Wednesday, 13 May 2020

लेख इतने समय से आया है कि अपने मकसद को स्वत: पूरा कर देता है।
इसके लिए अरुण देव, समालोचक व लेखक बधाई के हकदार हैं।
और इससे वे तमाम पाठक लाभान्वित होंगे, जो स्व. नवलजी को कम
जानते होंगे...ज्यादा की अपेक्षा आने वाले समय में पूरी होती चलेगी...

Friday, 15 July 2011

पर्यावरण और रंगमंच्

पर्यावरण और नाटक.... - सत्यदेव त्रिपाठी


पर्यावरण पर आयोजित सेमिनार में ‘नाटकों में पर्यावरण’ पर मुझे बोलना है, जानकर सोचना शुरू करते ही मेरी ज़ेहन में उभरी- नृत्य-नाटिका ‘प्रकृति’, जिसका शो मुम्बई में मैरीन लाइंस के समुद्र-तट पर स्थित भव्य ‘टाटा थियेटर’ में हुआ था और प्रकृति की भूमिका की थी नामचीन फिल्मनेत्री व कुशल नृत्यांगना आयशा ज़ुल्का ने। उन्हीं का निर्देशन भी था और उन्हीं की कथा-संकल्पना भी। लेकिन दिमाँग पर बहुत ज़ोर डालने के बावजूद उसमें आज के प्रचलित पर्यावरण – याने पर्यावरण-प्रदूषण या पर्यावरण-रक्षण - जैसा कुछ याद न आया। वह तो एक अनाथ लडकी के नृत्यांगना बनने की कथा थी। बस, प्रकृति की मनोरम छ्टायें अवश्य थीं मंच पर, जिसमें ‘प्रकृति’ नाम को सार्थक करती पली-बढी थी वह लडकी। याने ‘प्रकृति’ नाम भर से ही उसकी याद आ गयी थी...।

और फिर बहुतेरे नाटकों के बारे में सोचा, लेकिन कुछ भी पर्यावरण-प्रदूषण-रक्षण...जैसा याद न आया। इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि नाटकों में ऐसा होगा ही नहीं, पर मेरे संज्ञान में नहीं आया- सिवाय कुछ पथ-नाट्यों के, जिनमें बतौर सूचना, प्रचार कोई सन्देश होता है - सुधार की सीख या नसीहत जैसा... और जिसके विषय होते हैं - सूखा-बाढ, पानी की बर्बादी, पेडों-जंगलों का कटना, नदियों-तालाबों का पटना, सफाई के अभाव में गन्दगी से फैली बीमारी व उससे बनती-बढती बर्बादी... आदि। लेकिन ये पथ-नाट्य नाटक-विधा के प्रमुख आयाम नहीं हैं। निर्मिति-प्रस्तुति व प्रसार-प्रभाव... याने प्राय: उनका सबकुछ फौरी हुआ करता है, जिससे बाद में कुछ भी याद नहीं रह जाता।

फिर नाटक के अलावा उपन्यासादि विधाओं पर भी नज़र दौडायी और वहाँ भी ऐसा ही पाया। इसका अर्थ यह कि पर्यावरण उस रूप में साहित्य में आ ही नहीं सका है, जैसा कि ‘एनजीओज़’ द्वारा लिये गये प्रकल्पों व मीडिया के बरक्स जीवन में तो नहीं, फ़िज़ाँ – वही पर्यावरण में - आज छा गया है, जिसका एक रूप यह सेमिनारी आयोजन भी है। तब मन में बात उठी कि न सही पर्यावरण; ऐसा क्या है, जो साहित्य में उसी रूप में आता है? दर्शन तक को भी साहित्य शुद्ध दर्शन की तरह कहाँ लेता है? याने साहित्य सबकुछ को अपनी तरह लेता है।

और इससे भी बडा सच यह है कि जो कुछ भी दुनिया और जीवन में है, वह सब किसी न किसी रूप में साहित्य में प्रतिबिम्बित होता ही है। तो पर्यावरण भी हुआ ही होगा। तो किस रूप में हुआ? फिर साहित्य के मूर्त्त रूप नाटक की तो एक अपनी ही दुनिया होती है – नेपथ्य की भी और मंच की भी। तो पर्यावरण इस दुनिया में भी आया ही होगा – वही कि किस रूप मे...?

• * *

इसी पर सोचते हुए ‘अभिज्ञान शाकुंतल’ की याद हो आयी, जिसमें शकुंतला भी उक्त प्रकृति की तरह ही प्रकृति के बीच पली-बढी, उसी से समरस हुई, प्रकृति के फूल-पत्तों के गहने पहने दिखी और सुनायी पडा कि उसे पति-गृह के लिए विदा करते हुए पिता ऋषि कण्व उसी प्रकृति से कह रहे हैं- “पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्माष्व पीतेषु या, ना दत्ते प्रिय मण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्।

आद्ये व: कुसुम-प्रसूति समये यस्या: भवत्युत्सव:, सोइयं शकुंतला पति-गृहं याति सर्वैरनुज्ञायताम्”।

याने उस समय वनप्रांतर में प्रकृति के साथ ऐसी समरसता !! पौधों को पानी पिलाये बिना शकुंतला स्वयं पानी नहीं पीती, अपने शृंगार के लिए प्रिय होने के बावजूद स्नेह के कारण उनके पल्लवों को नहीं तोडती, उनका कुसुम-प्रसव ही शकुंतला का उत्सव होता, तो फिर इतने प्रियतों को बताये बिना उस बेटी को ऋषिवर कैसे विदा कर देते? ऐसी समरसता, ऐसा स्नेह तो आज भरे जीवन में मनुष्य-मनुष्य के बीच भी नहीं रहा। मनुष्य जिस तरह प्रकृति को काट रहा है, उसी तरह अपनों को भी। क्या पर्यावरण की समस्या इसी वृत्ति के कारण तो नहीं आ रही है। फिर उनके लिए प्रोजेक्ट ले-लेकर

कमाने के लिए जो कुछ हो रहा है, क्या उससे कोई समस्या हल होने वाली है? ऐसी शकुंतला को कम से कम पढा तो जाये, तो कुछ मानसिकता तो बने- पर्यावरण बनने की बात तो दूर...!

चलिए कालिदास से थोडा और पीछे चलें भास की तरफ... शकुंतला तो ख़ैर वन में ही पली-बढी थी- वनहित कोल-किरात किसोरी’ जैसी, लेकिन ‘प्रतिमा नाटकम्’ की सीता तो महलों से वन में गयी थी। लेकिन कितनी समरस हो गयी? कवि कहता है-

“योsस्या: कर: श्राम्यति दर्पणेपि, स नैति खेदं कलशं वहंत्या:।

कष्टं वनं स्त्रीजन सौकुमार्यम्, समं लताभि: कठिनी करोति”॥

ऐसी महिमा प्रकृति की कि लताओं की तरह ही स्त्री-सौकुमार्य को भी कठिन बना देती है, जिससे वह सीता भी भरा कलश ढोने लगती है, जो महलों में कभी दर्पण उठाने में भी थक जाती थी। क्या आज का एनजीओ मालिक वहाँ जाकर ऐसी समरसता, ऐसी शक्ति पाना चाहता है? फिर एसी में बैठकर दूर से पर्यावरण की समस्या कैसे हल होगी?

मेरे ख्याल से पर्यावरण के लिए कार्य करने वालों को ये नाटक पढने चाहिए।

मुझे लगता है कि कुछ-कुछ स्पष्ट हुआ कि साहित्य किस रूप में लेता है चीज़ों को....और पर्यावरण किस रूप में आया है प्राचीन नाटकों में, जो आज के पर्यावरण के सन्दर्भ में कैसे पढे जा सकते हैं। और आज के पर्यावरण-विदों को बताता भी है कि पर्यावरण को मुक्त करने के लिए शकुंतला की तरह पर्यावरणमय होना पडेगा, सीता की तरह पर्यावरण को अपनाना होगा, क्योंकि –

‘न हम कुछ हँसके सीखे हैं, न हम कुछ रोके सीखे हैं; जो कुछ थोडा-सा सीखे हैं, किसी के होके सीखे हैं’, लेकिन इस प्रक्रिया व सच को भूल चुकी है आज की दुनिया, जो सर काटकर बालों की रक्षा कर रही है!!

• * *

इसी भूलने का परिणाम है कि आज हम प्रकृति का दोहन कर रहे हैं। पर्यावरण को विषाक्त बना रहे हैं। और भोपाल गैस काण्ड से ज्यादा विषाक्त और क्या हुआ होगा, जिसमें भर शहर का जीवन ही दूषित तो क्या, प्राय: नेस्त-नाबूद हो गया। और उसी शहर में बसे महान रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उसी काण्ड पर नाटक बनाया- ‘ज़हरीली गैस’। याने पर्यावरण के परिणाम पर नाटक। लेकिन काण्ड के बाद बना और काण्ड के भेदों को खोलने-बचाने के चक्कर में उलझकर रह गया। हबीब साहब अपनी गीत-संगीत की नाट्यवृत्ति को भूले तो क्या होंगे, विषय के साथ न्याय करने के फिराक़ में उसे नज़रअन्दाज़ किया और परिणाम यह हुआ कि ऐसा अक्षम मंच हबीब साहब का कभी न रहा। याने यदि साहित्य या नाटक या कला किसी थीम को व्यक्त करने में अपनी प्रकृति को छोडेगी, तो थीम तो छूटेगी ही, कला भी जाती रहेगी। याने जिस तरह ऊपर उद्धृत नाटकों में पर्यावरण को प्रकृति और उसकी समरसता के रूप में लिया गया है, साहित्य के लिए वही वरेण्य है।

और देखिए जब उसी रूप में हबीब साहब ने शेक्सपीयर के ‘मिड समर नाइट ड्रीम’ पर बने ‘कामदेव का अपना, वसंत ऋतु का सपना’ में प्रकृति को लिया, तो कैसी बात बनी!! संयोग से मुझे वो देखने को भी मिला – प्रकृति की खुली गोद में- ‘हॉरिमन सर्कल गॉर्डेन’ (मुम्बई) के मुक्ताकाशी मैदान में, जहाँ चाँदनी खिली रात थी, पेड-पौधे थे, लताओं के गुल्म थे, झाडियों के झुरमुट थे... और उसी के बीच पेडों से कूदकर, झुरमुटों से निकलकर आते थे हबीब साहेब के लोक कलाकार – फूल-मालाओं में गमकते प्रकृतिमय होते हुए...। वसंत ऋतु के सपने का ऐसा साकार रूप भला और क्या हो सकता है? स्वस्थ-सुन्दर पर्यावरण तथा उसमें खिले ऐसे खुशनुमा जीवन का इससे अच्छा रूप और क्या हो सकता है? लेकिन यहाँ नीयत नाटक की थी और वहाँ नाटक एक ज़रिया बन गया था।

ऐसी ही जीवंत प्रकृति के बीच बडी खुशी से रहते हैं एक नाना (मशहूर कलाकार के.के. रैना) और उनकी नातिन (मशहूर कलाकार इला अरुण की बिटिया इशिता अरुण)। क्या ही उन्मुक्त प्राकृतिक परिवेश है- थीम का भी और मंच पर लगे सेट का भी। उसमें उतना ही उन्मुक्त नाना-नातिन का हँसता-खेलता जीवन। पर इस सहज पर्यावरण में युवा पीढी के लिए प्रलोभन बनकर आती है शहर से भौतिक समृद्धि की दूषित हवा, जो नातिन को उडा ले जाती है शहर। नाना बेबस देखता रहता है, पर चूँकि यह नाटक है, नातिन लौटकर आती है; क्योंकि शहर का नितांत भौतिक पर्यावरण उसे रास नहीं आता। अपना नैसर्गिक पर्यावरण उसे लुभाता है- ‘हंस-सुता की सुन्दर कगरी अरु मधुबन की छाहीं’ की तरह। और अंत में बुला ही लेता है। लेकिन वास्तविक जीवन में ऐसा कहाँ हो पाता है? कोई नहीं लौटता- ‘जो जो गये बहुरि नहिं आये, पठवत नाहिं सँदेस’। इसीलिए तो लौटने की बात करते हैं ये कलारूप- उस खोते जाते जीवन-रूपों का स्मरण दिलाने के लिए।

कालिदास (आषाढ का एक दिन) भी तो लौट आया था। उसे भी क्षिप्रा का किनारा, उज्जयिनी का प्रांतर – पहाडियां, वर्षा और मिट्टी - तथा हिरण व मल्लिका की आँखें भुलाये नहीं भूलीं। बुलाती रहीं। और राजधानी की गन्दी-स्वार्थी राजनीति - बतर्ज़ ‘यह मथुरा काजर की कोठरि’- बहुत सालती रही। पर आकर भी रह नहीं पाया। क्योंकि प्रांतर तो नहीं, मल्लिका की आँखों को मज़बूरन किसी और की तरफ़ झुकना पडा था और कालिदास के मन में प्रांतर से अधिक गहरे धँसी थीं मल्लिका की आँखें। तब साहित्य का एक और आयाम खुलता है कि साहित्य के केन्द्र में है मनुष्य और उसके सम्बन्ध। शेष सब उसका माध्यम होता है। अत: पर्यावरण को केन्द्र में रखकर नाटकों की तलाश उलटा रास्ता है। मनुष्य से कटकर साहित्य में पर्यावरण नहीं आ सकता – अन्य विषयों में भले आये। इसी द्व्न्द्व में ‘ज़हरीली गैस’ बिगडा। इसलिए भी सबकुछ को बनाने-बिगाडने वाला होता है मनुष्य। पर्यावरण को पहले बनाता था मनुष्य ही - प्रकृति तो पूरक भर थी। और अब नष्ट भी कर रहा है वही – प्रकृति को नष्ट करके भी और उससे अधिक प्रकृति से इतर माहौल को भी। तो नाटक उसका होता है - होना चाहिए भी उसी का। एक उदाहरण दूँ...?

विख्यात रंगकर्मी दिनेश ठाकुर ने खेला- ‘जिया जाये ना’ – नील साइमन के ‘प्रिज़्नर ऑफ़ सेकोना एवेन्यू’ का हिन्दी रूपांतर। उस मूल का शहर न्यूयार्क या कुछ रहा होगा, लेकिन ‘जिया जाये ना’ तो मुम्बई नगरिया का सच है, जहाँ मनुष्य ने माहौल की ऐसी बर्बादी की है कि पाँचवीं मंजिल तक भरता कचरा भरा है। किसी भी समय बिजली-पानी का कट है। नीचे कुत्तों का शोर है। बगल में वेश्यावृत्ति का धन्धा है। कभी भी नौकरी जाने का डर है...। ऐसे में अच्छा-भला आदमी पागल हो जाता है। क्या यह पर्यावरण-प्रदूषण नहीं है? लेकिन आज के ‘पर्यावरण’ की अवधारणा में यह नहीं आता, क्योंकि इसमें पेड-पौधे, फूल-पत्तों वाला जंगल नहीं है। यह तो आदमी का जंगल है और वह आज के ‘पर्यावरण’ की ज़द से बाहर है।

पहले जब पर्यावरण नहीं, वातावरण हुआ करता था, तो उसमें यह सब समाहित था। तब साहित्य में ‘देश-काल या वातावरण’ नाम से सबको पढा जाता था। लेकिन अब विशेषीकरण (स्पेशलाइज़ेशन) का ज़माना है। साहित्य में अब ‘देशकाल एवं वातावरण’ के बदले अच्छा शब्द आया है- परिवेश। इसमें भी सब समाहित है। प्रकृति का अलग से विवेचन भी होता था-‘छायावाद में प्रकृति-चित्रण’। और तब सारे प्वाइंट तो जीवन व शास्त्रानुसार होते थे, बस एक होता था- ‘स्वतंत्र रूप में प्रकृति’, जो आज कुछ तकनीकी जोड के साथ पर्यावरण हो गया है। लेकिन व्यापक स्तर पर सामाजिकता के समावेश के चलते स्वतंत्र रूप में प्रकृति का चित्रण अब साहित्य में कम हो गया है। परिवेश का मामला बहुत व्यापक हो गया है। कथा-चरित्र-भाषा... सब परिवेश से संचालित होने लगा है। और ‘जिया जाये ना’ इसी परिवेश का नाटक है।

सभी नाटक क्या, सारा साहित्य इसी परिवेश की मार का सृजन है। सचमुच जिन्दगी के प्रदूषण का यही कारक और कारण है। इसी रूप में वह साहित्य का श्रेय-प्रेय बनता है। वरना विज्ञान, समाज-विज्ञान जैसी ज्ञान-शाख़ाओं की तरह निखालिस पर्यावरण आ जाये. तो साहित्य स्थूल हो जायेगा। साहित्य के अंतर्गत इस सच को समझना होगा। वरना कान लिए जाते कौए के पीछे भागने जैसा मामला बन रहा है...। आइए, इस बातचीत के अंतिम पडाव पर एक विरल व अभिनव रूप में प्रकृति के कारकत्त्व की चर्चा करें। मैं आपको शंकर शेष के ‘अरे मायावी सरोवर’ में ले चलता हूँ...। अपने स्त्री-जनित दायित्त्वों व नारी-प्रकृति की माँगों के चलते राजा के सभी आमोद-प्रमोद में रानी शरीक नहीं हो पाती। राजा इस बात को समझ ही नहीं पाता और रानी की पसन्द पर तान कसता है। और एक दिन ज्ंगल में सुदूर पहुँचकर एक मनोरम तालाब में स्नान करते ही वह स्त्री हो जाता है। यही मायावी सरोवर की माया है। तब वह भी रानी की तरह बहुतेरे आमोद-प्रमोद से दूर रहते हुए स्त्रियोचित जीवन जीने लगता है- याने रानी के सच को समझ पाता है। है न यह सारा मामला पर्यावरण का ?

लेकिन मकसद पर्यावरण की ताकत बताना नहीं है। इतना भर कहना है कि स्त्री-जीवन को समझने के लिए स्त्री होना पडेगा- नारी विमर्श के रहबर मुलाहिज़ा फ़रमायें – क्या वे इसे नारी-विमर्श का नाटक मानेंगे? यह तो न नारी द्वारा लिखा गया है, न नारी इसके केन्द्र में है।

क्या पर्यावरण है केन्द्र में?

तो मित्रो, इन सबका उचित सन्धान व समझ ही साहित्य व जीवन का नियामक होगा।

यदि पर्यावरण पर मैं आपकी अपेक्षाओं जैसी बात न कर सका होऊँ, तो क्षमा कर दीजिएगा और धन्यवाद तो स्वीकार कर ही लीजिए कि आपने एक और कोण से नाटकों को देखने का अवसर दिया। --------------------------------------------------------------------------

सम्पर्क- ‘मातरम’, 26-गोकुल नगर, कंचनपुर, डी.एल.डब्ल्यू., वाराणसी-221004/ मोबा.094535519830/

satyadev tripathi: Preview "अरबिन्द के आलोक में जीवन का उद्देश्य..."

satyadev tripathi: Preview "अरबिन्द के आलोक में जीवन का उद्देश्य..."

Thursday, 22 April 2010

किसके लिए जीते हैं...

मेरी बडी बिटिया जब नन्हीं-सी थी, कोई भी सामान लाते, तो छोटी बहन व भाइयों को दे देती थी। हम कहीं जाते, तो उन दोनो को एक मिनट भी न छोडती - माँ जैसी ‘केयर’ करती। आज वो बडे पद पर काम करती है। आठ-नौ लाख का सालाना पैकेज पाती है। 10-12 लाख का पैकेज दामाद पाता है। पिछले दिनो वह गर्भ से थी। मैंने पूछा था- ‘छुट्टी कब से ले रही हो’ ? ‘वही दो-ढाई महीने पहले से’ ... उसने कहा था। सारी योजना सही बनी है, का विश्वास था ही। जब दो-ढाई महीने रह गये, तो पूछने पर बताया - सोचती हूँ, इधर ज्यादा काम कर लूँ, ताकि बाद में बच्चे के साथ ज्यादा रह सकूँ...। मुझे तब और अच्छा लगा था…। लेकिन यह क्या... वो तो काम करती ही गयी। मेरे पूछने पर बता देती – ‘सब ठीक तो है। डॉक्टर भी ऑफिस जाने में कुछ हर्ज नहीं बता रहे है’। जब प्रसूति को चन्द दिन ही रह गये और वह ऑफिस जाती... मैं पूरे दिन बेहद परेशान रहता। कैसे-कैसे ख्याल मन में आते...कभी फोन या एसएमएस करके हालचाल लेते रहता, पर क्या कहता इतने पढे-लिखे-कमाते बच्चों से ! फिर, कोई विचार भी तो नहीं होता अपने पास - सिवाय आशंका, चिंता के...। अन्त में जिस शुक्रवार को आखिरी दिन काम करके वह आयी - शनि-रवि-सोम को छुट्टी थी। और मंगल को मैं एक सुन्दर से नाती का नाना बन गया। उस खुशी में भूल ही गया और जब बाद में याद आया, तो फूले न समाया कि बिटिया ने एक भी दिन छुट्टी नहीं ली...। नर्सिंग होम से घर आने पर खुशियों का मौसम था...। ऐसी बहार पहली बार घर में थी... समझ में आया कि बेटे-बेटी से ज्यादा खुशी पोते-नाती के पैदा होने पर होती है। मैं कुछ अतिरिक्त ही खुशी में रहा होऊंगा, जब उस दिन संयोग से सभी बच्चे जुटे थे और मैंने पूछा था - बेटा, अब क्या प्रोग्रैम है आगे का …? बिटिया ने बताया - ‘मैं तो रेस्ट करूंगी छुट्टी भर - कोई पाँच महीने...। पर प्रभु को दो ऑफ़र हैं - एक तो यू.एस. का है और दूसरा बंगलोर का...। देखो, कौन सा ज्वाइन करता है...’। ‘तो यह बाहर रहेगा ? तुम बच्चे को लेकर अकेली रहोगी’? आश्चर्य छिप न सका होगा मेरा ! तभी उसने आगे कहा ...‘पॉप, इसमें इतना क्यों सरप्राइज़ लग रहा है आप को ? क्या मैं नहीं सँभाल सकती...! उसे जाना तो होगा ही... इतना अच्छा मौका इतनी जल्दी नहीं मिलता...’। फिर शायद मेरे चेहरे पर उदासी आ गयी हो, जिसे भाँपकर ही जैसे सांत्वना देती हुई बोली - ‘ज्यादा करके बंगलोर ही ज्वाइन करेगा और बीच-बीच में आ जाया करेगा...’। इस योजना में कोई ‘बदलाव नहीं होगा’, को जानते तथा ‘नहीं होना चाहिए’, को किसी हद तक मानते हुए भी मेरे मुँह से जाने कैसे निकल गया -“बेटा, ऑफ़र तो शायद फिर मिल जाये, पर यह बच्चा फिर नहीं होगा - दो महीने का , चार, छह, आठ व दस महीनों का...। क्या इसे लेकर तुम लोगों का मन उस तरह नहीं होता, जैसे तुम लोगों को लेकर हमारा हुआ करता था - कि उसके हर भाव, हर बदलाव, हर विकास, हर हुलास... को देखें, सँजोयें...अपनी निधि बना लें...” ....‘पॉप, आप भी क्या...मैं हूँ ना...’ - बीच में ही बोल पडी बिटिया - ‘लाइव कैमरा ले लेंगे... रोज़-रोज़ के फ़ोटोज़ मेल करते रहेंगे... अब वो ज़माना थोडे न रहा पॉप कि सामने रहने...’ और भी बहुत कुछ कहती रही वह - बडी शालीनता से, बडी समझदारी से.... चाहता तो था कि कुछ कहूँ - समझाऊँ – “दोनो मिलकर डेढ-पौने दो लाख महीने का कमा ही रहे हो...। क्या कम है तीन प्राणियों के लिए...! अब इस ऑफर से दो-ढाई लाख कमाने लगोगे...फिर अगला ऑफर आयेगा... फिर आयेगा... आता ही रहेगा...। फिर जीयोगे कब...? पर हिम्मत न पडी सब कहने की...। उसके ‘पॉप’ का बोध सर पे तारी हो रहा था...। सो, बुदबुदाहट यूँ निकली -‘किसके लिए जीते हैं, किसके लिए ‘खपते’ हैं.... बारहा ऐसे सवालात पे रोना आया..’। ...और इसे सुननेवाला भी मैं अकेला ही रहा.... ....क्योंकि तब तक मौका पाकर बिटिया भी खिसक चुकी थी...बाकी सब तो पहले ही कमरे से निकल चले थे...। --- --- ---

Saturday, 18 July 2009

लोकगीतों की प्रासंगिकता

लोकगीतों की प्रासंगिकता लोकजीवन ही प्रासंगिक न रहा, तो लोकगीत कैसे हों...? -सत्यदेव त्रिपाठी लोकगीतों की प्रासंगिकता की बात करना ऐसा लगता है, गोया दादाजी से घर में रहने की उपयोगिता पूछी जा रही हो और स्थिति की विडम्बना यह है कि दादाजी को बतानी पड रही है...। क्योंकि जिस गाँव में दादाजी जनमे-जीये, वह गाँव उनका अंत समय आते-आते बदल गया है। अब लोक का वह सम्भार जाता रहा है, जिससे लोक गीत-संगीत जनमता-विकसता था। हर दिल-अज़ीज़ बनता था। मसलन... ...मशीनी खेती ने श्रमगीतों को खत्म कर दिया है। ट्रैक्ट्रर की घड्घड में भला हलवाहे व गाडीवान के गीत कैसे गाये-सुने जा सकते हैं? चक्की ने जाँता खत्म कर दिया, ‘जँतसार’ के गीत जाते रहे ... आदि-आदि? ...ऋतु गीत में पहले की तरह न महीनों कजरी गायी जाती, न फाग। न महीनों झूले पडते, न पूरे महीने जोगीडा चलता। याने अब इनके ही प्रति वह उछाह नहीं रहा, तो इन अवसरों के लिए बने लोकगीतों के लिए क्या होगा? बस, नागपंचमी-होली की रस्म-अदाई हो जाती है। ...भक्ति के सामूहिक आयोजन भी अब उस तरह से पूरे गाँव के एक ही साथ नहीं होते। सो‘पचरा’आदि जैसे पारम्परिक गीत भी बहुत कम हो गये हैं। इतने कम कि आज बढती पीढी को ये चीजें उस तरह मालूम भी नहीं हो पा रही हैं कि वे मौका आने पर कुछ सुन-सुना तो क्या, बता भी सकें... ...कुछ अवशेष बचे हैं संस्कार-गीतों के, पर उनमें भी भयंकर ह्रास आया है- भोर जगाने, जनेऊ यज्ञ जैसे अवसरों के गीत किसी को याद नहीं रहे। कुछ बूढियां जिस दिन नहीं होंगी, परिछन, ब्याह, गवना के गीत भी लुप्त हो जायेंगे। सोहर कुछ् दिन शायद बचे रहें...पर किस रूप में...!!1 ...‘गारी’ जैसे खुले रूप को तथाकथित सभ्य समाज ने फूहड व अश्लील करार देकर लगभग बन्द कर दिया है। वरना जो खुलापन रहता था उनमें, वह कई तरह से लाभदायक होता था। ब्याह बैठते ही ‘लाजि के मारे लजाधुरि जे पिय के अगवौं नहिं घूँघट खोलइ’ वाली नवेलियों व बूढी दादियों तथा प्रौढा माँओं के‘दुलहा हौ छिनारि के जनमल, अगुआ हौ ललगँडुआ रे’ जैसे गीत कई-कई तरह से रोमांचित कर जाते थे...। ... उक्त सब के सब टीवी और उस पर आती फिल्मों के सौजन्य से इल्मी-फिल्मी हो चुके हैं...। इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राम स्वरूप चतुर्वेदी ने बीस साल पहले ही लिख दिया – ‘दूरदर्शन आधुनिक युग का लोक माध्यम है’। लेकिन यथार्थ को सीधे कहा है अशोक वाजपेयी ने - ‘एक समय था, जब लोकगीत-संगीत से बम्बइया फिल्में धुनें और भाषा उधार लेते थे। अब बारी पलट गयी है। अब फिल्मी धुनें लोकसंगीत को प्रभावित कर रही हैं’। शायद वे कहने में चूक गये या कंजूसी कर गये। हक़ीकत यह है कि सभी रूपों में पूरे के पूरे गीत ही फिल्म के प्रयुक्त हो रहे हैं – ‘पइसा दे दो, जूता ले लो’ जैसे गीतों के लिए तो शादी में स्थिति (सिचुएशन) भी बनायी जाती है। सो ऐसे में 20-30% ही कुछ खाँटी लोकगीत आदि बचे रह गये हैं – वही रस्म-अदाई के तौर पर...। वरना सारे गाँव गन्दी राजनीति व गुटबन्दी, झगडों, मुकदमेबाजियों व लूट-खसोट के अखाडे बन गये हैं। कितना कमा लें, कैसे कमा लें; के अलावा कोई बात नहीं होती। बाबा की बात साकार हो उठी है–‘मातु-पिता बालकन्ह बोलावहिं ; उदर भरइ, सोइ करम सिखावहिं’। इस तरह लोकगीत-संगीत तो क्या, सब कुछ छूट चुका है – ‘भूल गयी सान-सउख, भूलि गयी चौकडी ; तीनि चीज़ याद रही- नून, तेल, लकडी’। इसी की परवान चढ गये हैं – सारे लोकगीत-संगीत...सारी लोक-संस्कृति। यह 20-30% भी कब तक बचे रहेगा, कहना मुश्किल है। आजकल कुछ सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थान इन गीतों को सुरक्षित करने के प्रयत्न में लगे हैं – करोडों के वारे-न्यारे हो रहे हैं, पर सीधी सी बात कोई नहीं समझता कि घर-आगनों, गली-चौबारों से मुहल्लों-गाँवों को गुलज़ार करने वाले ये गीत वातानुकूलित भाण्डारों में दस्तावेज़ की तरह रखे जाकर किस काम के रह जायेंगे? इनकी इससे बडी अप्रासंगिकता और क्या होगी? तो सक्षेप में ये हैं गावों के हालात और उनमें लोकगीत की दशा व दिशा, जिनमें गीत ही लुप्त होते जा रहे हैं, तो उनकी प्रासंगिकता की बात ही क्या? बाँस ही नहीं, तो बाँसुरी की बात क्या...? और अब ज़रा गाँव से अलग हटकर हालात का एक जायज़ा लें, जिसमें लोकगीतों की स्थिति व गति बन-बिगड रही है... आज हम ग्लोबल हो गये हैं। उत्तर आधुनिक हो गये हैं। बाज़ार के युग में जी रहे हैं। भौतिक सुख जीवन का परम लक्ष्य हो गया है। सारी प्रगति और सभ्यता के केन्द्र शहर हो गये हैं। ‘गोदान’ के मेहता-मालती... आदि की तरह हम गाँव में पिकनिक के लिए जाते हैं- छुट्टियों के कुछ दिन बिताने या फिर प्रोजेक्ट आदि...के लिए। इस विलोमी बदलाव से लोकगीत ही नहीं, समूची लोक समृद्धि पर ही प्रश्नचिह्न लग गया है। मसलन... ...मैग्डोनल व चाइनीज़ के सामने दाल-भात-रोटी-भाजी को बतानी पड रही है अपनी प्रासंगिकता और बेरहिन-बख़ीर, ठोक्वा-गुलगुला, दोहथी-हथुई तो अप्रासंगिक ही क्या, अपना अस्तित्त्व तक खो चुकी हैं। ...बीस साल पहले के कॉंन्वेंटी बच्चों ने सारी पहननेवाली अपनी माँओं से अपेक्षा की थी कि वे जींस-टीशर्ट पहनकर स्कूल से उन्हें लेने आयें। वे बच्चे अब जवान हो गये हैं और माँ के साथ दो पल बिताने के बदले क्लब-होटेल-सिनेमाघरों में जाना पसन्द करते हैं। फिर वे लोकगीत कहाँ सुनेंगे? ...अपनी लोकभाषा पढने, उसमें लिखने का अभ्यास तो हमारा ही नहीं रहा। महानगरों में प्रशासनिक कार्यों के लिए हिन्दी के मुकाबले अंग्रेजी ही सरल लगने लगी है – ‘सविनय निवेदन है कि...’ को भूलकर ‘आई बेग टु स्टेट दैट...’लिखना आसान हो गया है। तो ऐसे में लोकभाषा की अपेक्षा उस बच्चे से करना बेमानी है, जिसे लाखों के पैकेज की कमाई (तथा फिर उसी बुनियाद पर लाखों के दहेज) पाने के लिए लोकजीवन को छुडाकर ये राहें हमने ही पकडाई हैं...। नतीजा यह है कि हमें तो बचपन में मिले उस जीवन के कारण लोकभाषा बोलने-बतियाने, उसमें गाने-बजाने कमोबेश आता है – कम से कम सुनकर प्रसन्न होने लायक तो हैं ही हम। यह दाय अपनी नयी पीढी को नहीं दिया हमने। सो, आने वाले समय में उन्हें अपनी लोकभाषा ही नहीं आयेगी, तो गीत-संगीत भला कैसे आयेगा? हम अंतर्मुख होकर सोचें और अपने आप को ही बतायें कि हमारे जीवन में लोकगीत-संगीत कितना है ! कितने लोकगीत की कितनी पंक्तियां हमें याद हैं? चलिये, कितनी काव्य-पंक्तियां याद हैं, जो हम चलते-फिरते अपने बच्चे को सुना-सिखा सकते हैं? बडे-बडे नेताओं, मंच-वक्ताओं को वही की वही पंक्तियां ही हर मौके पर सुनाते हुए यूँ सुना जा सकता है कि श्रोता पहले ही भुनक पडता है– अब फला पंक्ति सुनायेगा। याने लोकसाहित्य क्या, साहित्य ही नहीं रहा जीवन में, तो अप्रासंगिक होगा ही...। इन्हीं कारणों से लोकगीत गाने वाले दिन-पर-दिन कम होते जा रहे हैं। वरना मुम्बई में एक ही गायिका को हम हर साल वही-वही, वैसे-वैसे ही गाते हुए क्यों सुनते? यूँ लोकगीत का स्वभाव यही रहा कि एक गीत को हर साल गाते हुए कई-कई पीढियां गुजर जाती थीं, पर गाते-सुनते लोग अघाते न थे...। लेकिन तब कार्यक्रम पूर्व-नियोजित या प्रायोजित न होते थे। आज ऐसा होने में हम शिक्षित प्रमोटरों का अज्ञान व आलस्य भी है, जो नयों को जान-खोज नहीं पाता। और हमारे आयोजन जिस तरह के शिष्ट व अभिजात होते हैं, वे स्वयं ही उस सहजता व अनगढता के विरोधी हैं, जो लोकगीतों की बुनियादी प्रवृत्ति है। इसीलिए वे खाँटी गायक ऐसे आयोजनों में नहीं आ पाते, जो असली लोकगायक हैं व जिनसे लोकगीत बनता है – याने ‘दुकानदार तो मेले में लुट गये यारो, तमाशबीन दुकानें लगाके बैठ गये’। और असली लोकगायकों को लूटने वाले ये गायक लोकप्रिय ज़रूर हैं, पर उन्हें लुटवाने वाले तो हम अभिजात आयोजक ही हैं, जो एक-दो नहीं हैं – ‘कहाँ तक नाम गिनवायें सभी ने ‘इनको’ लूटा है...’। लोकगीत गाने वाले हमारे गायक प्राय: कवि हुआ करते थे। वे समय की समस्याओं के गीत लिखा करते थे। उन पर गम्भीर व बेबाक टिप्पणी किया करते थे। आजादी की लडाई के समय जाँते को सम्बोधित करके लिखा गीत तो मशहूर है ही- ‘सुराज धुन गावा हे मोर जाँता’...! लाल रंग गोहुँआ, सफेद रंग पिसना कपट दिल खोला, ए मोर जाँता... लेकिन आज़ादी के बाद जो नज़ारा हमारे अपनों ने दिखाया, जिसे साहित्य में ‘मोहभंग’ के नाम से जाना गया, उसकी सीधी, धारदार; पर उतनी ही लयात्मक अभिव्यक्ति किसी लोकगायक ने ‘कांगरेसिया बिदेसिया समान सजनी’ गाकर की और लोकगीत प्रासंगिक तो क्या, प्रहारक बन गया। यही असली तत्त्व है प्रासंगिकता का, जो तब था... पर अब आ नहीं आ रहा है। गायब हो चुका है लोकगीतों से। आज के सरोकारों वाले लोकगीत इधर लिखे ही नहीं जा रहे हैं। यही सबसे प्रमुख कारण है, लोकगीतों की प्रासंगिकता के कम होने का। आज का युग सब कुछ को उपयोगिता की कसौटी पर कसता है। इसे समझ व अपना कर ही कुछ भी प्रासंगिक हो सकता है आज। सो, जीवन में आज जो बदलाव आ रहे हैं – जिनका एक ट्रेलर-सा इस लेख की शुरुआत में ही दिखाया गया, उन पर गीत लिखे जाकर ही लोकगीतों को प्रासंगिक बनाया जा सकता है। इनके अभाव के नजीतन ये लोकप्रिय गायक पुराने लोकगीत गाये जा रहे हैं, जिनका आज के जीवन से कोई ख़ास सरोकार ही नहीं रहा। गीतों के आउट ऑफ़ डेट होने का एक उदाहरण दें? एक हिट कजरी गीत है – ‘पिया मेंहदी लिया दा मोतीझील से, जाके सायकील से ना...’। अब देखिये कि इसके जीवनगत सरोकार क्या हैं ... मेंहदी के लिए नीलीझील की क्या पहचान है, हमें भी नहीं मालूम। ये लोकल पहचानें हैं। तब गायन लोकल लेवेल पर हुआ करता था। हर अंचल के अपने लोकगीत होते थे। वहाँ वे गाये जाते थे। धुनों और भावों की समानता में उनका राष्ट्रीय स्वरूप आपोआप बनता था, जिसे अनेकता में एकता कहा जाता है। अब लोकगीतों की राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुतियां होने लगी हैं, तो व्यापक पहचानों वाले गीत लिखे जाने चाहिए, जिससे वे सबकी समझ में आयें, सबको आनन्द दें...। दूसरी बात यह कि अब कौन प्रियतम है, जो सायकल से जाकर अपना अपमान करायेगा ? वह कार नहीं, तो बाइक से जरूर जायेगा... कुछ नहीं तो स्कूटर तो होगा ही, पर सायकल तो कतई नहीं...। लेकिन तीसरी व सबसे मार्के की बात यह कि आज की नायिका मेंहदी लगाने के लिए पिया से कहने क्यों जायेगी? ब्यूटी पॉर्लर नहीं चली जायेगी? मेंहदी वाली को अपने घर नहीं बुला लेगी? और इसके आगे के जमाने की बात यह कि पता नहीं वह किसके लिए मेंहदी लगाना या पॉरलर जाना चाह रही होगी- नौकरी पर जाने के लिए, इंटर्व्यू देने के लिए या मीडिया के लिए ऑडीशन देने के लिए?...आदि । तो फिर पिया से क्यों कहेगी? या मुआफ़ किया जाये, तो एक विकल्प और कहूँ - पिया के अलावा अपने किसी प्रेमी के लिए पॉर्लर जा रही हो, तो... ? जी हाँ, इस उत्तर आधुनिक ग्लोबल समाज ने हमें यह दिया है। जब पुरुष बाहर निकलता था, उसके विवाहेतर सम्बन्ध बनते थे। उसकी परिणीता प्रेयसी घर में बैठी इंतज़ार करती थी। इससे बिरह के ढेरों लोकगीत बनते थे...।‘बिरहा’जैसा गायन इसी बिरह से ही निकला था, जो आगे चलकर विविधरूपी विकास कर सका। पूरा समाज रस ले-लेकर उसका गान-पान करता था। एक बानग़ी देखें, जो इधर बहुत लोकप्रिय हुआ है... रेलिया बैरन पिया के लिये जाय रे...’। फिर वो अपने पिया को ले जाने वाले गाडी, टिकट, बुकिंग क्लर्क तथा उस शहर तक के नष्ट हो जाने की कामना करती है, जहाँ वह रहेगा...। और सबके अंत में – ‘जवने सवतिया पे पिया मोर आसिक, बिजुरी गिरइ सवति मरि जाय रे...रेलिया बैरनि...’ याने मानी हुई बात थी कि वो किसी के इश्क़ में पडेगा। उत्तरप्रदेश-बिहार वालों का कलकत्ता जाना प्राय: होता था – छ-छह पैसा, चल कलकत्ता...। वहाँ एक परदेसी यदि बस गया, तो साल भर न आने वाले हर परदेसी को जादूगरनी बंगालिनों ने भेंडा बनाकर रख लिया है... जैसी तमाम भ्रांतियों पर लोकगीतों के ख़ज़ानें भरे हैं। लेकिन जैसे बिजली आ जाने के बाद कविताओं में शर्मीली नायिकाओं के हाथ दीपक बुझाने से जलने बन्द हो गये, ये सब बन्द हो जाने चाहिए। अब विज्ञान के आने के बाद न भेंडा बनने का भ्रम रह गया, और शहरीकरण, यातायात व स्त्री-शिक्षा से न बिरह की वैसी स्थिति रह गयी...। आज जब स्त्रियां भी बाहर की जिन्दगी में उतनी ही सक्रिय हैं, अब पुरुष के लिए भी बिरह की स्थिति आयी है। कभी राम को बिरह में रोते-बिलखते तुलसी ने दिखाया था। आज की हमारी फिल्मों ने इन मर्मों को समझा-अपनाया है- बेशक़ व्यवसाय के चलते ही, लेकिन हमारे लोकगीतों में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो। याने वे अपडेट नहीं हो रहे हैं। परंतु यह सब तो रुकने वाला नहीं है। और बढेगा। फिल्मों के साथ कमोबेश साहित्य ने भी स्वीकार लिया है। लोकगीतों को भी ऐसा करके ही मुख्य धारा में लाया जा सकता है, जिसके प्रति कोई सजग नहीं। कहने का लुब्बो-लुबाब यह कि ऐसे-ऐसे नये विकास जीवन में आ गये हैं, जिन पर गीत आने चाहिए। लोकगीतों को आधुनिक जीवन की तब्दीलियों, जटिलताओं से रू-ब-रू होना होगा। इन्हें समोना होगा। जो लोग लिख रहे हैं, उन्हें इन जटिल जीवन-वास्तवों को गीतों में ढालना होगा, जिससे नयी पीढी के नौनिहाल निहाल हों...। वरना उन पुरानी पिटी-पिटायी थीम पर लिखे गीत आज के नये समाज द्वारा स्वीकारे न जा सकेंगे। वे सीडीज़ में ही बन्द होकर रह जायेंगे...। हमारा लोकगायक आशु कवि भी हुआ करता था। गाते हुए जो कुछ वहाँ चल रहा होता था या देश में जो हिट-हॉट घटित हुआ रहता था, उसे भी अपने उसी गीत में मिलाकर उसी शैली में उसी सुन्दरता से रचता जाता था - ‘इम्प्रोवाइजेशन’जैसा। लेकिन आज के लोकप्रिय गायक महज फ़ूहड हाव-भाव व सस्ते संवादों के ठेकों, जिसमें आयोजक की चापलूसी सबसे ‘चीप’सिद्ध होती है, के अलावा कुछ नहीं कर सकते। और संपर्कों (पब्लिक रिलेशनशिप) का सिला ही है कि ऐसे गायकों के गीतों को ही हम असली लोकगीत समझ बैठने को विवश हो गये हैं। यदि वस्तु के स्तर पर उक्त किस्म के बदलाव हों, तो जो धुन, लय, सुर, टेक, राग, ...आदि हैं, वे प्रासंगिक तो क्या, कालजयी महत्त्व के हैं। मतलब न जानने के बावजूद लोग थिरक उठते हैं। गुजरात, महाराष्ट्र, म,प्र. व राजस्थान के लोग जुटे थे। हम महाराष्ट्र की ओर से गये थे। और हमारा साथी बी.एम. सिंह जब गायन के अवसर पर पिहिक के उठाया था – ‘ छलकल गगरिया मोर निरमोहिया, छलकल गगरिया मोर.. महुआ के कुचवा मदन रस टपके, बहे पुरवइयाझकझोर निरमोहिया कि छलकल गगरिया मोओओ...र... तो गुजरात के सोनी सर इतना चहक उठे कि दौडकर मंच पर रखी ढोलक का ताल मिलाने लगे और न मिला पाने पर मंच पे ही चित्र-लिखित जैसे खडे रह गये थे... ऐसा असर होता है। हिरणी वाला प्रसिद्ध गीत किसी भी युग, भाषा... आदि का मोहताज नहीं...। और ऐसे बहुतेरे हैं। यही लोक्गीतों की प्रकृति है, शक्ति है, जो रहेगी...। युगीन बदलावों की अनिवार्य चर्चा यहाँ न होती, तो इसी सब पक्ष को विस्तार से बताकर प्रासंगिकता की इतिश्री की जा सकती थी। और बिरह, मिलन, प्रतीक्षा, इसरार, इनकार, मान-मनौवल..आदि भावों की सनातनता के आधार पर प्रासंगिकता क्या, इनके अमरत्व की गैरंटी दी जा सकती थी...। और कहना होगा कि यह है भी। लोकगीत अपने इन्हीं गुणों से अमर हैं और रहेंगे...। इनमें इतना अपनापा भरा होता है कि ये सहज ही हमारे गहन क्षणों के साथी बन जाते हैं। हमारे लोकगीतों में संस्कार व संस्कृति तो होती ही है ; एक आदर्श, एक मूल्य भी निहित होता है, जो बताया-कहा नहीं जाता। पूरे विधान में रच-बसा होता है। उसमें एक सहजता-सरलता व निष्कलुषता होती है, जो मोहती है। तभी तो महाराष्ट्र की कीर्त्तन शैली से बना ‘घाशीराम कोतवाल’ का आलोक विदेशों में भी सराहा गया। छत्तीसगढी के लोक में अभी-अभी दिवंगत हबीब साहेब का ‘चरनदास चोर’ व ‘मिट्टी की गाडी’ भी पाश्चात्य देशों में सबके सिरमौर बने। याने कि बहुत कुछ है, जो कहा जा सकता है। लेकिन यह सब कहा गया है। कहा जाता है। बार-बार, बारम्बार। हम इतिहास का गान करते जा रहे हैं और स्थितियां दिन-ब-दिन बिगडती जा रही हैं। इसलिए कहना तो पडेगा। अब समय आ गया है कि ये सचाइयाँ कही जायें। गुडी-गुडी से काम चलने वाला नहीं। इनमें सुधार व बदलाव की मह्ती आवश्यकता है। सरकार के पास योजनाएँ हैं। संसाधन हैं। सच्चे लोक कलाकारों को हबीब साहब की तरह गावों से उठाकर लाना होगा, उनके सारे नखरे उठाने होंगे। कार्यशाला आदि माध्यमों से उनसे वो चीज़ें निकलवानी होंगी, जो रह जाती हैं। नयी चीजें लिखवानी होंगी, ताकि वो सम्भार लोकगीतों में भी आये, जो जीवन में आ चुका है। फिर उनका ऐसा प्रदर्शन कराना होगा कि नयी पीढी को भी उसमें रुचि जागे। सुरक्षित-आरक्षित के बदले लोक की चीज को लोक तक पहुँचाना होगा। लोकगीत को लोकमय बनाना होगा, तब प्रासंगिकता बतानी नहीं होगी, वह स्वत: सिद्ध होगी...। ** ** ** सम्पर्क- “नीलकण्ठ”, एन, एस. रोड नं.- 5, विलेपार्ले- पश्चिम, मुम्बई- 400056 फोन- 022-26101987/ 26163215. मो. 09869355103 ई मेल- satyadevtripathi@gmail.com --------------------------------------------------

गडे मुर्दे क्यों उखाडे जायें ‘बालिका वधू’ में... ??

‘हमारा महानगर’ (17 जुलाई, 09) में ‘बालिका वधू’ पर संसद में उठे सवाल को लेकर अलका आश्लेषाजी का आलेख पढने को मिला। धारावाहिक को अलका जी ने ‘सामाजिक जागृति का सकारात्मक रूप’, ‘बाल-विवाह के विरोध में एक सार्थक कोशिश’ ‘इस कुप्रथा की समस्याओं को सुलझाने’ व ‘दर्शकों को शिक्षित करने के उद्देश्य वाला’...जैसे जितने विशेषण हो सकते हैं, से नवाज डाला है। और कार्यक्रम हम देख रहे हैं। खेद है कि हम ऐसा कुछ भी देख नहीं पा रहे हैं। काश, अलकाजी ने कहीं एकाध उदाहरण दे दिया होता कि यह सब किस घटना, किस चरित्र, या इनके किस परिणाम से हो रहा है, तो हम भी शायद समझ पाते ! हम तो देखते हैं कि इसकी बालिकाबधू व बालकवर (आनन्दी-जगिया) परम प्रसन्न एवं सुखी हैं। जितना मान-सम्मान, स्नेह-दुलार उन्हें सीरियल के परिवार-समाज से मिल रहा है तथा उसी के चलते जितनी लोकप्रियता उन्हें आज मिल रही है, उसे देखकर हर बच्ची-बच्चा यदि बालिका बधू - बालक वर बनने का सपना देखने लगे (और देख रहे हैं), तो क्या बेज़ा है? क्या यह एक मृत हो गयी रूढ व्यवस्था को ग्लैमराइज़ करना नहीं है? कौन-सी जागृति इसमें निहित है। हाँ, जागृति के नाम पर आनन्दी के ससुराल में पढने की शुरुआत करायी गयी, जो कुछ कडियों को हिट करके ग़ायब हो गयी। वैसे बाल-विवाह की बात ही गडे मुर्दे उखाडना है और ‘कलर’ चैनल तो प्राय: सभी में यही कर रहा है। ‘लाडो...’ में लडकी की भ्रूण-हत्या का मामला कमिश्नर तक ले जाने वाली लडकी अब अम्मा के घर में नौकरानी बनकर रह रही है- पता नहीं कौन सी योजना लिये है !! कमिश्नर न जाने कहाँ गया? इतने पढे-लिखे जागरूक लोगों के बीच कोई पुलिस, कोई व्यवस्था नहीं आ पाती और अम्मा की निरंकुश तानाशाही सत्ता चल रही है... ऐसा गाँव भारतवर्ष में कहाँ है? अम्मा की दादागीरी के स्टंट के सामने तो मनमोहन देसाई व प्रकाश मेहरा की फिल्में भी पानी भरें ! तो बालिका वधू की पढाई की बात भी मुर्दे को भूत बनाना ही है। राजस्थान व बिहार में यदि कहीं-कहीं ये प्रथाएं हैं, तो ऐसे सीरियल वहाँ के लोकल चैनल पर दिखाये जायें। पूरे देश में इन मुरदा प्रथाओं को क्यों जल्वागीर किया जाये ? फिर दिखायें, तो ऐसे कि इनके प्रति अरुचि-जुगुप्सा पैदा हो, न कि ऐसा ग्लैमर कि वैसा बनने का रश्क़ होने लगे...? आइये आगे बढें... घर के बडे बेटे बसंत की दूसरी शादी भी घर वालों को पैसे देकर कच्ची उम्र की किशोरी से करा दी – क्रूर-जघन्य यथार्थ दिखा, विरोध भी दर्ज़ हुआ। लगा कि कोई सार्थक पहल होगी...। दस-बीस कडियां उसमें भी जम गयीं। यह ग़ैर कानूनी है, पर इस तरफ़ ख्याल क्यों जाये? बच्चा देकर ऋण उतारकर जाने के निश्चय से रुकी थी। बडा अच्छा लगा था...। पर अब वह अच्छी-ख़ासी ‘बींदनी’ बनकर घर-बार सँभाल रही है। घर के दुख-सुख में हँस-रो रही है। याने ये होता रहे, का ही सन्देश बना न ! तो कौन सा जागृति पैदा हुई और कौन-सी शिक्षा मिली ? बस, उन विरोधों के नाटक में कुछ कडियाँ फिर हिट हो गयीं। असल में यह सारा खेल कडियों को हिट करने का ही है। ऐसे मुद्दों को ‘हुक’ कहते हैं, जिसे खोजना सीरियल-लेखन का बडा गुर है। ये हुक दर्शक को फँसाने के लिए होते हैं। फिर उसे भूल जाना ही इस विधा का अनुशासन (डिसिप्लिन) है। इस हुक के मक़्सद और मर्म को आम दर्शक तो नहीं समझता, पर लेखक-विकारक ? हाँ, इस बींदनी के गर्भ के जिस बच्चे को लेकर इतना हंगामा हुआ, वह गया कहाँ? याने कहानी तक से ‘हुक’ का मतलब नहीं। तीसरा मसला दादी की पोती (सुगनी) का है, जो विधवा समस्या से जुडा है। उसकी दूसरी शादी कराना जरूर एक सकारात्मक बात है, पर वह गाँव कहाँ है भारतवर्ष में कि वह पहले पति से गवने के पहले इतना मिलती है (रोमांस भी भुना लिया !) कि गर्भवती हो जाती है। यदि यह सब पुराना है, तो मोबाइल कहाँ था तब ? और नया है, तो इतना सब कहाँ है? दोनो ही अतिवाद है। इसकी ज़रूरत न सच को थी, न कथा को । फिर विधवा हो जाने पर जो यातनाएं दी जाती हैं, वे तो किसी भी दृष्टि से कतई बर्दाश्त के काबिल नहीं। हमारा समाज आज के लिए इस सफेद झूठ व एकदम ग़ैरज़रूरी यातनाओं को देखता है, वही आश्चर्यजनक है। और अब एक बुद्धिजीवी पत्रकार से इसकी पैरोकारी तो जले पर नमक ही है। लगता है कि कमाऊ मीडिया के कुएं में पडी भाँग का नशा पूरे समुद्र पर तारी है। पूरा घर उस यातना के खिलाफ़ है और एक बूढी माँ सबकुछ किये जा रही है। कहाँ है ऐसी माँ ? और है, तो क्यों है अलकाजी ? वह पुरखों की बनायी व्यवस्था का वास्ता देती रहती है, जो तब भी इतनी क्रूर न थी। इसका सही रूप इतिहास के गवाक्ष से दिखाने वाली ‘राव साहेब’ फिल्म (जयवंत दळ्वी के नाटक ‘बैरिस्टर’ पर आधारित) में देखा जा सकता है। ऐसा सब और-और भी बहुत कुछ है...पर अभी बस इतना ही। अब कुछ विमर्श देखें... सीरियल का आज मतलब कि हर अच्छे-बुरे को इतना बढा-चढा कर दिखाया जाये कि दर्शक गदगद होकर, गलदश्रु होकर, चमत्कृत होकर... याने चाहे जैसे... बस, देखे। उनकी टी.आर.पी. बढे। विज्ञापन मिलें। सब कमायें-खायें। बनाने में तो व्यापारी घुस ही आये हैं मीडिया में, करने वालों को भी मोहजाल में फँसे जमाना हो गया। वरना बालिकाबधू के मुख्य चरित्र एनएसडी के हैं – एक सरोकारपरक संस्थान से प्रशिक्षित । दोनो बेटे तो अपेक्षाकृत नये एनएसडियन हैं, उनसे क्या पूछना, पर आधुनिक हिन्दी रगमंच में अभिनय की वृहत्रयी में शुमार उस जमाने की एनएसडी अभिनेत्री सुरेखा सीकरीजी, जो स्वयं सारी गल्दराजी की शीर्ष् (दादी) बनी मौजूद हैं, से आख़िरी बार पूछने का मन होता है – ‘दाग़ेदिल ग़र नज़र नहीं आता, बू भी क्या चाराग़र नहीं आती...’!! ख़ैर, इनका तो फ़ायदा हो रहा है। तमाम नाटकों के बावजूद इतनी अपार लोकप्रियता सुरेखाजी को कभी नहीं मिली। ‘लाडो...’ की अम्मा बनी मेघना भी एनएसडी की है और फूले न समा रही होगी कि जो मुकाम सुरेखाजी को जीवन के आखिरी पडाव पर मिला, उसे पहले चरण में ही मिल गया। महिमा मीडिया के ज़माने की ! लेकिन अख़बारों में इसकी स्तुति करने वालों को क्या मिल रहा है? मैं नहीं जानता कि सदन मे उस सांसद (शरद यादव – जे.डी.य़ू.) ने क्यों यह सवाल उठाया। क्या राजनीति है इसके पीछे? बकौल अलकाजी इस सीरियल पर और भी कई तरह के संकट आये। विरोध हुए। बन्द करने की कोशिशें हुईं... वो सब उन्हें सुनियोजित साज़िशों के परिणाम लगते हैं। इस अन्दरूनी बात का भी मुझे पता नहीं, लेकिन चाहे जैसे – ग़लती से ही सही, एक सही सवाल उठा तो सही ! अब उस पर कुछ सप्रमाण व तर्कसम्मत न कहकर सदिच्छा या अपनी निहित पसन्द को थोपकर उस सवाल को उलझाने का क्या मतलब है? और यदि सीरियल में से वे बातें निकालकर बतायी जायें, जिससे शिक्षा, सरोकार, सकारात्मक बदलाव... आदि होते हों, तो मैं अवश्य लाभान्वित और उपकृत महसूस करूँगा...। * * * * सम्पर्क- ‘नीलकण्ठ’, एन.एस. रोड नं.-5, विलेपार्ले-पश्चिम, मुम्बई- 400056 फोन- 022-26101987/ 26163215. मो. 09869355103

Saturday, 20 June 2009

हबीब तनवीर को एक श्रद्धांजलि भारतीय रंगकर्म से भारतीयता का जाना ... - सत्यदेव त्रिपाठी - हबीब तनवीर का जाना अनपेक्षित न था, पर 8जून, 2009 को यह ख़बर एक आघात की तरह लगी। मन से उठी ‘हाय’ शब्दों में यूँ निकली – ‘आज भारतीय रंगकर्म से भारतीयता चली गयी...’। जी हाँ, उनके हर नाटक को देखते हुए इस बात का गहरा अहसास होता था कि हम सच्चे अर्थों में एक भारतीय नाटक देख रहे हैं। इसका एक बडा कारण यह है कि हिन्दी के बाकियों में यह अहसास प्राय: नहीं होता या कभी-कभार होता है। मराठी-बँगला आदि में प्राय़: होता है – बहुत कुछ भाषा के कारण भी। किंतु हबीब साहब में हर क्षण महसूस होता है कि ‘ये है भारतीय नाटक...’। वे संस्कृत के क्लासिक (मृच्छकटिकम, मुद्राराक्षस, वेणीसंहार) करें या शेक्सपीयर (मिड समर नाइट ड्रीम- कामदेव का अपना, वसंत ऋतु का सपना) करें, आप को नहीं बताया जाये या आपने वह न पढा हो, तो कतई नहीं जान पायेंगे। क्योंकि हबीब साहब के नाटक शैली-शिल्प, विधान-वितान, भाव-भाषा, तमीज़-अन्दाज़, गीत-संगीत... हर कुछ में याने सर से पाँव तक इस कदर खाँटी भारतीय होते हैं कि भारतीयता को परिभाषित करते हैं। उसे देखकर भारतीयता के निकष निर्धारित किये जा सकते हैं। और हबीब साहब ने यह भारतीय रसायन तब अपनाया, जब इप्टा से लेकर बाल नाट्य, रायपुर-अलीगढ से लेकर मुम्बई-दिल्ली और रेडियो-फिल्म से लेकर राडा (रॉयल अकैडेमी ऑफ़ ड्रैमेटिक आर्ट) के प्रशिक्षण तथा योरप के तमाम स्थलों के थियेटर व कला का अनुभव-अर्जन कर चुके थे। इस सबके बाद हुआ यूँ कि वे रायपुर गये थे अपनों से मिलने-जुलने और वहीं अपने बचपन के स्कूल में ‘नाचा’ की एक प्रस्तुति देखने का मौका मिल गया। विदेश में थियेटर के अनुभव के बाद जब उन्होंने उन कलाकारों की सहज-प्राकृतिक कला देखी और तो इलहाम की तरह पाया कि यही असली रंगमंच है। तय किया कि इन्हीं के साथ अपनी शैली में थियेटर करना है। वहीं से छह कलाकारों को लेकर गये। यह फैसला मामूली न था। पर बात अंतस से निकली थी। ऐसे ही उन्होंने राडा के प्रशिक्षण में भी किया था। जहाँ जाने के लिए सब लोग तरसते हैं, उसे उन्होंने उस प्रतिष्ठित संस्थान व छात्रवृत्ति देने वाले भारतीय दूतावास आदि सबकी नाराज़गी के बावजूद एक साल बाद छोड दिया था। क्यों? उन्हीं के शब्दों में सुनिए – ‘यदि मैं यहाँ और अधिक रुकता हूँ, तो एक अभिनेता के रूप में आडम्बरपूर्ण और अस्वाभाविक हो जाऊँगा। मैं अंग्रेजी में नहीं, वरन अपनी भाषा में अपनी रंग सक्रियता को जारी रखने के लिए वापस जाऊँगा। यहाँ प्रयुक्त होने वाले नियम और सिद्धांत मेरी भाषा में और मेरे देश में काम नहीं आयेंगे’। यही बात ब्रेख़्त को लेकर भी है। ब्रेख़्त इन्हें पसन्द हैं। प्रवास के दौरान उन्हें ख़ास तौर पर समझने गये थे। उनसे प्रभावित हैं। पर वही कि अन्धानुकरण पूर्वक नहीं, ब्रेख़्त को अपने देश-काल की तरह भारतीय मुहावरे में ढालकर लेने के हामी हैं। और ऐसा हुआ भी, वरना एडिनबरा नाट्योत्सव में ‘चरनदासचोर’ देखकर कोई समीक्षक कैसे कहता – ‘लोकनृत्य और गीतों से सजी इस प्रस्तुति में संस्कृत परम्परा और ब्रेख़्त का अद्भुत समन्वय है’। याने भारतीयता का यह जज़्बा शुरू से ही सवार था, जिसने ऐसा फैसला कराया। इस निश्चय के साथ उन्होंने ‘नया थियेटर’ की स्थापना की। और बस, वही खाँटी माटी उनकी पहचान बनी, ख़ासियत बनी। उन्हीं ठेंठ गँवईं कलाकारों के साथ वे आजीवन काम करते रहे। अपनी भाषा को उन्होंने जड से उठाया - हिन्दी नहीं, छत्तीसगढी। सूरदास ने ब्रज भाषा को राष्ट्रीय भाषा बना दिया था और कहना अत्योक्ति न होगी कि हबीब तनवीर ने छत्तीससगढी को रंगमंच की राष्ट्रीय भाषा तो बनाया ही, अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी उसका लोहा मनवाया। जब हिन्दी तक न बोल सकने वाले कलाकारों व एक अंचल की भाषा में बने नाटकों – चरनदासचोर, माटी की गाडी, मिर्ज़ा शोहरत, बहादुर कलारिन आदि...- को लेकर राडा की उसी धरती पर गये, तो जो कह कर राडा को छोडा था, मानो वह सिद्ध ही कर दिखाया। फ़रमाइश कर-करके ‘चरनदास चोर’ के शोज़ वहाँ कराये गये। छठें दशक से शुरू हुए उनके विशुद्ध भारतीय रंगकर्म ने भूमंडलीकरण व बाज़ारवाद के दौर भी देखे और वैसे ही पसन्द किये जाते रहे – बल्कि बढते रहे। और इन नये विकास से लुभाये, इसकी आड में अपनी भारतीयता व अपने लोक को भुलाकर भागने वाले आज के युग को मानो हबीब साहब बता गये हों कि भाई, सही अर्थों में लोकल हुए बिना ग्लोबल नहीं हुआ जा सकता। इसे लोग ‘लोक नाट्यकर्म’ कहते हैं, पर हबीब साहब इसे लोक के आगे का रंगकर्म मानते हैं। हालाँकि इस पॉप्युलर टर्म (लोक) के सामने उनका यह कहना माना नहीं जा सका - चलन में नहीं आया। यह हस्र साहित्य की उसी आँचलिकता वाला ही है, जो आज़ादी मिलने के बाद ‘गाँवों की ओर चलो’ की समझ के साथ आयी थी। वे लोग तो कहते रहे कि इसके दृश्य आँचलिक भले हों, दृष्टि आँचलिक नहीं है, पर वह माना कहाँ गया। हबीब साहब की रंगदृष्टि व प्रयोग-सृष्टि को ऐसे संकीर्ण दायरे में नहीं डाला जा सका, तो यह श्रेय उनके रंगकर्म की व्यापकता को है और सुपरिणाम थियेटर जगत की सही समझ का - नाट्य-समीक्षा के अभाव के बावजूद। किंतु हबीब साहब के इस लोक की ओर आने को उसी युग-प्रवाह के साथ जोडकर ही देखा जाना चाहिए। नाम भी वही उस दौर वाला है – ‘नयी कविता, नयी कहानी’ और ‘नया थियेटर’। लोक के आगे की बात यथार्थ और प्रतिबद्धता की है। ‘लोक’ उनका माध्यम है - शैली-शिल्प है। पर इतना पुरज़ोर व इसीलिए इतना पुरअसर है कि लोग उसी में उलझकर रह जाते हैं। उसी को उनके नाटकों का मक़्सद मान लेते हैं। हबीब साहब का ‘इससे आगे जाकर असली मक़सद तक पहुँचने’ का आह्वान इसी यथार्थ व प्रतिबद्धता को समझने का है। पर लोग भी क्या करें ? यह विधान बना ही ऐसा सटीक, मौलिक व मौजूँ है कि आदमी का उलझ कर रह जाना लाज़मी है – ‘दिया है दिल अग़र उसको, बशर है, क्या कहिए ’ ! लेकिन जो अध्येता उससे आगे जाते हैं, वे साफ़-साफ़ देख पाते हैं कि हबीब साहब का नाट्यकर्म बामपंथी सोच से संवलित है। इप्टा के साथ उस दौर में रहना भी इसका प्रमाण है। यह इस हद तक भी है कि इनके रंगकर्म को ‘पोलिटिकल थियेटर’ कहने वाले ऐसे लोग भी हैं, जिनकी आस्था मार्क्सवाद-विरोधी है या जो हबीब साहब के नाट्यकर्म के समक्ष बौने होने लगते हैं। परंतु इनकी दृष्टिबेधकता और जैसा कि कहा गया, ग़ज़ब के रंगबोध से बने सृजन से ऐसे कथनों का संहार अपनेआप होता गया...। यह सृजन मुख्य धारा से किनारे कर दिये गये लोगों की पीडा का चितेरा है। जाति-पाँति, धर्म-सम्प्रदाय, धनी-ग़रीब...जैसे भेदों को खत्म करके समानता व स्वतंत्रता की स्थापना पर आधारित मनुष्यता का पक्षधर है। और ये मूल्य किसी लेबल के बिना भी हमारे लोक में मौजूद रहे हैं और हैं। इसी को हबीबजी ने भारतीयता के पर्याय के रूप में अपनाया व साधा है। लोगों तक पहुँचाया है, जो बख़ूबी पहुँचा भी है। यह इनके यहाँ प्राय: शोक या यंत्रणा बनकर नहीं आता, व्यंग्य-विद्रूप-विनोद या विरोध बनकर आता है। ध्यातव्य है कि ये वृत्तियां भी हमारे लोक की हैं। सच्ची भारतीयता हर ज़ोर-जुल्म से विरोध में बसती है। और हबीब साहब की जुझारू वृत्ति किसी से छिपी नहीं। उनकी रंगयात्रा में विरोधों से जूझने के जितने पडाव है, उतने शांति-सुक़ून के नहीं हैं। शायद इसी में उन्हें शांति-सुकून मिला करता था। वरना ‘पोंगा पंडित’ के ख़िलाफ़ जो कुछ हुआ, कोई दूसरा होता, तो टूट भी सकता था। या तो नाटक बन्द कर देता या समझौता कर लेता। लेकिन हबीब साहब अस्सी पार की उम्र में भी और साम्प्रदायिक शक्तियों के सत्ता-काल में भी इससे विचलित हुए बिना इस राह पर चलते रहे। और चुपचाप नहीं, बल्कि हर प्रतिरोध पर रिऐक्ट करते रहे। प्रतिरोधी शक्तियों के पास समझ होती, तो वे देख पाते कि यदि पोंगा पंडित में ब्राह्मणी लालच व कर्मकाण्डी ढ्कोसलों की पोल खोली गयी है (और यह तो तमाम हिन्दू लेखकों ने भी कितनी बार खोली है- मोटेराम की डायरी, प्रायश्चित्त..आदि), तो मुस्लिम कट्टरपंथियों को और अधिक बेनक़ाब करने वाला ‘जिस लाहौर नहिं देख्या’ भी तो उन्होंने खेला है, जिसमें सीधा व सीरियस आक्रमण है - पोंगा पंडित जैसा हास्य-विनोद नहीं। विवाद ज्यादा हुए इसी धार्मिक मामले को लेकर, पर हबीब साहब के यहाँ व्यवस्था पर चोट करने का जज़्बा ज्यादा है, लेकिन इस पर बवाल करने का अब रवाज़ नहीं रहा – शायद अपने बेपर्द होने के डर से व्यवस्थापक ही नहीं होने देते। ‘सडक’ जैसे नाटक इस थीम के सिरमौर हैं, पर मैं यहाँ एक दुर्लभ उदाहरण देना चाहूँगा, जो एक सम्पूर्ण नाट्यकर्मी हबीब साहब के शायर रूप का है। कहने की बात नहीं कि वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता के कार्यकाल में यह मामूली-सी लगने वाली कविता सुनायी थी। आप स्वयं देखें उसकी मार्मिकता...। शीर्षक है- ‘रामनाथ’ – “रामनाथ ने जीवन पाया साठ साल या इकसठ साल रामनाथ ने जीवन में कपडे पहने कुल छह सौ गज पगडी पाँच, जूते पन्द्रह रामनाथ ने अपने जीवन में कुल सौ मन चावल खाया सब्जी दस मन, फाके किये अनगिनत, शराब पी दो सौ बोतल अजी पूजा की दो हजार बार रामनाथ ने जीवन में धरती नापी कुल जुमला पैंसठ हजार मील सोया पन्द्रह साल। उसके जीवन में आयीं, बीवी के सिवा, कुल पाँच औरतें एक के साथ पचास की उम्र में प्यार किया और प्यार किया नौ साल सत्तर फुट कटवाये बाल और सत्रह फुट नाख़ून रुपया कमाया दस हजार या ग्यारह कुछ रुपया मित्रों को दिया, कुछ मन्दिर को और छोडा कुल आठ रुपये उन्नीस पैसे का कर्ज़... ...बस, यह गिनती रामनाथ का जीवन है इसमें शामिल नहीं चिता की लकडी, तेल, कफ़न, तिरही का भोजन रामनाथ बहुत हँसमुख था उसने पाया एक संतुष्ट-सुखी जीवन चोरी कभी नहीं की- कभी कभार कह दिया अलबत्त बीवी से झूठ एक च्यूँटी भी नहीं मारी – गाली दी दो-तीन महीने में एक आध बच्चे छोडे सात भूल चुके हैं गाँव के सब लोग अब उसकी हर बात रामनाथ ‘नया थियेटर’ है तो लोकाधारित, उसी से निर्मित; लेकिन उसे ‘पेशेवर रंगमंच’ (प्रोफेशनल थियेटर) बनाने की कल्पना की हबीब साहब ने – शायद रंगमंच को पेशेवर बनाने का यह आइडिया हिन्दी थियेटर में पहली बार तभी आया। लोक और पेशा में मूलत: अंतर्विरोध रहा है (मैं आज की बात नहीं कर रहा हूँ, जब सब कुछ ही पेशे तो क्या बाज़ार में तब्दील हो गया है), पर ऐसे अंतर्विरोधों को साधना ही तनवीर साहब को ‘हबीब’ रहा है और उन्होंने इसे भी करके दिखा दिया। तात्पर्य यह नहीं, कि पेशे के रूप में सफल कर गये, बल्कि यह कि अप्रोच पेशेवर हो गयी। उदाहरण के लिए जिस भी नाटक को जब कहिए, प्रस्तुत कर देने के लिए तैयार। इसकी सिद्धि के लिए जो सबसे बडा परिवर्तन किया हबीब साहब ने, वह प्रस्तुति को सेट के तामझाम से मुक्ति का है, जिससे कि जब जहाँ चाहो, खेल दो। इसे तकनीकी भाषा में ‘प्रोसिनियम से निकाल कर जनता के बीच में ला देना भी कहते हैं। वे कहा करते थे कि कहानी को कहने में जितने भी अवरोध आते हैं, उसे बेधडक निकाल दो। दीवारों के बीच न कला पनपती, न कलाकार। लेकिन अब इस चर्चा को यहाँ रोक देना होगा, वरना जिस थ्रियेट्रिकल गैल में जाना पडेगा, उसके लिए यह स्थल नहीं है। हाँ, तो इसी सब के चलते माटी की गाडी, आग़रे बाजार, चरनदास चोर, बहादुर कलारिन, गाँव क नाँव ससुरार मोर नाँव दमाद, ...आदि जाने कितने ही नाटक हमेशा चलते रहे – फिर-फिर बनते रहे...। ‘आगरे बाज़ार’ पहले एक लघु रूपक था। फिर पूर्ण नाटक बन गया। ‘जिस लाहौर नहिं देख्या’ को ‘डब्ल्यू एस एफ, मुम्बई’ में मैंने 45 मिनट का देखा और पूरा देख चुके मुझे भी वह अधूरा या सम्पादित नहीं लगा, तो पहली बार देखने वालों को क्या लगा होगा ! इस नाटक को मैंने समय-समय पर घटी घटनाओं के मुताबिक इम्प्रोवाइज़ करके करते देखा है और मूल संवेदना पर कोई फ़र्क़ नहीं पडता। सो, पेशेवर से मूलत: मेरा मतलब यह था। हाँ, दो-ढाई दर्जन कलाकारों को नौकरी देना तथा समूह के लिए स्थल व संसाधन मुहय्या करा लेना तो है, पर वह मामला ज्यादा सरकारी है। यहाँ विवेच्य नहीं। हाँ, इसे लेकर प्रवाद भी कम न थे, जिसमें अफ़वाह ही ज्यादा रही, जिसका प्रमाण शायद आगे मिल सकें...। अपनी इन थियेट्रिकल मान्यताओं तथा उसे साधने वाले रंगशिल्प व उसे साकार करने वाले उन ठेंठ कलाकारों को हबीब साहब ने कैसे-कैसे साधा... आदि, पर ढेरों सामग्री मौजूद है– लोगों की लिखी, ख़ुद उनकी लिखी व तमाम साक्षात्कारों मे उनकी कही। जैसे वे जमकर नाटक करते, उसी तरह जमकर लिखते-बतियाते भी। पर मेरा ही दुर्भाग्य रहा कि कई अवसरों के बावजूद कोई बातचीत तैयार न हो पायी। पहले अवसर का जिक्र रोचक होगा... मुझे गोवा (विश्वविद्यालय) में गये कुछ ही दिन हुए थे कि पंजिम के कलाअकादमी में ‘माटी की गाडी’ का शो होने की ख़बर मिली। दिल बल्लियों उछलने लगा... मुम्बई छोडने के कुछ ही दिनों पहले ‘पृथ्वी नाट्योत्सव’ में ‘आग़रे बाज़ार’ देखकर गया था- ख़ुमारी उतरने का नाम नहीं ले रही थी। वहाँ छोटी जगह में ऐसे अवसर यूँ भी कम आते हैं और फुर्सत कुछ ज्यादा रहती है। सो, झटपट एक इंटरव्यू की योजना बना डाली। उनके आते ही जाकर मिला और शो के तुरत बाद का समय भी मिल गया। औपचारिक अभिवादन एवं सदिच्छा-संवाद के अलावा यह मेरी पहली मुलाकात थी। ज़ाहिर है, बेहद उत्साहित था। शो देखकर और ‘चार्ज्ड’ हो गया। हबीब साहब ने ‘राजा का साला’ की भूमिका की थी। मज़ा आ गया था। नेपथ्य में पहुंचा और पाँच मिनट में प्रशंसकों के जाने के बाद हबीब साहब ने बातचीत शुरू करने का इशारा किया और गहन मेकअप को स्वयं उतारते हुए सारे प्रश्न सुनने की इच्छा जाहिर की। मैंने एक-एक सवाल पढना शुरू किया- वे स्वीकार में सिर हिलाते रहे...कि 3-4 सवालों के बाद एक सवाल आ गया, जो मामला थोडे ही दिनों पहले ‘संडेमेल’ में पढने को मिला था – ‘आपके और रामचन्द्र देशमुख के छत्तीसगढी रंगकर्म मे क्या अंतर है और किन मुद्दों पर आप दोनो में मतभेद है’ ? उनका तेवर थोडा-सा बदला, प्रतिप्रश्न आया – तो, आप यह भी लिखने वाले हैं? मैं ज्यादा कुछ भाँप न पाया और उसी रौ में कह गया- आप जो जवाब देंगे, उसे ज़रूर लिखूँगा... बस, वे झटके से यूँ खडे हुए कि मैं डर ही गया। दरवाज़े का रास्ता दिखाते हुए गरजे- ‘निकल जाइए आप। मुझे कोई बात नहीं करनी आप से...’। सबकुछ अचानक बदल गया। मैं चकित, अवाक...मामला समझने की कोशिश कर रहा था और वे न जाने क्या-क्या तडकते जा रहे थे। आवाज सुनकर मोनिकाजी (उनकी पत्नी) आयीं। उन्हें शांत किया। मुझसे पूछा कि मैंने क्या कह दिया...। बताया कि उन्हें हाई बीपी है। फिर पानी आया। शायद चाय भी पी गयी। उनका मेकअप उतरा। हम किसी और केबिन में बैठे। बातें हुईं। पता लगा कि रामचन्द्र देशमुख लोकनाट्य के नाम पर कमाने-खाने का धन्धा करते हैं और अख़बारों वग़ैरह में अपने को हबीब साहब के प्रतिस्पर्धी के रूप में प्रोजेक्ट करते हैं, जो इन्हें बहुत नाग़वार लगता है। कायदे से बात पूरी भी हुई, पर मैं लिख न सका- शायद जिस बेक़ायदे से शुरुआत हुई, उससे मन बिदक गया– इतना बडा कलाकार इतनी-सी बात पर इतना बेक़ाबू कैसे हो सकता है, का दंश सालता रहा। अन्दर से बिदकना ऐसा रहा कि लेंस का कवर खोले बिना ही मैंने फोटोज़ ले डाले थे, जिसका पता घर जाकर लगा। यह 18 साल पहले की बात है, वरना ऐसा न होता...। पर उनके काम इतना मुतासिर रहा कि नाटक देखते रहा। गोवा के बाद मैं पूना चला गया। वहाँ ‘थियेटर अकादमी’ के फेस्टिवल में भेंट हुई। उन्होंने पहचाना नहीं, मैं क्यों बताता? अच्छा ही लगा- कटु स्मृति नहीं रही। याद आता है कि ‘बाल गन्धर्व’ में सुबह खुली बातचीत थी। बंसी कौल भी मंच पर थे- नाटक लेकर आये थे। दोनो से बातचीत शायद महेश एलकुंचवारजी कर रहे थे। कोई गीत गाने की फ़रमाइश हुई। बंसी भाई बगली काट गये, तो हबीब साहब से विनम्रतावश कहा गया कि आप अपने किसी कलाकार से गवा दीजिए। मुझे उनके शब्द याद हैं। खींचकर बोले थे– ‘क्यूँकर? तक़ाज़ा मुझसे हुआ है’। और अपना वो प्रिय ‘पॉप्युलर’ गीत सुनाया था- ‘सास गारी देवे, ननद मुँह लेवे, देवर बाबू मोर...सइंया गारी देवे, परोसी ग़म लेवे...’। और इन तमाम रूपों से समझ में आया ‘प्रतिभाएं जुनूनी हुआ ही करती हैं’ (कबीर के लिए द्विवेदीजी की कही बात)। नये सिरे से बात करने की इच्छा बलवती होती रही...। आख़िरस, भोपाल जाकर बात करने का समय लिया, पर दुर्दैव ने पीछा नहीं छोडा। निश्चित तारीख़ से एक सप्ताह पहले ख़बर आयी - उसी वक्त हबीब साहब को कहीं जाना पड गया और बात रह गयी। भेंट हुई 2003-4 में जाकर इप्टा, रायगढ के नाट्योत्सव में, जो हबीब साहब पर ही केन्द्रित था। मैं ख़ास प्रेक्षक के रूप में आमंत्रित था। छह दिन साथ रहने का मौका मिल रहा था। पहुँच गया। फिर तो उठना-बैठना, खाना-पीना साथ होता। तमाम बातें होतीं। रिहर्सल देखते। बस, रात को सोने भर नज़रों से दूर रहते। उस वक्त वे 80 साल के पार थे और उनकी सक्रियता हैरत में डालने वाली थी। 16-17 घंटे काम करते। स्मृति ग़ज़ब की...! सब कुछ याद। किसी भी विषय पर एकदम अपडेट। ढेरों बातें होती रहीं, पर जानबूझकर छिट-फुट ही। क्योंकि आयोजकों ने विधिवत साक्षात्कार का एक सत्र रखा था; जिसमें तमाम श्रोताओं के बीच मुझे उनसे बात करनी थी। वह समय आया भी, बातें खूब जमकर हुईं। हबीब साहब अपने स्वभाव व सुभाव के मुताबिक खुलकर बोले। याद में बस गये एक उदाहरण का मोह-संवरण नहीं कर पा रहा हूँ...। उनके व्यस्त कार्यक्रम को सुनते-सुनते बीच में चुहल के अन्दाज़ में पूछ बैठा था- इतने कामों के बीच शादी का समय कैसे निकाल पाये? उन्होंने तपाक से कहा - मोनिकाजी के पक्ष वालों का दबाव बढता जा रहा था। मेरे काम कम होने का नाम नहीं ले रहे थे। एक दिन घेराव जैसा कर लिया। बस, मैंने कैलेंडर खोला। बताया कि देखो – ये-ये तारीखें शो की हैं। ये-ये रिहर्सलों की हैं। इस-इस दिन मीटिंग है। ये व्याख्यान है। ये वर्कशॉप है...अच्छा लो, ये एक डेट खाली है। उस दिन करना है, तो जहाँ कहो, मैं आ जाऊँ। ये नहीं हो पाया, तो मैं कह नहीं सकता कि कितने दिनों लग जायेंगे कोई खाली दिन पाने में। चुनांचे उसी दिन हो गयी। बस ! मैंने चुहल आगे बढा दी – फिर हनीमून कैसे मना? हबीब साहब उतने ही तपाक से– वो तो आज तक नहीं मना। ...ग़रज़ ये कि ऐसी बहुत-सी बातें हुई थीं। लगभग दो घंटे रेकॉर्डिंग लाइव कैमरॉ में दर्ज़ हुई। हबीब साहब से टुकडों मे हुई ढेरों बातों को मिलाकर सोचा था कि बढिया-सी स्टोरी बनाऊँगा। उनकी कार्य- पद्धति देखी थी। अपनी टीम के साथ उनके सलूक का चश्मदीद हुआ था। बडा सुन रखा था कि शोषण करते हैं। उनसे नौकरों की तरह पेश आते हैं। इसीलिए मैंने लगभग सभी सदस्यों से बातें की थीं। पहले कोई तैयार न हुआ। शायद हबीब साहब के कानों तक बात पहुँची। उन्होंने कुछ कहा होगा। फिर सबने बातें कीं - नगिन (उनकी एकमात्र संतान) ने भी। कुछ ने कम, कुछ ने ज्यादा। पता लगा कि सभी कलाकार ख़ुश हैं। मानते हैं कि ‘साहब’ न होते, तो उन्हें कौन पूछता? हबीब साहब सबकी निजी समस्याओं से भी वाक़िफ़ रहते हैं। उन्हें हल भी करते हैं। हर तरह की बातें उनसे होती हैं। एक मज़ेदार बात मालूम हुई कि रामचरन निर्मल ने एक व्यंग्य-विनोदभरी कविता लिखी है हबीब साहब पर। किसी को न बताने की शर्त पर उसने मुझे सुनायी और मैंने लिख ली। बाद में पता लगा कि सभी जानते हैं। सभी सुन चुके हैं। पता हबीब साहब को भी है- शायद सुनी भी हो। तो क्या निर्मल मुझे बना रहा था या परीक्षा ले रहा था। इस वक़्त मैंने खोजी, तो फाइल में दबी पडी मिल गयी। आप सुनना चाहेंगे? क्या छिपाना, जब सभी जानते हैं ! असली मज़ा आयेगा, उन्हें जानने वालों को। “होकर कौतूहल के बस में/ गया एक दिन मैं सर्कस में भै बिस्मय के काम अनोखे/ देखे बहु व्यायाम अनोखे एक बडा-सा बन्दर आया/उसने झट्पट लैम्प जलाया डट कुर्सी पर पुस्तक खोली/आ तबतक मैना यूँ बोली- हजिर है हुज़ूर का घोडा/चौंक उठाया उसने कोडा आया तब तक एक बछेडा/ चढ बन्दर ने उसको फेरा टेटू ने भी किया सपाटा/टट्टर फाँदी चक्कर काटा फिर बन्दर कुर्सी पर बैठा/ मुँह में चुरुट दबाकर ऐंठा माचिस लेकर उसे जलाया/ और धुआँ भी खूब उडाया ले उसकी अधजली सलाई/ टेटू ने यों तोप चलायी (इसके आगे के संकेत मुझे भी समझ में नहीं आते, पर पढ लें...) एक मनुष्य अंत में आया/ पकडे हुए सिंह को लाया मनुष्य-सिंह की देख लडाई/ की मैंने इस भाँति बडाई किसे साहसी जन डरता है/ नर नाहर को वश करता है मेरा एक मिंत्र तब बोला/भाई, तू भी है बस भोला यह सिंही का जना हुआ है/ किंतु स्यार अब बना हुआ है यह पिंजडे में बन्द रहा है/ नहीं कभी स्वच्छन्द रहा है छोटे से यह पकडा आया/ मार-मार कर गया सिखाया” बता दूँ अपने दुर्भाग्य की बात। जब मुम्बई आने के काफी दिनों बाद तक लाइव कैमरे की रेकॉर्डिग नहीं आयी, उषा व अजय आठले को फोन किया। पता लगा कि वह पूरी रेकॉर्डिग किसी हादसे का शिकार होकर नष्ट हो गयी। मन तडप कर रह गया। यह कह-कहकर संतोष किया कि ‘कुछ इच्छाएँ अधूरी रह जायें, तो जीवन में आस्था बनी रहती है। अब वे यादें ही जिन्दा हैं...। ख़ैर, उनकी टीम में ऐसा हँसी-खुशी, हास्य-विनोद का माहौल देखा। लेकिन अपने जन्मप्रदेश के जनसामान्य में हबीब के प्रति जो सम्मान देखा, वह रोमांचक है। एक शाम ‘मिलनयात्रा’ निकली। यह आयोजन भी भारतीयता की उसी परम्परा का अंग है, जिसके पोषण का हामी हबीबजी का पूरा रंगकर्म है। आगे-आगे हबीबसाहब पैदल ही...। साथ में ग्रुप के कलाकार, रंगोत्सव के आयोजक व हमसब और पीछे बढता हुआ हुजूम। रास्तों के दोनो तरफ लोग फूल-मालाएँ लिए खडे...अपने प्रिय कलाकार को अपने हाथों देने-पहनाने को आतुर। और ये जुटाये हुए लोग नहीं थे. जैसे राजनेताओं के लिए आजकल होते हैं। इनमें सच का प्यार उमड रहा था। होंठ प्रस्फुरित हो रहे थे, आँखें चमक रही थीं…। हर गाँव में छोटा-छोटा मंच सजा था। मंच पर पहुँचते हबीब साहब पर पुष्प-वर्षा होती। गाँव के प्रधान-पंच वग़ैरह स्वागत करते - चन्द शब्द हबीब साहब से सुनना चाहते। वे बोलते भी, पर अपने को व्यक्त करने के हजारों तरीकों से लैस इतने महान कलाकार को अभिव्यक्ति के ऐसे संकट से गुज़रते हुए देखना भी एक अनोखा अनुभव था। दो महाकवियों के शब्दों में – ‘प्रेम न हृदय समात’ और इसीलिए ‘कण्ठ: स्तम्भित वाष्पवृत्ति’ वाला हाल हो गया था। यह किसी भी कलाकार के लिए सबसे बडा गौरव है। यह देखकर मुझे वे टिप्पणियां एकदम बकवास लगीं, जिनमें ‘हबीब अपने क्षेत्र में जा नहीं सकते। उन्होंने वहाँ के लिए कुछ नहीं किया...’ वग़ैरह कहा जाता है। ऐसा कहने वाले लोग ही अब उनके जाने के बाद छत्तीसगढ की सरकार से उनका स्मारक बनाने के लिए प्रच्छन्न ग़ुज़ारिशें कर रहे हैं। वह तो बनेगा ही और उसके भी निहित मक़सद होंगे – ठीक कहने वालों की ही तरह । पर उससे क्या होगा? एक सरकारी खानापूर्त्ति। गान्धीजी तक की तमाम मूर्त्तियाँ गन्दगी से भरी पडी हैं और फाइल से चलायमान सरकार के पास सफाई तक का बजट नहीं है। प्रेमचन्द, ग़ालिब, निराला... सबका यही हाल है। पर ऐसी अज़ीम शख़्सियतों के स्मारक वहीं होते हैं – लोगों के दिलों में। और वह बन चुका है, जो कभी धूमिल तक न होगा। ‘हबीब साहब ने अपने थियेटर की कोई परम्परा नहीं छोडी’, ‘नया थियेटर’ का कोई समर्थ वारिस नहीं’... जैसी आलोचनाओं के जवाब भी इसी सत्य में निहित हैं। ये परम्परायें अवाम की यादों में अक्षुण्ण रह्ती हैं। और कालिदास की परम्परा में दूसरे कालिदास पैदा नहीं होते। वे हर ज़हीन कवि की कविताओं में समाये होते हैं। ग़ालिब में ख़ुशरो कहाँ दिखते हैं? पर उन्होंने ख़ुद कहा है- ‘पीते हैं धोके ख़ुशरु-ए-शीरीं सुख़न के पाँव’। इसी तरह हबीब साहब की परम्परा व ‘नया थियेटर’ के वारिस ढेरों कलाकारों के कलाकर्म में समाये हैं। व्यक्त हो रहे हैं। उन्हें देखने के लिए नज़र चाहिए – शौक़-ए-दीदार अग़र है, तो नज़र पैदा कर’ - हबीब साहब (के नाटक) की तरह ‘देख रहे हैं नैंन’...। * * * सम्पर्क- ‘नीलकण्ठ’, एन.एस. रोड नं.-5, विलेपार्ले (पश्चिम), मुम्बई- 400056 फोन- 022-26101987, मो.- 09819722077/09869355103 ई मेल- satyadevtripathi@gmail.com

Wednesday, 19 November 2008

संवेदनाएं प्रैक्टिकल हो रही हैं...!!

कल एम.ए.-द्वितीय वर्ष की मौखिकी (वाइवा) चल रही थी... एक लडकी आयी। चल नहीं पा रही थी। थोडी देर में अपनी साथी प्राध्यापिकाओं की बातों से समझ में आ गया कि गर्भवती है। ऐसे में मैं हर स्त्री के चेहरे पर ‘कामायनी’ के श्रद्धा वाले वर्णन का सच जाँचने लगता हूँ...। उसका ‘केतकी गर्भ-सा पीला मुख’ तो था, पर ‘आँखों में आलस भरा स्नेह’ नदारद था। इसी तरह ‘कुछ कृशता नयी लजीली-सी’ की जगह ‘अति दुबली दुख की प्रतिमा-सी’ बनी पडी थी...हाँ, ‘कम्पित लतिका-सी लिए देह’ अवश्य साकार दिखी...। मुझसे रहा न गया। पूछ बैठा- ससुराल के घर से आ रही हो? उसने ‘ना’ में सिर भर हिलाया। तो कब आयीं माँ के घर? – मैंने पूछा। पाँच-छह दिन हुए... के उत्तर के बाद मैं अचानक विनोद के स्वर में पूछ बैठा –‘अच्छा, मायके और ससुराल के जीवन के अंतर पर कुछ बोलो...’ और वह फफक कर रो पडी...। टेबल पर सर टिका कर आँसू पोंछते हुए उसकी सिसकती आवाज निकली- ‘पिताजी लाने गये थे। बहुत झगडा हुआ...। वाइवा तक के लिए आयी हूँ। परसों वापस पहुंचाना है...’। अब दोनो जीवन का क्या अंतर जानना बचा था !! विषय पर कुछ बातचीत के बाद वह जाने को उठी। दरवाजे तक गयी कि अचानक मैंने उसे बुलाया और पूछा- ‘यदि कल का वाइवा एक सप्ताह के लिए आगे बढा दिया जाये, तो तुम इतने दिन और मायके रह पाओगी?’ वह एक मिनट खडी सोचती रही और बोली – ‘नहीं सर, जाने दीजिए...। वो लोग ज्यादा ही झगडा करेंगे...। फिर आखिर तो रहना वहीं है – ऐसा कितने दिन करेंगे...?’ स्वीकृति में सर हिलाने के अलावा मेरे पास कोई चारा न था..। वह तो चली गयी...। पर मुझे वह घटना याद दिला गयी, जहाँ मेरे पास चारा था। पिछले महीने की दीवाली के एक दिन पहले की घटी अपने भाई की बेटी की घटना...। बेटी को हमने बडे लाड से पाला। एम.ए. तक पढाया। बडे रज-गज से शादी की। लडका अपने ही जिले के शहर में अच्छी नौकरी में है। उम्मीद थी कि शहर में बेटी भी कुछ करेगी। अच्छा जीवन होगा। लेकिन चार भाइयों व पिता के सम्मिलित परिवार का दबाव ऐसा कि बच्ची को पडोसी के घर तक जाने की इजाज़त नहीं। थोडी ही दूर पर उसके साथ 14 सालों तक पढी सहेली की ससुराल है, पर वहाँ जाने या उसे अपने घर बुलाने की मनाही । दो कमरों में दो बच्चों को लेकर सडने पर विवश। कभी कहीं घूमने-फिरने जाने की कोई सूरत नहीं। एक चम्मच तक खरीद नहीं सकते अपनी मर्जी से – फ़िल्म आदि देखने की तो बात ही क्या? घर से पूछना पडता है सबकुछ...। हर शनिवार की शाम 15 किमी. पर स्थित गाँव जाना ही पडता है – बाइक पर दोनो बच्चों को लेकर। फिर सोम की सुबह वैसे ही आना...। बस, इसके अलावा कहीं कुछ नहीं। हमारे यहाँ तक आने देने में हजार बहाने-बन्दिशें। इस-उस कारण से तीन-तीन, चार-चार साल तक बिदाई नहीं। बेटी पस्त्। आकुल। भाई भी बेकल, पर झगडे और बेटी के पिसने के डर से चुप । मेरे उबाल पर भी भाई के संकोच का ढक्कन। और इस दीवाली के एक सप्ताह पहले किसी तरह बिदाई हुई थी। दीवाली मनाकर वापस जाने की बात थी। संयोग से मैं भी पहुंच गया था। बेटी से बातें करते और दोनो नातियों के साथ खेलते हुए बडा मज़ा आ रहा था... कि दीवाली के दो दिन पहले समधी आ गये। और शाम को अचानक बिदाई पर ज़ोर देने लगे। कहा कि दीवाली की पूजा है, पूरे परिवार का साथ रहना जरूरी है। मैं बिफर पडा – ‘यह बात बिदाई के पहले क्यों नही की ?’ ... भइया घर पे नहीं थे। और पिछ्ली सारी बातों का असर रहा होगा। कई सालों का बन्द ढक्क्न ऐसा खुला कि मैंने एकदम ‘ना’ कह दिया। और मन ही मन तैयार हो गया- सारे झगडे के लिए। सोच लिया कि कोर्ट-कचहरी भले हो जाये, पर इस साँसत से निकलना ही होगा- सम्बन्ध रहे, चाहे टूटे...। इस सडाँध को झेलने से टूट जाना ही बेहतर। बस, इसी रौ में उनके सारे रहन-सहन, सोच-सलूक पर एकदम साफ-साफ, काफी कुछ कह भी दिया – बेशक़ शांत लहज़े और सुथरी भाषा में...। समधी तो चले गये, पर दूसरे दिन दामाद आ गया- शायद पिता ने मेरे कहने को नमक –मिर्च लगाकर बताया होगा। शहर से अपने घर न जाकर सीधे मेरे घर आया। शाम को घर में सिर्फ औरतें व बच्चे थे। एकाध घंटे ही रहा और हमें तो किसी ने बताया नहीं, पर पता लगा कि लगातार कुछ कहता-धमकाता रहा। छह साल के नाती ने जरूर कहा- ‘नाना, आप नहीं थे, तो पापा आये थे। मम्मी से कह रहे थे- ‘पत्नी के लिए सबसे बडा होता है पति। भगवान से भी बडा..। क्या पति भगवान से भी बडा होता है..’। मैं क्या बताता ! मुझे चुप देखकर फिर बोला- ‘बताओ न नाना, पापा आज ऐसा क्यों कह रहे थे? रोज़ तो भगवान को सबसे बडा बताते हैं’। मैं हतप्रभ... ! पर अब बच्चे के मानस-पटल पर दरार न पडने देने के लिए कुछ तो बताना ही पडेगा..., सोचते हुए मेरे मुँह से निकला – ‘मेरे लिए तो सबसे बडा है – मेरा ये नन्हा-सा नाती। भगवान से भी बडा...’ कह्ते हुए उसे गोद में लेकर उछाल दिया...और हँसते हुए ‘और उछालो, और उछालो’ कहने में वह अपना सवाल भूल भी गया। लेकिन कुछ ही देर बाद समधीजी बाइक पर नमूँदार हुए अपने बडे बेटे के साथ। गडबड का पूरा अन्देशा हो गया...। गाँव को जवाब देने का ख्याल सबसे पहले आया... नयी नताई ! कल ही गये हैं समधी... आज फिर क्यों आ गये इतनी रात को !! शाम को दामाद आया था...। याने गाँव सोच रहा होगा कि क्या हो रहा है। ख़ैर, चाय-पानी हुआ। खाना-वाना खाकर सोया गया। सुबह नाश्ता करते हुए शुरू हुए समधी महोदय– ‘जरा ध्यान से सुनिए प्रोफेसर साहब, आप तो पढे-लिखे हैं। बात को समझिए... कल शाम को मेरे मना करने के बावजूद मेरा बेटा यहाँ आया था। बडा जिद्दी है। मानेगा नहीं। आप बहू को विदा कर दें। मैं उसे लेकर जाऊँ और सब बात खतम हो जायेगी’। सुनकर तो मेरे बदन में आग ही लग गयी, पर अपने घर का लिहाज रखते हुए मैंने भरसक पूरी नरमी से ही कहा – ‘देखिये, कल मैंने इतनी बातें कीं...और आज आप बेटे को समझाने के बदले यहाँ चले आये लिवांने... यह तो उसे शह देना है। और मेरी बात वही है कि चार साल बाद बिटिया आयी है। अभी 8 दिन हुए... परसों दीवाली है। उसकी बहन आयी है, कल बुआ आ रही है। मैं आ गया हूँ। इतना सब संयोग बन गया है, तो इस बार हमें साथ में दीवाली मना लेने दीजिए...जिन्दगी भर तो आपके यहाँ रहना ही है। चार साल बाद कम से कम दस दिन मायके में रहने का संतोष भी हो जायेगा’। परंतु वे मेरी बात को जैसे अनसुनी करते हुए बोले- ‘आप मेरी स्थिति को समझिये... बच्चे के दिमाँग की सोचिये..। और् बिदाई कर दीजिए। बस, मैं इतना ही कहूँगा’। ‘और मैं कहूँगा कि आप मेरी बात को समझिए, पर आप तो सुनना तक नहीं चाह रहे हैं। अब बेटे को आप तीन दिन कैसे सँभालेंगे, आप सोचिए’- शब्दों पर दबाव बढ गया। ‘तो मतलब कि बिदाई नहीं होगी...?’- ढिठाई थी पूछने में....। ‘बिदाई होगी- दीवाली बाद। उसी दिन, जो कल तय हुआ’- उतनी ही ढिठाई आवाज में। ‘तो ठीक है, तब तक हम भी यहीं रहेंगे, उसी दिन जायेंगे लिवाकर ही...’। बस, अब तो मेरा पारा सातवें आसमान पर ‘तो तुम धरना दोगे हमारे दरवाजे पर ? और हम देने देंगे? अब तो आप को जाना ही होगा’। वो थोडा हँसे- ‘तो क्या आप भगा देंगे? मैं तो यहीं ओरी की नीचे निखरह्री खाट पर भी सो लूँगा- जमीन पर सो लूँगा, पर जाऊँगा बहू को लेकर ही...’। मेरे हाथ उठे ही थे –‘निकल जाओ’- कहने के लिए कि अचानक मैंने अपने हाथ को बेटी के हाथों में थमा पाया । भर सिर को आँचल से ढँके वह अपने ससुर और मेरे बीच खडी हो थी। मुझे विश्वास तो अब नहीं हो रहा, पर सुनी मैंने अपने ही कानों से अपनी ही पाली बेटी की आवाज... वह अपने ससुर से मुखातिब थी - ‘मैं चलूँगी पापा, आप अभी लेकर चलिए...’ और फिर मेरी तरफ़ मुडी। शब्द निकलने के पहले ही मैंने उसके होंठों पर हाथ रख दिया। और बोला- ‘ठीक है बेटा, अब मुझे कुछ नहीं सुनना है। मैं गाडी मँगाता हूँ अभी। और तुम लोग चले जाओ... अब तुम वहीं रहोगी। बस, सब खत्म..’। और मैं चल पडा गाडी वाले को फोन करने...। लेकिन फिर बेटी के जाने तक घर वापस न आ सका। बगल वाले भाई के दरवाजे पर पडी एक खाट पर पड गया। पडे-पडे ख्याल आया अपनी बडी बहन का...। तब मैं नवीं में पढ रहा था। बहन किसी झगडे के कारण ससुराल से अपने आप चली आयी थी। दो-तीन दिन बाद उसके ससुर लेने आये थे। मैंने बचपनी आक्रोश में मना कर दिया था- अब मेरी बहन उस घर में नहीं जायेगी। घर के किसी ने मेरी बात का विरोध नहीं किया था। उसके ससुरजी नाराज होकर चले गये थे। जाते हुए कह भी गये थे – आज तक कोई अपनी बहन-बेटी को जिन्दगी भर रख नहीं पाया है बेटा...। और मैंने उसी जुनून में कह दिया था – मैं वही करके दिखा दूँगा...। चार साल रही बहन अपने दो बच्चों के साथ, कभी चूँ तक नहीं किया । और उसी ससुर के मरने के बाद मैंने ही पहुँचाया था, तब गयी थी। उस दिन लगा कि मेरी बहन बेवकूफ़ थी- और मैं तो आज भी हूँ। उसे भी चले जाना चाहिए था। किस बिसात पर मैंने उसे रोका था और किस उम्मीद पर वह रुकी थी !! अब तो मेरे पास बिसात है। नियम-कानून हैं। पर बेटी चली गयी...। जवाब दिया आज इस छात्रा ने...। और अचानक मन में कौंधा– संवेदनाएं अब काफ़ी प्रैक्टिकल हो रही हैं और मैं आउट ऑफ़ डेट...। ** ** ** सम्पर्क- नीलकण्ठ, एन एस रोड न.-5, विलेपार्ले-पश्चिम, मुम्बई – 400056, मो-

Saturday, 9 August 2008

सिंग इज़ किंग...नाम में क्या नहीं है...! अनीस बज़्मी को अंग्रेजी नामों का खासा मोह है। ‘नो एंट्री’, ‘वेलकम’ को तो हिन्दी में कह सकते थे, पर ‘सिग इज़ किंग’ को तो हिन्दी में ढालना भी कठिन है, पर है इतना सरल कि अंग्रेजी लगता नहीं। तभी तो सिगों की कुछ ट्रकों के पीछे भी दिख जाता है...। क्या जाने वहीं से ले लिया हो..! लेकिन फिल्म का नाम बनने के बाद इसका जल्वा देखकर आज होते, तो शेक्स्पीयर भी ‘नाम में क्या रखा है’ को बदलकर कर देते- ‘नाम में क्या नहीं है?’। ऐसा हिट हुआ कि कहाँ-कहाँ फ़िट होने लगा ! ख़बरों-एसएमएसों आदि में सिंग लोग किंगमय होने लगे। विश्वास पाकर मनमोहन सिंह, छह विकेट लेकर हरभजन सिंह किंग हो गये। अमर सिह भी नहीं बचे। नाम ही नारा हो गया। प्रचार भी भीषण हुआ। और इसी के चलते कुछ न करने वाले सिंग लोग नाम को देखकर ही तूफ़ान मचाने चल उठे...। लेकिन फिल्म देखकर लगा कि तूफ़ान मचाने जैसा तो प्याला भी नहीं है और यह नाम अपने काम में भी कुछ ऐसा ‘किंग साइज़’ नहीं है। हैपी सिंग बना अक्षय कुमार बेचारा गाँव का भोलाभाला लडका है। सबकी मदद करता है। ईमानदार है। भावुक है। सो, चढाने पर कुछ भी करने को चढ जाता है - मुर्गी पकडने से लेकर ऑस्ट्रेलिया में डॉन बन बैठे अपने गाँव के दोस्त लकी सिंग (सोनू सूद) को वापस लाने तक का...। मुर्गी पकडने में पूरे गाँव के सामान तहस-नहस करता हैं, तो लकी सिंग को विरोधी गैंग वालों से बचाने में उसी के सर-पैर तोड डालता है। इन सबमें गँवईंपने को बेहद बढा-चढा कर दिखाने से फ़ार्स वाला हास्य बनता तो है, पर हँसी लाने तक खींचने में दृश्यों का कीमा भी बन जाता है। साथ में ओमपुरी हैं, जो ‘मेरे बाप पहले आप’ स्टाइल में बर्बाद होने के लिए टाइप्ड होते जा रहे हैं। लेकिन हैपी सिग की तो यही सब पहचान बन जाता है, जिसे निभाने के मास्टर हो चले हैं अक्षय - नमस्ते लंडन व भूलभुलैया आदि से..। फिर ऐसे कारनामे खोज-खोज कर शामिल किये गये हैं, जिनके चलते बडी कुशलता से कहानी भी बनती जाती है। ऑस्ट्रेलिया जाने में इजिप्ट पहुंच जाना गँवरपन के चलते है, पर वहाँ सोनिया (कैटरीना कैफ़) का पर्स लेकर भागने वाले को मुर्गी के अन्दाज में पकडना ऐक्शन है। उसे दिल दे बैठना फिल्मी है। फिर ऑस्ट्रेलिया में उसी की माँ (किरन खेर) के यहाँ रहना और उसी के चलते लकी सिंग की गैंग में पैठना, लकी का बीमार व हैपी का सरगना बन जाना...आदि सब असम्भव के आकस्मिक जोड का मसाला भी है, पर कथाकला का सबब भी। कैटरीना आती है अपने ब्वायफ्रेंड (रनवीर शौरी) के साथ, पर हिन्दी फिल्म का दर्शक जानता है कि वो मिलेगी हीरो को ही। सो, लकी की गैंग ढेरों मेलोड्रामा रचती है, जो खासे मनोरंजक बन पडे हैं - बस, आप दिमाँग को पूर्ण विश्राम देकर उनका विशुद्ध मजा लेने का मन बना लें। हैपी पूरी गैंग को हिंसक से अच्छा इंसान बनाता है, जो फिल्म का शुभ पक्ष है और इस प्रयत्न में सभी चरित्रों व कलाकारों - नेहा धूपिया, यशपाल शर्मा, मनोज पाहवा, कमल चोपडा, सुधांशु पाण्डेय आदि कलाकारों की पहचान बन जाना अच्छी कला का नमूना है। लेकिन हीरो के लिए सबके रोल का कटना छिपता नहीं। ऐसे में नामवाले जावेद जाफ़री के रोल का विस्तार भी खुल जाता है। किरन खेर की सदाबहार आवाज व अदा मोहक है, तो कैटरीना की सुन्दरता को अभिनय की दरकार नहीं। विरासती पुट के साथ नयेपन को मिलाकर संवाद फिल्म के किंगपने को सार्थक करते हैं - ‘मैं कहता हूँ सच, अच्छा तो अपने आप लगने लगता है’। गीत कई हैं, पर शीर्षक गीत के सिवा सभी औसत हैं और औसत संगीत से मिलकर औसत मनोरंजन दे जाते हैं। और लगता है कि औसत के स्तर से ऊपर उठना आज की हिन्दी फिल्मों को भूल-सा गया है। - सत्यदेव त्रिपाठी

Saturday, 2 August 2008

99 तमाचे और एक चुम्बन की ‘अगली और पगली’ ... सचिन खोत की फ़न्नी, पर अच्छा ‘टाइमपास’ फिल्म ‘अगली और पगली’ के अंत में पर्दे पर लिखा पाया जाता है - ‘99 स्लैप्स ऐण्ड वन किस’। पूरी फिल्म हम देखते रहे थे कि बात बात पर या बिना बात बात की बात पर हिरोइन मल्लिका शेरावत ज़ोरदार थप्पड मारती रही है हीरो रनवीर शौरी को। सो, हमने 99 मान लिया। और अपने जन्म दिन पर होटेल में झटके, पर धडल्ले से गालों पर चूमते देखा था, सो हिसाब बराबर समझ कर उठने ही चले कि दिखायी पडा- मल्लिका-रनवीर का होंठों में गाढे चुम्बन का दृश्य... और ख्याल आया कि ओह, हम भी कहाँ के दाना ठहरे कि ‘ख़्वाहिश-ए-मल्लिका’ को रुसवा करने चले थे- भला गालों पर ‘पुच्च’ कर देना भी कोई मलिका-ए-चुम्बन का चूमना हुआ...। ग़रज़ ये कि इज्जत रख ली खोत ने। दर्शकों का भी कुछ पैसा वसूल हुआ। चुम्बन चुलबुलाते निकले...। और काफ़ी पैसा वसूल हुआ मल्लिका के ‘आइटम नाच-गान’ में - दृश्यांकन (कैमरा व नियोजन) तो पूरी फिल्म का ही अच्छा है। फिर मल्लिका का भरपूर इस्तेमाल भी और भावन नैंनसुख भी। यूँ अभिनय भी कम नहीं। पगली की ख़िताब को अगली ने बनावटी गम्भीरता से अच्छा साकार किया - इसे अंग्रेजी का ‘अगली’ (जो सोचकर हम भी गये थे) कतई न समझें। और जब पगली है ही वह, तो प्रेमी को पेटीकोट पहनाकर बिना सीट की सायकल पर शहर में घुमाने जैसा सनक तथा ख़ुद भी अंतर्वस्त्रों को कपडों के ऊपर पहनकर कॉलेज जाने जैसा बोल्ड...क्या-क्या सब कराती-करती है कि हँसें भी और सर भी पीटें । पर इसी सबकी तो फिल्म है, जिसे आप जाके ही देखें कि खुद को मालिक व प्रेमी को गुलाम बनाकर कैसे रखती है ! फिर हीरो प्रेमी कबीर कैसे उसे सहर्ष निभाता है और दिखाता है कि मज़बूरन कर रहा है। इसी दोराहे के बीच उभरता है रनवीर के अभिनय का गुर कि बन और जम जाती है हीरो जैसी भरपूर साख़...। लेकिन इसी पागलपन व गुलामी के बीच बनता है वह विचित्र प्रेम भी, जिसके लिए चचा ग़ालिब ने कहा था- ‘यही है आज़माना, तो सताना किसको कहते हैं ; अदू के हो लिये जब तुम, तो मेरा इम्तहाँ क्यों हो’। बस, यहाँ आज़माने-सताने के इम्तहान में प्रेमी पास भी होता है और कोई अदू (दुश्मन) भी नहीं है। था तो पूर्व प्रेमी, पर मर चुका है और उसी ग़म में शराब पीने व रेल से कटकर मरने के लिए तैयार कुकहू टकराती है कबीर से...। याने मुख़्तसर से फ़ुटेज में पूरी मनोवैज्ञानिकता भी समा उठी है। निर्देशक की मज़बूत मनभावन पकड ऐसी कि सब होने में मज़ेदार नाटकीयता भी और हास्य में शालीन होती मनमानियाँ भी...। फिल्म शुरू होने के साथ हीरो निकला था जिस आँटी से मिलने, उससे मिल पाता है फिल्म के समाप्त होने के समय और यह नाटकीय यात्रा भी बन जाती है लाजवाब फ़न का सिला । बस, आँटी में ज़ीनत अमान ज़ाया होती हैं और बिना बताये लडकी के रात-रात भर ग़ायब होने को शराब पी-पीकर गिरने-सहने में बाप बने टीनू आनन्द भी...। पर कुछ अच्छा बनने के लिए किसी को तो बलि होना ही पडता है...। -सत्यदेव त्रिपाठी

Saturday, 26 July 2008

इस्तानबुल का मिशन टाँय-टाँय फ़िस्स अपूर्व लखिया को लगा कि ‘शूट आउट’ को मिशन और ‘लोखंड्वाला’ को ‘इस्तानबुल’ कर देंगे, तो एक और हिट बन जायेगी; पर भूल गये कि वह एक वारदात थी, जिसके निशानात लोगों की जेहन में थे। सो, लोग गये देखने। और जैसा कि हर घटना के पीछे एक कहानी होती है, वह कहानी भा गयी। फिल्म चल गयी। लेकिन यहाँ ओसामा व अलक़ायदा की छाप के साथ अमेरिकन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का छौंक भी काम न आया...। क्योंकि जो कहानी बनी, वह पिटी-पिटायी फिल्मी साबित हुई । ब्लॉस्ट में पत्नी-बच्ची को खोने के बाद बने स्वयंभू हीरो विवेक ओबेरॉय(रिज़वान) को इतने संसाधन व इतनी सूचनाएं कहाँ से मिलती हैं, लखिया ही लख सकते हैं। साथ में है नये हीरो बने ज़ायेद ख़ान, जिसका किरदार (विवेक साग़र) इतनी कम उम्र में आर्मी से निकलकर ‘आज तक’ का विश्वप्रसिद्ध रिपोर्टर बन गया है और किसी पद व जिम्मेदारी के बिना भी खासे बडे-बडे कारनामे करके आतंकवादी गैंग का खात्मा कर देता है। विवेक को हँसमुख व ज़ायेद को गम्भीर बनाने का बानक चरित्रांकन का सही जोड है, पर दोनो के ठीक करने के बावजूद फिल्म का कोई सही तोड नहीं बन पाता। इनके साथ मिशन में जुडती है श्वेता बजाज, जिसे ध्यान में आने लायक अदाकारी का मौका तो नहीं मिला है, लेकिन उसका चरित्र (लिज़ालोबो) अवश्य काफी रोचक है। ‘डॉन’ की ज़ीनत अमान की याद दिला देता है। और फिर तो आतंकवादियों की रोबोट जैसी गैंग से लडते हुए अमित-प्रान-ज़ीनत की तिकडी भी दिखती है और लाल डायरी के बदले कम्पुटर से उतारी सीडी है। बस, हॉय विवेक से प्यार न कराकर श्वेता को नाहक मरवा डाला !! लेकिन यहाँ पुलिस नहीं आती, क्योंकि जाँबाज़ लडाकू रिपोर्टर काफी हैं। पर दूसरा क्योंकि यह कि यहाँ सिर्फ़ गैंग लड रही होती है। दोनो सरगनों से दोनो हीरोज की आख़िरी, रुटीन और फिल्मी, लडाई अंत में होती है। निकेतनधीर (गज़्नी) की बलिष्ठ देह (बॉडी बिल्डर) काम नहीं आती और इतनी बडी आतंकवादी गैंग के सरगना का इतनी मोटी बुद्धिवाला होने पर पूरी फिल्म के दौरान विश्वास नहीं होता। पहले के खल पात्र स्मगलिंग का धन्धा करते थे और ऊपर से समाजसेवी बने रहते थे। अब धन्धा आतंकवाद का करते हैं और ऊपर से श्रेष्ठ मीडिया कर्मी बने हुए हैं। तभी तो पूरा टर्की उसकी घोषणा पर दोनो हीरो के पीछे पड जाता है...। नये हीरो की नयी हिरोइन श्रिया सरन का अभिनय भी बेजान है और उसका पूरा अंजलि-मामला भी ठूँसा हुआ है, जिसके न होने से कहानी पर कोई फ़र्क़ न पडता । अंत के सस्ते भावुक ड्रामा से भी दर्शक बच जाता और एक रस्मी गीत से भी। यूँ सभी गीत ऐसे ही हैं। अभिषेक बच्चन वाला ‘आइटम नाच-गान’ है, जो फिल्म की तो छोडिए, अभिषेक की पोल एक बार फिर खोल देता है। दूसरी अतिथि भूमिका स्वरूप सुनील शेट्टी तो गोया मरने के लिए ही आये थे..। मज़े का दृश्य जॉर्ज बुश वाला है, जहाँ वे म-न मो-ह-न कहना सीख रहे हैं और हॉल में जाते हुए एक दर्शक ‘मिशन इस्तानबुल’ कहना सीख रहा था... ‘मिशन काबुल’ व ‘मिशन इस्तकबाल’ कहे जा रहा था। जॉर्ज यह भी कह रहे थे कि ‘डोंट टच इंडियंस’ और बाहर निकलते हुए दूसरा दर्शक कहते सुना गया- डोंट सी दिस मिशन यार,...वैसे कहाँ है यह ‘इस्तानबुल’? -सत्यदेव त्रिपाठी

Friday, 18 July 2008

अकेलेदम आतंकवाद को खत्म करने का ‘कॉंट्रैक्ट’ ... रामगोपाल वर्मा का नया हीरो आतंकवाद को खत्म करने का ‘कॉंट्रैक्ट’ लेता है और यह फिल्म का ही कमाल है कि वो ऐसा कर देता है - दो गैंगों का सफ़ाया...वरना तो इस बात में कोई माल नहीं है, यह रागोव को भी मालूम है। तो क्या कर रहे हैं वे ? सफ़ाया आतंकवाद का या जनता की जेब का...? हाँ, हीरोगीरी के सारे सरंजाम के बावजूद आध्विक महाजन काफ़ी सहज संतुलित व सही लगा। ‘अंडरवर्ल्ड का आतंकवाद से मेल’ का नारा - एक और फिल्मी फ़ण्डा ! दो में से एक गैंग का इस्तेमाल आतंकवादी सरगना कर रहा है, तो क्या फ़र्क़ पड जा रहा है? हाँ, कुछ बात वहाँ है, जहाँ दूसरी गैंग का इस्तेमाल खुली व्यवस्था के तहत सरकारी तरह से हो रहा है। कहना चाहिए- ‘सरकार का अंडरवर्ल्ड से मेल’। क्या कर रही है सरकार व सेंसर ? और नया क्या है इसके सिवा इस ‘कॉंट्रैक्ट’ में कि एक पुलिस शूटर को सडकों पर नंगे दौडाता है हीरो। वरना तो पुलिस द्वारा अपराधियों की गैग में मुखबिर भेजना ‘डॉन’ जैसी स्टंट से लेकर ‘द्रोहकाल’ जैसी सार्थक फिल्मों तक में कितनी ही बार हुआ है..! फिर दोनो का मिक्स्चर ...मुखबिर बनाकर भेजने वाले का खात्मा व गैंग की लडकी से प्यार होता है डॉन जैसा, तो भेजने वाले अफसर को सामने मरते देखना व उसके पदचिन्हों पर चलना तथा सबसे बडे अफसर (यहाँ गृहमंत्री) का आतंकवादी से मिला होना है ‘द्रोहकाल’ जैसा..। बस, इस बार मुखबिर बना हीरो अमान भुक्तभोगी है - बमब्लास्ट में बेटी व पत्नी को खो चुका है। वरना उसे मालूम ही न पडता कि आम आदमी की पीडा क्या होती है ? वह तो आतंकवादी सरगना के फ़लसफ़े - “तुम भी शूटर ही हो। किसी के कहने पर लोगों को मारते हो। तुम्हारा कोई अपना वजूद ही नहीं” - का कायल होक्रर फौज की नौकरी छोड चुका है। और 99% दिमाँग वाले ऑफ़िसर को फ़तह के कग़ार पर पहुंचने के बाद भी नहीं पता कि मुखबिर-योजना का अंत कैसे होगा...! ये ही हैं फिल्म के विचारप्रधान होने के दावे के ढहे हुए आधार !! सारी कडाई के बावजूद वह मोबाइल नहीं पकडा जाता, जिस पर हीरो की ऑफिसर से इतनी लबी बातें होती हैं कि हमारा दिल धडकने लगता है और सारे रुटीन के बावजूद यह दिल धडकाना ही इस फिल्म का उल्लेख्य पहलू है, जो कला का न होकर तकनीक का है। बस, संवाद खासे तगडे हैं, जिसमें ‘सिक्रेट’ आदि के प्रसंगों के बनाव उल्लेख्य हैं। यदि उससे आधी दम भी कहानी व बात में होती, तो रामगोपाल वर्मा जैसा कुछ होता...। शेष बहुत सारा तो अलग व खास करने के चक्कर का शिकार हो गया है। किशोर कदम, अमृता सुभाष तो कॉर्टून हुए ही हैं, छोटे राजन जैसा पात्र करने वाला उपेन्द्र लिमये सबसे बडा कार्टून बन गया है। प्रसाद पुरन्दरे की बोलने की अदा ही उन्हें ख़ास बनाती है, पर पोशीदा गुफ़्तगू के लिए वह एकदम बेमेल है। यही हाल ज़ाकिर हुसेन का भी हुआ है। दाऊद की छबि को साकार करते आर.डी. (सुमित) का कोई काम ही नहीं...। बिना दिखाये ही दृश्यं व चरित्र को मशहूर करने की अदा है रागोव की, जो यहाँ भी फलीफूली है...। प्रेम का उत्सर्ग वाला रूप भी अच्छा बना है और इसे निभाती साक्षी गुलाटी भी संतोष जनक हो पायी है। सब कुछ पुराना है, पर बासी नहीं...के थ्रिल का मज़ा लेना हो, तो फुर्सती समय में देख लेने लायक भर ही बन सका है - फिल्म का दर्शकों से ‘कॉंट्रैक्ट’ ...। - सत्यदेव त्रिपाठी

Sunday, 13 July 2008

पुराने फॉर्मूलों को खींचतानकर बनी ‘महबूबा’ का क्या हो...? सफ़ाई देखिए कि करन (अजय देवगन) सपने में लडकी को देखता है और उसे पेंटिग्स में हू-ब-हू उतार लेता है !! स्टुडियो (सॉरी, बैठक है) भर रखा है.। फिर कमाल देखिए कि वह लडकी उसी शहर में है। तब मह्बूबा-महबूबा (फिल्म के नाम को साकार करते हुए) गाते-गाते पीछा करता है, जिसे देखकर लडकी कहती है - ‘नाटकबाज़ी का यह फ़ॉर्मूला बहुत पुराना हो गया है’। निर्देशक अफ़ज़ल खान यह संवाद सुन लेते, तो समझ जाते कि पूरी फिल्लम ही ऐसा बासी फ़ॉर्मूला है- एक फूल दो माली याने प्रेम त्रिकोण का.. बस, दो बातें फ़ॉर्मूले से अलग हैं...1- पहला माली श्रवण धारीवाल (संजय दत्त) प्रेमी नहीं, ‘हर रात इक नया हो बदन’ का व्यापारी है और मानता है कि हर औरत बिकाऊ होती है- चाहे पैसों की कीमत से या वादे की और इसी रौ में पैसे से हार जाने के बाद वादे से फाँसता है और मँगनी के बाद ही भावुक बनाकर रात बिताकर उसके तमाचों का जवाब देकर निकाल देता है...। 2- दोनो माली सगे भाई हैं, जिसका पता दर्शकों को तब लगता है, जब करन अपनी महबूबा को राजी करके शादी कराने अपने घर जाता है, जहाँ ‘हम आपके हैं कौन’ का पूरा बडजात्या-परिवार - रीमा लागू, बिन्दु, हिमानी शिवपुरी..आदि के साथ - तैयार है, जिनके बीच पहला माली ग़म ग़लत करते हुए शराब में ग़र्क हुआ पडा है - ज़ाहिर है उसी फूल के लिए पछ्तावा ...। लेकिन फूल एक ही है - मनीषा कोइराला ; इसका पता चेहरा देखने के कारण दर्शकों को है, पर फूल तो वर्षा से पायल हो गयी है,, इसलिए दोनो मालियों को पता नहीं है। जिस कौमार्य (वर्जिनिटी) की कीमत जीवन में रोज़ घटती जा रही है, उसका भाव फिल्मों में इतना बढा कि कौमार्य-भंग के बाद लडकी नाम तक बदल लेती हैं - गोया एक जीवन ही खत्म हो गया हो...? आख़िर हिन्दी फिल्में बालिग़ कब होंगी ? अब आधी फिल्म में यह भर बचा था कि फूल किस माली का होता है ! पलडा भारी है अजय का, पर हिन्दी फिल्मों में पलडे का वजन देखने पर विश्वास होता, तो हम उठकर चले न आते - ‘हमें क्या बुरा था मरना, ग़र ऐतबार होता’ ! और इस बेऐतबारी के चलते इतनी ग़लाज़त सहनी पडी कि उफ़...भाइयों की लँगोटिया यारी, अपनी-अपनी प्रेमिका की सुन्दरता को लेकर बाज़ियाँ, फ़ालतू के दृश्य व पिटे-पिटाये संवाद, चाय व नाच-गान..यानी ढेरों फिल्मी लटके-झटके...। सबसे जिन्दा बचे, तो देखा- प्रेमिका को त्यागने के लिए दोनो भाई तैयार। बक़ौल मनीषा ‘भाइयों का ऐसा प्यार कहीं नहीं देखा’ और फिर वही बात, जो ‘निक़ाह’ में इससे बहुत-बहुत ज़ोरदार ढंग से सलमा आगा कह चुकी है- मेरी जिन्दगी का फैसला और मुझे बिना बताये ? क्योंकि ‘निक़ाह’ को कुछ कहना था और ‘महबूबा’ को कुछ कहने का इल्म तक नहीं...। तमाम फ़ॉर्मूलों को निभाना तक नहीं आया अफ़ज़ल को- 7-8 साल तक न जाने क्या होता रहा..। बस, सुफल यही कि संजय को ज़रा चुस्त देखना भला लगा। मनीषा अपने रूप की तरह ही सधी-सँवरी है। अजय देवगन ने बहुत कोशिश की, पर पानी पीटने से कहीं रास्ता

Saturday, 5 July 2008

लव स्टोरी- 2050 हैरी बावेजा लिखित-निर्देशित फिल्म ‘लवस्टोरी-2050’ में सना (प्रियंका चोपडा) व करन (हरमन बावेजा) को देखते हुए आधी फिल्म तक यही लगा कि 2050 का प्यार भी वही पहली नज़र वाला ही होगा- बिना किसी कारण व तर्क के...। फिर लडकी के पास बडा अच्छा घर होगा, जहाँ वह अकेली रहती होगी...। परंतु वह घर 2050 में भी सिर्फ हॉय व बॉय करने के काम आयेगा…प्रेमी वहाँ सिर्फ फूल देगा और मिलने का समय तय करेगा...बाकी प्यार तो वे सडकों पर, पहाडों पर, बाज़ारों-मॉलों में गाते-नाचते-कूदते ही करेंगे। [इससे अच्छा उपयोग तो वैजयंती माला (के आदिवासी बाप) के घर का ‘मधुमती’ में दिलीपकुमार कर लेते थे।] बेचारे जावेद अख़्तर ही 2050 में भी गाने लिखेंगे...पर वे गद्यगीत होंगे, जिन्हें संगीतकार गवा देगा। हाँ, उसमें अनिवार्य रूप् से उछल-कूद के लिए जावेद जी गैप्स छोडेंगे और संगीतकार उन गैप्स पर अपने ख़म रख सकेगा...ठीक है कि एकाध गीत इसके अपवाद होंगे, जिसे 2050 का समय अवश्य माफ़ नहीं करेगा..। हाँ, 2050 में भी बिछडते हुए दोनो रोयेंगे। मैं यह सब देखकर पहले तो कम्बख़्त 2050 के समय को कोसने लगा...। पर फिर आश्वस्त हुआ कि चलो, बाग-बागीचों-नदियों-वादियों में आधे-पौना घंटे गा-नाच कर प्यार को प्रतिष्ठित करने की देवानन्द-राजकपूर युग की विरासत ज्यों की त्यों सुरक्षित तो है...ठीक है कि वादियां विदेशी (आस्ट्रेलियाई) हैं, क्योंकि देसी वाली बार-बार आकर बासी हो गयीं हैं...। तब के निर्देशक तरसते थे कि काश, अंग्रेजी फिल्मों की तरह छूट होती, तो एक चुम्बन से पाँच सेकेंड्स में यह काम हो जाता...। और आज तो छूट के बावजूद आधी-आधी फिल्म में वही हो रहा है, क्योंकि करें क्या...? तो हुआ न परम्परा-पालन ! इस रौ में लडकी की माँ (अर्चना पूरन सिंह) ज़रूर बडी मॉडर्न होगी कि होटेल में दोनो के लिए ऑर्डर देकर ख़ुद खिसक लेगी, पर वह 2050 में भी कुंडली जरूर मिलवायेगी...परम्परा...! और इसके लिए नायक के चाचा ज्योतिषी-वैज्ञानिक (वोमन ईरानी) मौजूद, पर वे असल में क्या कर रहे हैं, शायद वोमन को ही मालूम हो...। उनकी बनायी टाइम मशीन में बैठकर नायिका ‘2050 मुम्बई’ लिखती है, तब पता चलता है कि यह तो 2008 ही था...। तब तक नायिका एक आइस्क्रीम लिए रोड पार करते हुए मोटर से टकराती है व प्रेमी की बांहों में दम तोड देती है...ठडे-ठंडे होठों से एक किस देने का वायदा धरा का धरा रह जाता है - बेचारा हरमन !... पर किती शालीन है फिल्म !! अब मध्यांतर के बाद जाते हैं - 2050 की मुम्बई में, जहाँ सना का पुंनर्जन्म हो चुका है। वह एक सुपरस्टार डांसर है। शायद 2050 की मुम्बई में जवान ही पैदा होंगे- बच्चा पैदा करके कौन पाले-पोषे ? परिवार रोबोट हैं व आसमान में उडते वाहन हैं। पूरा परिवेश आसमानी रंग का है। शायद तकनीक के बल बनायी यही विज्ञान-कथा है...। लेकिन यहां भी फ़र्जी पहचान पत्र बनते हैं। विलेन होते हैं - नक़ाबपोश रोबोट । लेकिन अकेले करन सबकी ताकतों पर भारी पडता है - आख़िर हीरो है, फिर निर्माता-निर्देशक परिवार का राजकुमार भी...। काया भी हिरोइक और काम में भी दम...। प्रेमिका को खोजता ही नहीं, पहचनवा भी लेता है - डायरी तक ले जाना नहीं भूला था...। और प्रेमिका भी तो हसीन-दिलदार - पहली बार भायी प्रियंका ...। बडा मज़ा आया यह देखकर कि कभी पुराण-काल में पतिव्रता सावित्री अपने मरे पति को यमराज से माँग लायी थी- 2050 की मुम्बई में प्रेमिकाव्रती प्रेमी होंगे, जो दूसरे जनम से खींच लायेंगे प्रेमिका को...। जय हो टाइम मशीन की...जिसमें हिरोइन के घर के छोटे-छोटे बच्चे भी आ गये थे...। बच्चों को बोर करता होगा प्रेम व बडों को बोर करता है कथा विहीन फिल्म का बचकानापन...। इस तथ्य का पता चल गया होता, तो अपनी नयी कल्पना की कथा व कला को सँवार सकते थे हैरी बावेजा... -सत्यदेव त्रिपाठी

Sunday, 29 June 2008

समा गया थोडे-से प्यार में ज्यादा-सा जादू

‘थोडा मैजिक थोडा प्यार’ यूँ तो बच्चों की फिल्म है और बच्चों के लिए काफ़ी मज़ेदार भी है, पर उसकी शुरुआत होती है- फ़िल्म के नायक, बडे नामी बिजनेसमैन रनवीर तलवार (सैफ़ अली ख़ान) के गुस्से (न जाने क्यों?) व उसकी कार के हादसे से, जिसमें एक दम्पति की मृत्यु हो जाती है...। वैसे तो पूरा शहर, लेकिन ख़ास तौर पर पूरा मीडिया घोर शंका से आतुर है कि इस अमीरज़ादे को छोड देगा जज। पर वह तो अद्भुत फ़ैसला देता है- मृत दम्पति के चारो बच्चों को अपने घर में साथ रखकर श्री तलवार लालन-पालन करें...। और अब बच्चे तो बच्चे - वो भी फिल्म के बच्चे !! फिल्मी न होते, तो ऐसे दुखद समय में केस के दौरान अपने घर देखभाल के लिए आयी मौंसी-चाची-बुआ आदि को तूफ़ान-मस्ती करके भगा न देते... फ़िर माँ-बाप की मृत्यु के जिम्मेदार रनवीर के साथ क्या नहीं करेंगे...? उसे तंग करने की सारी बदमाशियों का नेतृत्व बडा बच्चा वशिष्ठ (अक्षत चोपडा) करता है...जिसमें इरादा तो बदले का है, पर तरीका बच्चा दर्शक वर्ग के मनोरंजन का ...। लेकिन यहाँ तक की तिहाई फिल्म में तो न प्यार है, न जादू...। वो आता है- भगवान (ऋषि कपूर) द्वारा इनमें मेल कराने के लिए गीता (रानी मुखर्जी) नाम से भेजी गयी परी के साथ...। सो, आगे की फिल्म परी-कथा है। सबकुछ जादू से होता है, जिसमें बच्चों के मुताबिक बहुत कुछ शामिल है...। इन तरीकों के परिणाम का तो पता था ही - सबकी दोस्ती व रानी से सैफ़ का प्यार...। सो, हुआ । और अंत के थोडे-से प्यार में समा गया - फिल्म के 55% हिस्से का यह जादू, 25 प्रतिशत शरारतें और थोडा-सा रोना-धोना भी...। इस प्यार पर कुर्बान होकर भगवान भी परी को धरती पर छोड देते हैं...सब खुश...। लेकिन इस बीच बच्चों के साथ आने वाले बडों के लिए कुछ है। सैफ़ की प्रेमिका के रूप में अमीषा पटेल रखी गयी है, जिसका अमीरी से बना गधापन (स्टुपिडिटी शालीन होता !) तो बच्चों का है, पर फिल्मकारों ने उसे महज कटि-वक्ष पर दो कसमसाते टुकडे (वही ‘टाइट टू पीस’) के साथ दर्शनीय बनाया है बडों के लिए। ज्यादा रसिकों के लिए उस पर नंगानाच (वही आइटम सांग) भी। दिल्ली-आधारित कहानी फिल्माने में विदेश हैं, और एक बार कहानी भी ‘लॉस एंजिल्स’ जाती है, जब सैफ़ के सौदे के बहाने बच्चों के साथ उसकी पूरी दोस्ती होती है। इनमें सधे कैमरे से कैद की गयीं ख़ूबसूरत दृश्यावलियां भी बडों को रुचेंगी। दो गीत तो ज़रूर सबको भायेंगे, पर असल में लुभायेगी बंगाली बाला रानी मुखर्जी ही - सैफ़ तो झींकते लगे इसमें मुझे। और सच का मज़ा तो बच्चों के सहज अभिनय का ही है - एक से बढकर एक। सब अपने काम व चरित्र की माँग पर सटीक...। और सब पर निर्देशक कुणाल कोहली की मनचाही पकड एकदम सही । किसी को राजेश खन्ना अभिनीत ‘दुश्मन’ की याद आ जाये, तो ताज्जुब न होगा... बच्चों के लिए तो उपहार है ही, बडे भी उनके साथ बोर न होंगे, वरन् फिल्म के आदर्शों-नसीहतों को समझाने के लिए उपयोगी ही होंगे... - सत्यदेव त्रिपाठी

Sunday, 22 June 2008

दे ताली

ताल ठोंकते-ठोंकते... हो गयी ‘दे ताली’... एक लडकी मम्मो (आयशा टाकिया) और दो लडके - पगलू (रीतेश देशमुख) व अभि (आफ़्ताब शिवदासानी)...लेकिन ‘एक फूल दो माली’ नहीं.. वैसे साँचे अब नहीं रहे - न जीवन में, न फिल्म में। आफ़्ताब तो हर दिन एक लडकी को दिल दे बैठता है - 31 का आँकडा है फ़िल्म में। सो, हम आयशा-रीतेश को फूल-माली समझने लगते हैं कि तब तक रीतेश को आयशा से कहते पाते हैं - यार, तू उससे (आफ़ताब) प्यार करती है। इसमें आफ़्ताब के अमीर बाप (अनुपम खेर) का भी बडा मनोरम योगदान है। वह भी हमारी तरह पुराना आदमी है। नहीं जानता कि अब के युवाओं में दोस्ती व प्यार के बीच की लाइन बहुत बारीक हो गयी है। ख़ैर, बात संकेतों में आफ़्ताब तक पहुंचा दी गयी है और पापा की पार्टी में वह अपनी प्रिय जीवन संगिनी ( वही स्वीट हॉर्ट लाइफ़ पार्टनर) की घोषणा करने वाला है। आयशा-रीतेश के साथ हम भी दिल थामे बैठे हैं। कोई बेताब दर्शक बोल पडता है- ‘मम्मो को बताने के लिए आईना लेने गया है’, पर तब तक वह एक अदद लडकी लिए आ जाता है- कार्तिका (रीमा सेन)। अब आगे समूची फिल्म की कर्त्ता यही कार्त्तिका हो जाती है... जब कोई खलनायक न हो, तो ग़लतफ़हमी या नियति को ही वह भूमिका निभानी पडती है। मम्मो-पगलू को कार्त्तिका पर शक़ हो जाता है। वे दोस्त को बचाने में जुट जाते हैं। धीरे-धीरे राज़ खुलता हैं...कार्त्तिका की नियति है - गरीब और सनकी माँ-बाप, जिनसे व जिनकी करायी शादी से भागकर वह कई को अपने रूप-जाल में फँसाकर काम निकलने के बाद शराब में ग़र्क़ कर आयी है और अब अंजलि से कार्त्तिका बनकर पूरी पहचान ही बदलकर अमीरज़ादे अभि को फाँस रही है। पर कुचक्र ऐसा मजबूत रचती है कि अभि अपने 14 साल के दोस्तों को फटकार देता है। हारकर ये दोनो शादी के पहले कार्त्तिका का अपहरण कर लेते हैं। कार्त्तिका-वियोग से उबारने के दौरान मम्मो कामयाब हो जाती है- अभि को अपने में अनुरक्त करने में। और इधर आधी फिल्म भर पगलू के घर में बँधी कार्त्तिका से ताल ठोंकते-ठोंकते कब दोनो ‘दे ताली’ कर लेते हैं, का पता उन्हें भले देर से चला हो...विज्ञापन बता चुके हैं हमें हॉल में आने के पहले ही। रही-सही कसर साज-सँभार के दृश्य पूरी कर देते हैं। एक संवाद का सवाल था - कार्त्तिका की पहली शादी का तलाक भी हो जाता है...याने सब सुखी। नियति के खेल से बने राज़ के बनने-खुलने व रक़ीबों की होड और दोस्त के प्रति वफ़ादारी के साथ मौज-मस्ती के बीच अच्छा टाइमपास भी हुआ। इस बीच यह हास्य फिल्म रही कि नहीं, देखकर ही जानें...। और सुनें मौजूँ व मनभावन गीत-संगीत। कारग़र व मज़ेदार संवाद- पगलू के कहे विशेषण खास रोचक । पटकथा अवश्य ढीली-बिखरी-सी, पर ई निवास के निर्देशन की पकड एकदम फ़िट- दृश्यों के कट व जोड तो ग़ज़ब के। कुछ दृश्य तो बडे ही जानदार । पर इसी मोह में फिल्म लम्बा भी गयी। बहुत छोटे में अनुपम खेर व पगलू के मकान-मालिक के रूप में सौरभ शुक्ला का बेहतरीन उपयोग। मुख्य भूमिका में चारो ही सही...अभिनय में सटीक, पर पगलू के किरदार में काफी विविधता, जिसे अच्छा निभा पाने में अलग से उभरी - रीतेश की क्षमता...। - सत्यदेव त्रिपाठी

Sunday, 15 June 2008

मेरे बाप पहले आप्

हास्य के साथ ‘कुछ और’ की खिचडी - काफ़ी फ़ीकी... यदि सिनेमा हाल में घुसते हुए प्रियदर्शन (लेखक-निर्देशक) मिल जायें, तो आप यही कहके उन्हें आगे कर सकते हैं- पहले आप। फिर दोनो पूरे तीन घंटे (हॉय, सम्पादित क्यों न किया या..र) बैठ पायें, तो निकलते हुए पूछिए कि वे क्या बनाना चाहते थे - कॉमेडी या कुछ और...! कॉमेडी को सस्पेंस में खत्म करने वाली ‘चलती का नाम गाडी’ जैसी बेहतरीन फिल्म का उदाहरण है। और प्रियदर्शन को समापन नहीं आता, इसका प्रमाण उनकी सबसे अच्छी फिल्म ‘हेराफेरी’ भी है- याद कीजिए वो झटके लगांने वाला उबाऊ दृश्य। फिर तो सबमें है...। शायद इसीलिए उन्हें ज़रूरत पडी- ‘कुछ और’ की, जो कॉमेडी पर भारी पडता गया और कथा में उसे बुनने की प्रक्रिया में हास्य (पर ध्यान) कम होता गया, जो उनकी ख़ासियत व मशहूरियत हैं। ठीक ध्यान होता, तो राजपाल के किरदार को एकदम ही फ़ालतू न होने देते...शोभना को ‘शोपीस’ न बनाकर उनकी क्षमता लायक कुछ कराते...। उधर ओमपुरी के किरदार पर ऐसा ध्यान दिया कि पचासे की उम्र में पूरी फिल्म शादी के लिए लडकी खोजने में भटकाते रहे, जो अच्छा हास्य तो शुरू में भी नहीं बना, आगे तो बोरियत की हद तक एकरस (मोनोटोनस) हो गया। इसी ‘कुछ और’ ने परेश रावल के किरदार को गम्भीरता की टोपी पहना दी और दर्शक ठहकेदार हास्य से महरूम रह गया...। हालाँकि जो दिया गया, उसे करने की जीतोड कोशिश दोनो ने की, पर ‘बिगडी बात बने नहीं, लाख करे किन कोय’... और यह सब कर देने वाला वह ‘और कुछ’ कथा के बाहर भी तमामों को काफ़ी नाग़वार गुज़रा है। क्योंकि वह बहुत सही है, बहुत प्यारा है; पर ग़ैर पारम्परिक है। बचपन से एक दूसरे के जानू-अनु (जनार्दन-अनुराधा) रहे परेश रावल-शोभना का साठ साल की उम्र में मिलन व विवाह, जिसे कराते हैं जानू के सुपुत्र गौरव (अक्षय खान्ना) और अनु की पुत्रीवत शिखा (जिनेलिया डिसोज़ा)। फिर ये हीरो-हिरोइन हैं। सो, अपनी शादी के पहले यह शादी कराते हैं। बेटा कहता भी है- ‘मेरे बाप, पहले आप’। पर शीर्षक गीत ‘बाहर’ का पर्दा खुलने के बाद क्यों शुरू होता है? हीरोगीरी तो यहाँ तक है कि प्रेमिका के बाप (नसीरुद्दीन शाह) की खास अदा में शादी तोडने की धमकी के बावजूद अपने प्रेम को कुर्बानी की कीमत पर भी बेटा यह कराता है। इस त्याग भाव पर हिरोइन के (सच्चे फिल्मी) बाप को मानना ही था। बडा बेटा चिराग (मनोज जोशी) भी हिन्दी फिल्मों की रूढिगत कुलटा पत्नी को फिल्मी तमाचा मारकर शादी में शामिल होता है। इसी सब फिल्मी लटकों व हास्य के दोराहे में इस मह्त्त्वपूर्ण ‘और कुछ’ को निखरने नहीं दिया। बेटे की तरह बाप के रख-रखाव के बेहतरीन आइडिया को तो लोग हास्य समझते रहे। फिल्माया भी गया हीरोगीरी के साथ। सो, फिल्मी होकर रह गया। याने ‘कुछ और’ ने ‘हास्य’ को भटकाया -बिखेरा और हास्य ने इसे दबाया, धूमिल किया - ना ख़ुदा ही मिला, ना बिसाले सनम...। हाँ, इस थीम के पहले हीरो-हिरोइन की लॉग-डाँट में लिपटी लुकाछिपी से बनी चौथाई फिल्म में तथा बूढे प्रेमी-प्रेमिका को मिलाने के फोन वाले कल्पनाशील दृश्यों में निर्मल हास्य बना है। अक्षय खन्ना तो नया कुछ नहीं करते, पर नयी आयी जिनेलिया का तो सब नया है ही, थोडी ही देर में वह मुग्ध भी कर लेती है। पूरी फिल्म में लडकियों को छेडने के नाम पर दोनो दोस्तों - परेश व ओमपुरी - को पकडते हुए और ओमपुरी से उठाबैठक कराते हुए पुलिस इंस्पेक्टर बनी अर्चना पूरन सिंह कब ओमपुरी की खोज का नतीजा बन जाती हैं, दर्शकों को जैसे जाते-जाते ही मालूम पडता है, उसी तरह शायद प्रियदर्शन को भी बाद में ही किलका होगा...। सबसे बडी बर्बादी तो पुराने ज़माने के परेश-शोभना के प्यार के नग़मे की उछलकूद वाले नाच के फिल्मांकन में हुई है। भाई प्रियन, कुछ तो प्रिय दर्शन रहने देते... - सत्यदेव त्रिपाठी

Saturday, 7 June 2008

satyadev tripathi: माँ इसे देवी कहती... (समापन किस्त...)

satyadev tripathi: माँ इसे देवी कहती... (समापन किस्त...) प्रियवर बेनामजी, आशीर्वचनों के लिए बारम्बार शुक्रिया...! कहीं बहुत गहरे चुभी होगी देवी, तभी अपनी असलियत के साथ प्रकट हुए आप...। आप को लगी चोट के लिए खेद सहित - स.त्रि.

satyadev tripathi: cinema

satyadev tripathi: cinema अनाम महोदय, सही श्लोक भी लिख ही देते ! ग़लती किससे नहीं होती ? स. त्रि.