! - सत्यदेव त्रिपाठी पहली किस्त- अचानक चाल में जोरों का झगडा शुरू हुआ....और अपनी आदत के मुताबिक देवी वहाँ पहुंच गयी। मैं अकेला रह गया कमरे में...। आजकल यूं भी देवी कम ही मिलती है घर पर। सहित्य- कला आदि के तमाम कामों में बिज़ी हो गयी है। हमें अच्छा लगता है...। इसलिए अभी थोडा-सा वक्त मिला था, तो उसे भी छोडकर उसका चले जाना कहीं खल गया। मेरी इकलौती बहन है - देवी। मुझसे तीन साल बडी । और मैं भी उसका इकलौता भाई , पर व्यवहार में वह माँ जैसी मेरी केयर करती है। मुझ पर आयी हर मुसीबत को अपने ऊपर ओढ लेना चाहती है... इन्हीं सब ख्यालों में उतरा ही रहा था कि बगल में पडे देवी के झोले में मोबाइल बज उठा... । निकालने चला, तो एक-एक करके चार मोबाइल हाथ आ गये। याद आया कि उसकी सहेली सविता ने एक मोबाइल भेंट किया था...पर दो की जगह ये चार-चार...!!! आश्चर्य के साथ बजने वाला ऑन किया और बिना हेल्लो किये ही सामने से जो सुन पडा...कि ओफ़ ..! हाथ-पैर सुन्न हो गये। गुस्से से सारा बदन जलने लगा। .. वहीं बिस्तर पर पड गया। सामने चार-चार मोबाइल ..जैसे चार-चार साँप - फ़न उटाये ...। बस, देवी का गला ही दिख रहा था मुझे। पंजे कुलबुलाने लगे थे... पर हाय रे लोक-लाज ...और इस वक्त वह लोक के बीच थी !! झगडने वाली दोनो पार्टियों को उपदेश पिला रही होगी - ‘देवी’ जो ठहरी... ! और उसी झोंक में झोला-मोबाइल भूल गयी.. वरना आजकल एक मिनट के लिए भी झोला नहीं छोडती - भेद अब समझा..। वाह री देवी...धन्य है..! हारकर थसमसाया पडा रहा। एक - एक करके दृश्य उभरने लगे... ...असल में ‘देवी’ नाम इसे पिताजी ने दिया था। तब यह 10-12 साल की रही होगी, जब पहली बार इसका कहा सबके ध्यान में आया - ‘आज सपने में मैंने देखा कि गोलू फेल हो गया है’..। और पिताजी ने ‘चुप-चुप, चूप...ऐसा नहीं बोलते। किसी और से मत कहना...’ कहकर चुप करा दिया था। आख़िर गोलू गाँव के सबसे बडे ठाकुर का इकलौता बेटा था। लेकिन रिज़ल्ट आया, तो गोलू सचमुच फ़ेल हो गया। बस, अपनी बेटी में पिताजी की आस्था जमने लगी। उन्हें इस बात का ख्याल भी नहीं आया कि मुम्बई में रहता उनका दामाद भी फ़ेल हो गया है, जिससे बचपन में ही ब्याही गयी थी देवी। फिर पिताजी की ग़वाही में देवी की कई-कई बातें सच होने लगीं। मसलन - सपना देखा कि फ़ला आज मुंबई से आ गये हैं...फलनियां ससुराल से भाग आयी है.. वग़ैरह..। बस, पिताजी कहते सुने गये - इसकी जिह्वा पर तो कोई देवी बैठी हैं। और धीरे-धीरे उसका नाम ही पड गया - ‘देवी’... पिताजी की ‘देवी बिटिया’, माँ की ‘देवी रानी’... और कभी गुस्से में ‘देविया’..। उन्हीं दिनों चाचाजी के साथ बँटवारा हुआ और मुम्बई की एक दुकान पिताजी को मिली। बस, हम मुम्बई आ गये । दुकान ठीकठाक चलने लगी और हम पढने लगे। लेकिन इतने में साल भीतर ही देवी के गवने का समय आ गया और अपनी पढाई के छूटने का मलाल लिये वह ससुराल चली गयी । परंतु चार दिन भी नहीं बीते कि पिताजी को बुलवाकर वापस भी आ गयी। आते ही घोषणा कर दी - ‘अब मैं ससुराल कभी नहीं जाऊंगी...आगे पढाई करूँगी..’। और पिताजी ने देवी के प्रति अपनी आस्था की रौ में इसे भी ‘दैवी विधान’ मानकर मंजूरी दे दी। पूछा तक नहीं कि आख़िर वहाँ हुआ क्या ...। देवी देखने में सुन्दर है। व्यवहार में कुशल है। करने-धरने का गुन-सऊर भी है। सो, इसे लेकर तो कुछ नहीं ही हुआ होगा...। परंतु कोई आज तक न जान सका कि देवी ने ऐसा किया क्यों ? कोई कुछ कह भी न सका - पिताजी का देवी में अखंड विश्वास !! ...धीरे-धीरे यह तय हो गया और सबने मन ही मन मान भी लिया कि देवी अब विवाह नहीं करेगी..। उसने अपनी पढाई जारी कर ली...। दुर्भाग्य से कुछ ही दिनों बाद पिताजी कैंसर की भयावह बीमारी से ग्रस्त पाये गये। पूरा घर बेहाल हो गया। पर देवी खडी हो गयी - चट्टान की तरह...। एक वक्त तो ऐसा ही आया कि उसने इलाज़ के लिए लोगों से घूम-घूमकर पैसे माँगने में भी संकोच नहीं किया। फिर भी हम सब पिताजी को बचा न सके। लेकिन इस दौरान देवी के प्रति वैसा ही भाव माँ के मन में भी उमड आया - जैसा पिता में था। इस दौरान दुकान एकदम बैठ गयी। हम दोनो की पढाई भी छूट गयी। मुझे तो पिता के न रहने पर पढाई छोडकर दुकान सँभालनी ही थी, पर देवी ने भी अपनी पढाई को किनारे करके दुकान को लाइन पर लाने में अपनी जान लडा दी। उतना सब कर पाना अकेले मेरे बस का न था। और दुकान जब ठीकठाक चलने लगी, तो देवी ने फिर से पढाई शुरू की। देवी के इस काम ने मुझे भी उसका गहरा विश्वासु बना दिया, पर माँ-पिता जैसा अन्धविश्वासु नहीं। मैं उसे दीदी ही कह्ता रहा - ‘देवी दीदी’ कभी न कह सका। ....अगली किस्त कल...